कैसे एक साल में ही बदलकर रख दिया बीजेपी ने पश्चिम बंगाल का राजनैतिक समीकरण

ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल बीजेपी

पश्चिम बंगाल में राजनीतिक सरगर्मियां तेज हैं। ममता बनर्जी खुलकर सीबीआई के विरोध में उतर गयी है। वो अभी गुस्से में हैं क्योंकि उनके राज्य में सीबीआई उन्हीं के पार्टी के नेताओं द्वारा किये गये घोटालों की जांच कर रही है। वो इतने गुस्से में हैं कि वो संवैधानिक मूल्यों और लोकतंत्र का मजाक उड़ा रही हैं। ममता बनर्जी इस स्तर पर चली गयी हैं कि वो अब सीबीआई के किसी भी एक्शन को बीजेपी की गंदी राजनीति का नाम दे रही हैं। पश्चिम बंगाल के सियासी जंग में कांग्रेस और लेफ्ट तो पूरी तरह से दरकिनार हो गये हैं लेकिन अपने इस कदम से ममता बनर्जी भी बैकफूट पर आ गयी हैं। वो एक भ्रष्ट अधिकारी को बचाने के लिए जिस तरह का आक्रोश केंद्र सरकार के खिलाफ दर्शा रही हैं उससे उनका जिद्दी, गुस्सैल रवैये के साथ उनकी निम्न स्तर की राजनीति सामने आ गयी है। अब ममता का ये रूप उन्हीं के लिए भारी पड़ने वाला है क्योंकि जब आपकी अपनी पार्टी सत्ता में हो तब ऐसे किसी भी कदम से बचना चाहिए वो खुद के पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा हो। शायद उन्होंने केजरीवाल से कोई सीख नहीं ली होगी जो दिल्ली में सत्ता में तो आ गये लेकिन केंद्र सरकार और  व्यवस्था पर बेतुके हमले की वजह से जल्द ही जनता के दिलों से उतर गये थे।

सीबीआई और ममता सरकार के बीच इस तनातनी में एक और अहम पहलू है वो ये कि पश्चिम बंगाल में लड़ाई दो तरफा हो गयी है जहां बीजेपी और ममता की पार्टी आमने सामने है लेकिन इस जंग में किसी को सबसे ज्यादा नुकसान हो रहा है तो वो है कांग्रेस और लेफ्ट। पश्चिम बंगाल इन दिनों राजनीतिक दांव-पेंच का केंद्र बन गया है। ऐसे में ये कहना गलत नहीं होगा कि सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के लिए आगामी लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल की भूमिका काफी अहम होने जा रही है। हो भी क्यों न क्योंकि उत्तर प्रदेश (80), महाराष्‍ट्र (48) के बाद ये पश्चिम बंगाल की 42 लोकसभा सीट सत्ता के लिए काफी अहम है। पिछली बार लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने 34 सीटें जीती थीं जिस वजह से ये पार्टी लोकसभा चुनाव में चौथी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। अब ममता 2019 में अपनी पार्टी के प्रदर्शन को बढ़ाना चाहती है जिससे वो सत्ता में आने की स्थिति में महागठबंधन की तरफ से प्रधानमंत्री पद के लिए अपनी दावेदारी को मजबूत कर सकें।

साल 2014 की बात करें तो उस समय हालात कुछ और थे लेकिन आज भारतीय जनता पार्टी राज्य में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन चुकी है। यहां बीजेपी असम और त्रिपुरा की तर्ज पर अपनी जड़ें जमाने में लगी है और ममता बनर्जी की गंदी राजनीति से प्रदेश की जनता को रूबरू करवा रही है। बीजेपी के इन प्रयासों का ही नतीजा है कि नगर निकाय चुनाव में बीजेपी दूसरे नंबर की पार्टी है। ये हम यूं ही नहीं कह रहे अगर आप आंकड़ों पर नजर डालें तो आप भी समझ जायेंगे। दरअसल, राज्य की उलुबेरिया लोकसभा और नोआपाड़ा विधानसभा के उपचुनाव में बीजेपी दूसरे नंबर रही। यही नहीं साल 2014 और आज के समय में भारतीय जनता पार्टी के वोट शेयर में भी काफी इजाफा हुआ है। उलुबेरिया में वोट शेयर 23.29 फ़ीसदी हो गया है जो साल 2014 में 11.3 फीसदी था। नोआपाड़ा विधानसभा में 2016 में जहां बीजेपी को 13 फ़ीसदी वोट मिले थे, इस बार उसे 20.7 फ़ीसदी वोट मिले थे। इसका मतलब साफ़ है कि पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी का ग्राफ ऊपर की ओर बढ़ रहा है और तृणमूल कांग्रेस का ग्राफ गिर रहा है जिसने ममता की चिंता को बढ़ा दिया है। बीजेपी की जड़ों के मजबूत होने से पश्चिम बंगाल में बीजेपी को टीएमसी के बागी नेताओं से संजीवनी भी मिल रही है जो ममता को और हताश कर रहा है। मोदी-शाह की रणनीति रंग ला रही है और योगी आदित्यनाथ भी अब खुलकर पश्चिम बंगाल की राजनीति में शामिल हो गये हैं। यही वजह है कि ममता अपने डर की वजह से बीजेपी को राज्य में रैली करने से रोक रही हैं। चुनाव प्रचार में अड़ंगा डाल रही हैं और अब तो संघीय व्यवस्था पर ही हमले कर रही हैं। पुलिस द्वारा सीबीआई अधिकारियों की गिरफ्तारी करवाकर राज्य में संवैधानिक संकट को पैदा कर रही हैं। वहीं बीजेपी भी ममता की इस गंदी राजनीति का मुंह तोड़ जवाब दे रही है। या यूं कहें कि बीजेपी ममता बनर्जी के हर दांव पर भारी पड़ रही है। ऐसे में ये लड़ाई स्पष्ट रूप से अब बीजेपी बनाम ममता बन चुकी है।

अमित शाह पश्चिम बंगाल का 18 से ज्यादा बार दौरा कर चुके हैं। यहां तक कि वो राज्य में रथ यात्रा करने की तैयारी में थे लेकिन ममता सरकार ने अनुमति नहीं दी जिसके बाद अमित शाह ने दूसरा विकल्प चुना। स्वाइन फ्लू से ग्रसित होने के बावजूद वो पश्चिम बंगाल गये और अपने भाषण से जनता का दिल जीत लिया। वहीं पीएम मोदी राज्य में विकास मॉडल के जरिये पार्टी की जेडें मजबूत कर रहे हैं। वहीं योगी अपने महंत की छवि और अपराधियों पर लगाम लगाने की वजह से राज्य में न सिर्फ हिंदुओं को एकजुट करेंगे बल्कि उन्हें भी पार्टी के साथ लायेंगे जो अपराधमुक्त राज्य की चाह रखता है।

एक दिलचस्प बात यहां ये भी है कि इस पूरी लड़ाई में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) पार्टी और कांग्रेस पार्टी कहीं नजर नहीं आ रही। कांग्रेस के हाई कमान जहां ममता के समर्थन में खड़े हैं तो वहीं राज्य स्तर पर कांग्रेस पार्टी के नेता ममता की सरकार को बर्खास्त करने की मांग कर रहे हैं। इसका मतलब साफ़ है कि राज्य में जिस समर्थन की बात राहुल गांधी कर रहे थे वो जमीनी स्तर पर कहीं है ही नहीं। वहीं दूसरी तरफ माकपा न तृणमूल कांग्रेस के समर्थन में है और न ही खिलाफ। वो असमंजस की स्तिथि में है जिस वजह से वो मूक दर्शक बनकर इस पूरे घटनाक्रम को देख रही है क्योंकि इस पार्टी के पास और कोई चारा बचा ही नहीं है। अगर ममता के खिलाफ जाती है तो ये समझा जायेगा कि वो बीजेपी के साथ है और अगर ममता का समर्थन करती है तो उसकी पार्टी के लिए राज्य में अच्छे संकेत नहीं होंगे। कुल मिलाकर इस सियासी जंग में बीजेपी और तृणमूल कांग्रेस आमने सामने है और अन्य विपक्षी पार्टियां सिर्फ राजनीतिक मैदान में हो रहे इस मैच को देख रही हैं। इस जंग में जहां अपने गुस्सेल रवैये और तानाशाही रुख की वजह से ममता बनर्जी अपनी साख को कमजोर कर रही हैं वहीं बीजेपी तेजी से ऊपर उठ रही है। ऐसे में ये कहना गलत नहीं होगा कि आगामी लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को ममता के इस रुख का फायदा होगा बल्कि वो बेहतरीन प्रदर्शन के साथ राज्य में अधिक सीटों पर कब्जा कर सकेगी।

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