पश्चिम बंगाल में चौधरी-सिंघवी के बीच बड़ा संघर्ष

चौधरी सिंघवी

2014 की हार के बाद से कांग्रेस की स्थिति दयनीय हो गयी है। नेहरु गांधी परिवार की 5 वीं पीढ़ी से कांग्रेस का पतन शुरू हो गया था जो अभी भी जारी है। जो पार्टी कभी देश की राजनीति में सबसे श्रेष्ट पार्टियों में से एक हुआ करती थी जो पार्टी कभी देश की सत्ता में सबसे अहम हुआ करती थी आज उस पार्टी का पतन लगातार समय के साथ बढ़ता जा रहा है। न सिर्फ जनता का समर्थन समय के साथ पार्टी के प्रति कम हो रहा है बल्कि पार्टी की अंतर्गत स्थिति बढ़िया है, पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के बीच मतभेद और असहमति की स्थिति भी बढती जा रही है। पार्टी में बढती दरारों ने इस पार्टी पुनरुत्थान की स्थति को लगभग असंभव सा बना दिया है। इस समस्या के बढ़ने की वजह कांग्रेस का अभिमानी रवैया भी है जो उसे किसी भी गठबंधन से जुड़ने से रोक रही है, और राज्य के नेता और कार्यकर्ता केंद्र के भ्रमित नेतृत्व से असमंजस की स्थिति में हैं।

कांग्रेस के लिए एक और सिरदर्द है उसके दो राजनैतिक दिग्गजों के बीच बढ़ता मतभेद। पश्चिम बंगाल में इस बार कांग्रेस के प्रमुख अधीर रंजन चौधरी और अभिषेक मनु सिंघवी के बीच लड़ाई बढती जा रही है क्योंकि सिंघवी ने हाल ही में पंचायत चुनाव हिंसा को लेकर भाजपा द्वारा दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के समक्ष ममता की सरकार का प्रतिनिधित्व किया था।

पश्चिम बंगाल के अधीर रंजन चौधरी और कांग्रेस कार्यकर्ता सिंघवी के इस कदम से नाराज हैं और आरोप लगाया कि टीएमसी कार्यकर्ताओं ने कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया और उन्हें राज्य भर में नामांकन दाखिल करने से रोका। अधीर रंजन चौधरी ने शनिवार को अपना गुस्सा जाहिर किया और आश्चर्य जताया कि आखिर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से पहले सिंघवी टीएमसी सरकार का पक्ष क्यों ले रहे थे।  उन्होंने ये भी कहा कि उनके कार्यकर्ताओं ने पूछा भी कि आखिर सिंघवी ममता की अगुवाई वाली सरकार का कोर्ट के फैसले से पहले क्यों प्रतिनिधित्व कर रहे थे और इस सवाल के जवाब में उन्होंने शर्मिंदगी जताई क्योंकि उनके पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं था। उन्होंने ये भी स्पष्ट किया कि उन्होंने पार्टी के नेतृत्व से पहले कोर्ट में राज्य के कार्यकर्ताओं की आवाज को उठाया था।

दिलचस्प बात यह है कि अधीर रंजन चौधरी ने कोलकाता उच्च न्यायालय के फैसले पर खुशी जाहिर की, जिसमें सभी एसपी, डीएम और एसडीओ को चुनावों में शांति सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए थे। इससे पता चलता है जब कांग्रेस का एक वरिष्ठ नेता एक दिशा में हैं तो इसके विपरीत राज्य अध्यक्ष दूसरा रुख अपना रहे हैं। इन सबके बीच पार्टी ने इस मामले में कोई अधिकारिक कदम नहीं उठाया जिससे साफ जाहिर होता है कि पार्टी के नेताओं के साथ-साथ पार्टी के नेतृत्व को लेकर पार्टी में काफी गहमागहमी है। कांग्रेस में कोई प्रभावी नेतृत्व नहीं है और कांग्रेस का सवाल है तो अभी पार्टी में कुछ भी सुव्यवस्थित नहीं है।

अधीर रंजन चौधरी ने पूर्व में कांग्रेस और टीएमसी के बीच कटु रिश्तों को तब सामने लाया जब बीजेपी के खिलाफ बन रहे गठबंधन के लिए टीएमसी से हाथ मिलाने से इंकार कर दिया था। उन्होंने कहा था कि ममता बनर्जी अति महत्वाकांक्षी हैं, खुद को भारत के मुख्य नेता के रूप में पेश करने की कोशिश कर रही थीं, जो कांग्रेस को स्वीकार नहीं था। अब कांग्रेस के भीतर दो नेताओं के अलग-अलग रुख है जो यही बताते हैं कि कांग्रेस के भीतर कोई सामंजस्य नहीं है।

ये पहली बार नहीं है जब कांग्रेस के राज्य नेता ने राष्ट्रीय नेतृत्व के प्रति संदेह और अविश्वास दिखाया है। एक न्यूज़ रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले महीने कर्नाटक के एक वरिष्ठ नेता ने राहुल गांधी की मेजबानी और उनके प्रचार के प्रति अनिच्छा जाहिर की थी। राहुल गांधी के प्रचार के तरीकों और पार्टी के हार के आंकड़ों की वजह है कि उनकी मेजबानी से वो खुश नहीं हैं। अब ये भी साफ़ जाहिर करता है कि पार्टी के भीतर सबकुछ सही नहीं चल रहा है। पार्टी में ऐसा कोई मजबूत नेतृत्व है ही नहीं जो पार्टी के नेताओं और राज्य नेताओं के बीच मतभेदों का मार्गदर्शन कर उसे सुलझा सके। कांग्रेस अब भ्रमित नेता और कार्यकर्ताओं का समूह बनता जा रहा है जो अब कई गुटों में टूटने के कगार पर है।

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