हिंदुओं को अब यह तय करना है कि भारत बहु-संस्कृतिवाद के नाम पर दूसरा यूरोप न बने

29 मई 1453 को जब कॉन्स्टेंटिनोपल (इस्तांबुल का तत्कालीन नाम) को उस्मानी साम्राज्य के महमूद द्वितीय ने जीत लिया और चर्च की प्रभुता समाप्त कर दी थी तभी यह मान लिया गया था कि यूरोप का भी एक दिन इस्लामीकरण हो जाएगा।

पिछले कुछ वर्षों में यूरोप का विकास और उदारवाद ‘अरब स्प्रिंग‘ के कारण पश्चिमी एशिया और अन्य क्षेत्रों से आए प्रवासियों के लिए वरदान साबित हुआ। उनकी उदारवादी बॉर्डर नीति ने दुनिया भर में एक विवाद पैदा कर दिया। यह नीति कितनी सफल हुई यह तो नहीं कहा जा सकता लेकिन कितनी विफल हुई यह जरूर देखा जा सकता है। इस नीति की  विफलता के कई  संकेत है जैसे बढ़ा हुआ अपराध दर, कई नो-गो जोन का उभरना और सबसे महत्वपूर्ण पारंपरिक सांस्कृतिक रुढियों और प्रतिगामी तत्वों का फिर से उद्भव। कई लोगों ने इस विषय पर चिंताएं व्यक्त की हैं क्योंकि इसका यूरोपीय समाज की सांस्कृतिक गतिशीलता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।

मध्य ऐशिया से आये शरणार्थियों ने 2015 के बाद जर्मनी में 200,000 से अधिक अपराध किए।  यह आंकड़ा 2014 के आंकड़ों से 80% ज्यादा है, जिसका मतलब यह है कि प्रति दिन 570 अपराधिक (गैस्टस्टोन इंस्टीट्यूट) घटनाएं यूरोप में होने लगी हैं। स्वीडन के विशेषज्ञों का कहना है कि उनके देश में स्थिति भयावह है।  स्वीडन के राष्ट्रीय पुलिस आयुक्त ने कहा है कि उनके पास शरणार्थियों के अपराधों की बढ़ती स्थिति को संभालने के लिए संसाधन नहीं हैं।  पुलिस ने शरणार्थियों का पूरा क्षेत्र को ‘नो-गो ज़ोन’ घोषित कर दिया गया है।   ISIS   ने हमेशा यह दावा किया है कि वो अपने आतंकवादियों को शरणार्थियों के रूप में भेजने में सफल रहा है। हाल के जर्मनी, फ़्रांस और यूरोप में हुए अतांकी हमलों से यह साबित भी होता है। जर्मनी की घरेलू खुफिया एजेंसी (BfV) के प्रमुख ने पुष्टि की है कि यूरोप में ISIS आतंकवादी प्रवेश करने में कामयाब रहे हैं।

यह विडंबना ही है कि एक तरफ यूरोप अपनी यूरोपीय संस्कृति को बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है, वहीं दुनिया भर के उदारवादी इसे  बहुसंस्कृतिवाद यानी multiculturism  की जीत मान कर इसका जश्न मनाने में व्यस्त हैं।  उदारवादियों ने यूरोपीय समाज पर इस्लामिक संस्कृति के व्यापक प्रभाव को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर दिया है। पश्चिम एशिया के रूढ़िवादी समाज से आने वाले तथाकथित शरणार्थी यूरोप के आधुनिक समाज से सामंजस्य बैठाने में असमर्थ है। और इसके विपरीत ये शरणार्थी यूरोपीय समाज पर अपनी रूढ़िवादी  प्रथाओं को थोपने की कोशिश करते हैं।  ऐसी स्थितियों में सख्त कार्रवाई ही एकमात्र विकल्प नजर आता है। मानवीय मूल्यों की आड़ में उदारवादियों और तथाकथित बुद्धिजीवियों ने इस व्यवस्थित जनसांख्यिकी परिवर्तन को सही ठहराने की कोशिश की है।

भारत भी इससे अछूता नहीं है, भारत में यह 1300 वर्ष पहले ही यह शुरू हो गया था। ये हमारी सांस्कृतिक मूल्य ही हैं जिन्होंने हमेशा हमें अपनी मूल जड़ों से जोड़े रखा है जिस वजह लगातार हमलों के बाद भी हमारा सौ फीसदी परिवर्तन करने में वो असफल रहे हैं। जब इस्लामी हमला होना शुरू हुआ तब हमारे देश के राजाओं या शासकों में एकता नहीं थी, तब आक्रांताओं के लिए हिंदुस्तान पर राज़ करना आसान हो गया। और लगातार इस्लामी और अंग्रेजो द्वारा किये गये हमले के बाद जब आजादी मिली तो कांग्रेस ने भी वही किया जो वर्षों से होता आ रहा था यानी हिंदुओं को यहां भी निशाना बनाया। हालात ऐसे बनने लगे कि आजाद भारत की जनता द्वारा चुनी गयी सरकार के होते हुए भी हमारे मंदिरों पर हमले होते रहे। और इसे अति ही कहेंगे कि ऐसी स्थिति में भी हिंदुओं को ही शांति बनाए रखने को कहा जाता था।

भारत में कुछ  संप्रदाय म्यांमार और बांग्लादेश में अवैध प्रवासियों के रूप में आए थे और अब इन्हें ही भारतीय समाज के खिलाफ आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त पाया गए हैं।  हालांकि, भारतीय सुरक्षा एजेंसियां ​​आपराधिक कट्टरपंथियों का मुकाबला करने में सक्रिय रही हैं। आक्रांताओं और अवैध आप्रवासियों ने भारत की उदार और खुली संस्कृति को रूढ़िवादी विचारों से विषाक्त करती रही हैं।

 विदेशी सामाजिक प्रथाओं को मुख्यधारा में बढ़ावा देने के कारण समाज में इसका भारतीय संस्कृति से  लगातार टकराव होता आया है। इस टकराव ने भारतीय समाज में एक बड़ा प्रश्न खड़ा कर दिया है।  क्या भारतीय समाज अपने खुलेपन और स्वतंत्र भारतीय मूल्यों के साथ विकास करेगा या यह फिर से प्रतिगामी विदेशी विचारों का शिकार हो जायेगा ? क्योंकि आज फिर हमारा समाज जैसे 600ई में बंटा हुआ था उससे भी ज्यादा विभाजित नजर आ रहा है। अंग्रेजों द्वारा लागू की गयी विदेशी शिक्षा नीति ने हमारे समाज को परत दर परत बाँट दिया है। भारत में तथाकथित बुद्धिजीवियों और उदारवादियों ने इन रूढ़िवादी और पितृसत्तात्मक प्रथाओं की किसी भी आलोचना को ‘कट्टरपंथी’ और ‘जीनोफोबिक’ कहकर इन प्रतिगामी प्रथाओं को ढंकने का प्रयास किया है। हालांकि,  पिछले कुछ वर्षों में भारतीय समाज के हिंदुओं ने इसके खिलाफ आवाज उठाना शुरू किया है।  

भारत अब ऐसे दोराहे पर खड़ा है जहां से इसे अब दो में से एक विकल्प चुनना होगा। उदारवादी बनने का या अपनी मूल विरासत की ओर लौटने का। अगर यूरोप का रास्ता अपनाते हैं तो भारतवर्ष का भी वही हाल होगा जो आज यूरोप के सभी देशों का हुआ है। और फिर  ‘धार्मिक समावेश’ और  ‘अल्पसंख्यक’  के नाम पर  भारतीय संस्कृति का नाश कर दिया जाएगा। दूसरा हमें फिर से वेदों की ओर लौटना होगा जहां किसी भी मनुष्य के मन में उठने वाले सभी सवालों के जवाब मिलते हैं। जहां कर्मो और कर्तव्यों को ही सफलता की कुंजी बताया गया है। हमें फिर से दयानन्द सरस्वती और विवेकानंद की राह पर चलना होगा। तभी हमारा सनातन धर्म भविष्य में भी बना रहेगा। 

 

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