सरदार पटेल से अमित शाह तक: पूर्ण हुआ भारत का एकीकरण का सपना

सरदार पटेल अमित शाह

(PC: Telegraph)

जब 15 अगस्त 1947 को अंग्रेज़ भारत छोडकर गये, तो देश भले स्वतंत्र हो चुका था, परंतु उसके साथ ही देश के अंतर्गत 565 रियासतें भी स्वतंत्र हो गये थे। ऐसे में देश को एक सूत्र में बांधने का जिम्मा देश के प्रथम गृहमंत्री, सरदार वल्लभभाई झवेरभाई पटेल को दिया गया था। जो प्रक्रिया सरदार पटेल ने प्रारम्भ की थी, उसे आज वर्तमान गृह मंत्री अमित अनिलचन्द्र शाह ने पूरा करते हुए भारत के मुकुट, यानि जम्मू-कश्मीर को विशेषाधिकार देने वाली अनुच्छेद 370 को हटा दिया है। 

राज्यसभा में चर्चा के दौरान अमित शाह ने घोषणा करते हुए कहा कि, ‘संविधान के अनुच्छेद 370(3) के अंतर्गत जिस दिन से राष्ट्रपति द्वारा इस सरकारी गैजेट को स्वीकार किया जाएगा, उस दिन से अनुच्छेद 370 (1) के अलावा अनुच्छेद 370 के कोई भी खंड लागू नहीं होंगे। इसमें सिर्फ एक खंड रहेगा।’ इस बदलाव को राष्‍ट्रपति की ओर से मंजूरी दे दी गई है।  इसका अर्थ साफ है,वर्षों तक कश्मीर को विशेषाधिकार देने वाला अनुच्छेद 370, जिसके कारण देश की राजनीतिक गलियारों में उठापटक जारी थी, वो अनुच्छेद अब हटाया जा चुका है।

इस निर्णय से अमित शाह ने बतौर गृह मंत्री सरदार पटेल के उन्हीं आदर्शों का अनुसरण किया है, जिनपर चलकर हमारे देश का वर्तमान स्वरूप तैयार हुआ था। देश को एक सूत्र में बांधने की आशा लिए सरदार पटेल ने सर्वप्रथम सेवानिर्वृत्त होने को तैयार हो चुके आईसीएस अधिकारी वीपी मेनन को अपना मुख्य सलाहकार नियुक्त किया, क्योंकि वे मेनन की कार्य कुशलता और सभी रियासतों से मधुर संबंध से अच्छी तरह परिचित थे।

सरदार पटेल और वीपी मेनन ने मिलकर विकट परिस्थितियों में भी केवल दो वर्षों के अंदर ही 565 स्वतंत्र रियासतों में से 563 रियासतों का भारत में सफलतापूर्वक विलय करवा दिया था। परंतु हैदराबाद, और उत्तर भारत में स्थित कश्मीर ऐसी दो रियासतें थीं जो अभी भी स्वतंत्र थीं।

हालांकि, यही वो समय था, जब सरदार पटेल द्वारा प्रारम्भ की गयी एकीकरण की प्रक्रिया में पहली बाधा पड़ी, और इसे डालने वाले कोई और नहीं, स्वयं भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू थे। बतौर गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल यह कतई नहीं चाहते थे कि कश्मीर का विलय पाकिस्तान में हो। उनके एक भाषण से साफ प्रतीत होता है कि सरदार पटेल कश्मीर में हिंदुओं और सिखों पर हो रहे अत्याचार से काफी नाराज़ थे और उन्हें कश्मीर को पाकिस्तान में शामिल किया जाना स्वीकार्य नहीं था। इस भाषण में उन्होंने कहा था ‘कश्मीर की जमीन हम नहीं छोड़ने वाले हैं’। लेकिन इसी समय सभी की इच्छाओं के विरुद्ध जाते हुए जवाहरलाल नेहरू इस मामले को न केवल संयुक्त राष्ट्र में ले गए, अपितु कश्मीर को भारत से अलग करने वाले अनुच्छेद 370 को अस्तित्व में लाने वाले भी वही थे।

अनुच्छेद 370 भारत के साथ कश्मीर राज्य के संबंधों की व्याख्या करता है। जब इस अनुच्छेद को संविधान सभा में रखा गया तब पूर्व प्रधानमंत्री नेहरू अमेरिका में थे, लेकिन फार्मूले के मसौदे पर पहले ही उनकी स्वीकृति ले ली गई थी। हालांकि, सरदार पटेल के पत्र बताते हैं कि इस संबंध में उनसे कोई परामर्श नहीं लिया गया था और इसे लेकर उनकी सहमति भी नहीं थी। ऐसे में केवल एक व्यक्ति की मनमानी का खामियाजा पूरे देश को अगले 70 साल तक भगतन पड़ा।

प्रधानमंत्री की गैर-मौजूदगी में सरदार पटेल ने अपने मत को परे रखते हुए नेहरू की सोच को प्राथमिकता दी और खुद संविधान सभा को अनुच्छेद 370 को स्वीकार्यता देने के लिए मनाया। इसके पीछे उनका मकसद तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू की प्रतिष्ठा को कोई ठेस नहीं पहुंचाना था। हालांकि, वे स्वयं भी इस धारा के विरुद्ध थे। उन्होंने एक समय अपने निजी सचिव वी शंकर से कहा था कि ‘जवाहर लाल रोएगा’।

हालांकि, धारा 370 स्वाभाविक रूप से एक अस्थायी नियम था, परंतु वामपंथियों और कांग्रेसी सरकार द्वारा फैलाये गए प्रपंचों के कारण लोगों के बीच ये धारणा बिठा दी गयी कि धारा 370 संविधान का एक अभिन्न भाग है, और इसे कोई नहीं हटा सकता।

हालांकि, वर्तमान गृह मंत्री अमित शाह की नीति कुशलता का ही प्रभाव है कि वर्षों से देश में राजनीतिक अस्थिरता का कारण बन चुकी धारा 370 अब पूरी तरह से निष्क्रिय हो चुकी है। ये अमित शाह की राष्ट्र के प्रति प्रतिबद्धता को भी सिद्ध करता है। अब भारत सच्चे मायनों में एक राष्ट्र है, जिसमें एक निशान, एक विधान और एक संविधान है। इस निर्णय से अमित शाह ने सरदार पटेल के अधूरे सपने को न केवल पूरा किया, अपितु उनके आदर्शों को एक सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित की।

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