मोदी जी ने काँग्रेस के चाटुकारों को ऐसी लात मारी है की वो भी याद करेंगे

Padma
डॉन को अपनी विपदा समझाता हुआ अमेरिगो बोनासेरा

अमेरिगो बोनसेरा की बेटी को उसका बॉयफ्रेंड और उसके दोस्त इसलिए पीट पीटकर मरणासन्न कर देते हैं, क्योंकि वो उनके साथ यौन संबंध बनाने से इनकार कर देती है। क्योंकि सभी लड़के धनाढ्य है और राजनैतिक रूप से काफी समृद्ध है, इसीलिए उन्हे जज बाइज्जत बरी कर देते हैं। एक थका हारा और बदहवास सा बोनसेरा अपने बेटी की शादी के दिन वीटो कोर्लियों के घर उन्हे उन लड़कों को मारने की अर्जी देता है। कोर्लियों न सिर्फ इससे साफ इनकार करता है, बल्कि बोनसेरा को ऐसे अपमानजनक व्यवहार के लिए उलाहने भी देता है। ये डॉन दुनिया में सभी गलत काम केवल अपने मित्रों के लिए करता है, इसलिए पहले बोनसेरा को उसका मित्र बनना पड़ता, फिर जाकर उसकी मुंहमांगी मुराद पूरी होती। पर डॉन की दोस्ती बिना शर्त के नहीं मिलती। वो शर्त थी :- ‘मैं तुम्हारा काम करूंगा, और तुम मेरा करना, जब भी ज़रूरत पड़े।“ अमेरिगो राज़ी हो जाता है और डॉन के आदमी उन हमलावरों को छठी का दूध याद दिला देते हैं। बोनसेरा तो खुशी से फूला नहीं समाता, पर उसे भी पता है, की एक दिन उसे इसकी कीमत अवश्य चुकानी पड़ेगी। जब डॉन के बेटे को उनके दुश्मन गोलियों से छलनी कर देते हैं, अमेरिगो अपने उसी दोस्ती का कर्ज़ चुकाते हुये शव को चुपचाप एक कोने में सिलकर डॉन को सौंप देता है।

कितना अद्भुत है, है न? ये था डॉन की वफादारी कमाने का तरीका, यानि मित्रता। मित्रता एक बहुत ही उपयोगी हथियार है, अगर इसका सही उपयोग किया जाये। मित्र आपके लिए लड़ सकते है, आपका सार्वजनिक मंचों पर बचाव भी कर सकते हैं। और अगर आपके मित्र प्रामाणिक तौर पे पब्लिक इंटेलैक्चुयल हो, तो उनकी मित्रता और भी आवश्यक बन जाती है।

काँग्रेस ऐसी मित्रता का मूल्य समझने वाली भारत की प्रथम पार्टी थी। उन्होने इस डॉन के मित्रता की नीति को भारत में सफलतापूर्वक अमल करवाया। *इटली कनैक्शन महज एक संयोग है।

और मित्रता कमाने का इससे अच्छा तरीका क्या हो सकता है की आप अपने ‘मित्रों’ पर पुरस्कारों और रुपयों की वर्षा करे? मोंटेक सिंह अहलूवालिया का ही उदाहरण ले लीजिये। अपनी उत्कृष्ट सेवा के लिए इन्हे 2011 में पद्म विभूषण मिला था। मनमोहन सिंह के राज्य में इनहोने योजना आयोग का नेतृत्व किया था, जबकि 2010 से 2014 के समय  में योजना आयोग सिर्फ नाम का आयोग था, योजना तो लालटेन लेके ढूँढने पर भी नहीं मिलती। और इनके 35 लाख रुपये के टॉइलेट रेनोवेशन को कोई कैसे भूल सकता है?

खुशवंत सिंह का भी आप उदाहरण ले सकते हैं। जहां उनके कलम की जादू का कोई सानी नहीं था, भाजपा और हिन्दू नेताओं [या हिन्दू फुण्डू, जैसे वो खुद कहते थे] के लिए उनकी हिकारत भरी नज़र से इनकार भी नहीं किया जा सकता। चाहे उनके आडवाणी पर चुटीले तंज़ हो [सिंधी नो गुड फंडू] या नितिन गडकरी के लिए इनके तीखे बोल [फैट ब्राह्मण फ़्रोम नागपुर], इससे साफ पता चलता है की इनकी वफादारी किसके प्रति थी। वैसे भी, ये उनही कुख्यात कोंस्ट्रक्टर सर सोभा सिंह के सुपुत्र है, जिनहोने नेहरू शासन में भूमाफिया उद्योग को काफी बढ़ावा दिया था। खुशवंत साब को पद्म विभूषण से 1974 में नवाजा गया था।

हम पीएन धार को भी याद कर सकते हैं, जो आपातकाल के कुख्यात दौर में श्रीमति इन्दिरा गांधी के मुख्य सचिव हुआ करते थे। इनकी भी कुख्यात कश्मीरी माफिया को स्थापित करने में अहम भूमिका रही है। इरफान हबीब, जिनहोने बड़े बेशर्मी से इतिहास को तोड़ा मरोड़ा है, और जिनहोने मोदी के 2014 की विजय को भयानक विपदा की संज्ञा दी थी, को पद्म भूषण से 2005 में नवाजा गया था। कुख्यात मानवाधिकार आंदोलनकर्ता, मोदी विरोधी और पैसे डकारने में माहिर तीस्ता सीतलवाद को पद्म श्री से 2007 में नवाजा गया था। राजदीप सरदेसाई, बरखा दत्त और वीर संघवी, जिनहे निस्संदेह पत्रकारिता पर कलंक समझा जाता है, को भी पद्म श्री से नवाजा गया है।

और बात सिर्फ पुरस्कारों की नहीं है, काँग्रेस ने अपने मित्रों को उच्च पदों से भी नवाजा है। इरफान हबीब को उदाहरणत आईसीएचआर का अध्यक्ष बनाया गया था 1986-90 तक। अमर्त्य सेन को 2012 में नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति के पद से नवाजा गया था। अशोक वाजपयी ललित कला अकादेमी के अध्यक्ष रह चुके हैं। जॉन दयाल सोनिया गांधी के राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के सदस्य रहे हैं।

मशहूर कांग्रेसी बुद्धिजीवी जॉन दयाल कांग्रेस का बचाव करते हुए

याद है न दादरी की वो घटना, जिसके बाद अवार्ड वापसी का सिलसिला सा शुरू हो गया था? अवार्ड वापस करने वालों के नाम पर एक सरसरी निगाह दौड़ाए, तो साफ हो जाये की इनमें से अधिकांश तो काँग्रेस की ‘मित्र सूची’ में शुमार थे। इनहि दोस्तों को आप टीवी के बहसों पर काँग्रेस का बचाव करते भी पा सकते है, या तो ‘एमिनेंट पनेलिस्ट’ की तरह, या फिर सीधे सीधे ‘माननीय पत्रकारों’ की तरह। कर्जा चुकाने का सिस्टम बहुत जटिल है।

फिर आते हैं एक नरेंद्र मोदी, जो इस पूरी प्रक्रिया पर लगाम लगते हैं, माने तो अंग्रेज़ी में फुल्ल स्टॉप। वे बस इस प्रक्रिया को लोकतन्त्र के अनुकूल बनाते हैं, और पद्म पुरस्कारों के लिए मंत्रियों द्वारा नाम सुझाने की प्रक्रिया को ही खत्म कर देते हैं। वो ऐसे प्लैटफ़ार्म का निर्माण करते हैं, जहां कोई भी कभी भी, और किसी को भी पद्म पुरस्कार के लिए नामित कर सकता हैं। इस तरह आप देख सकते हैं की कैसे दोस्ती का कर्ज़ चुकाने वाली दोस्ती का मोडेल का बिना किसी गाजे बाजे के नरेंद्र मोदी ने सर्वनाश कर दिया।

हो सकता है की पद्म पुरस्कार का जनतंत्रिकरण आपको सिर्फ एक और छोटी सी बात लगे, पर भारतीय राजनीति पर इसका असर जो पड़ेगा, उसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता।

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