जातिवाद से राष्ट्रवाद की ओर, आखिर क्या है वजह जिससे मायावती का बदल गया सुर

मायावती

इन दिनों बसपा प्रमुख मायावती का बदला बदला सुर देखने को मिल रहा है। दरअसल, उन्होंने एक बार फिर से सभी को चौंकाते हुए न केवल जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 के विशेषाधिकार संबंधी प्रावधान हटाने पर केंद्र सरकार के कदम का समर्थन किया, बल्कि कश्मीर समस्या के लिए जवाहरलाल नेहरू और कांग्रेस पार्टी दोनों को ही कठघरे में खड़ा कर दिया। इसके अलावा मायावती ने राहुल गांधी समेत 12 अन्य विपक्षी नेताओं को बिना अनुमति के कश्मीर में धमकने के लिए भी जमकर लताड़ा। कई राजनीतिक विश्लेषक मायावती के बदले सुर को लेकर हैरान हैं, पर शायद वो बसपा प्रमुख मायावती की राजनीतिक सूझबूझ से पूरी तरह अनभिज्ञ हैं।

मायावती के वर्तमान बयान से साफ पता चलता है कि अन्य विपक्षी नेताओं की तुलना में मायावती एक बेहद सुलझी हुई कुशल राजनेता हैं। उन्होंने तुरंत भांप लिया कि यदि वर्तमान राजनीति में टिकना है तो उन्हें अपनी जातिगत व पार्टी लाइन की राजनीति के साथ-साथ राष्ट्रवादी राजनीति को भी अपनाना पड़ेगा। उत्तर प्रदेश के वर्तमान समीकरणों को देखा जाये तो भाजपा के मुक़ाबले अकेले बसपा ही एक योग्य प्रतिद्वंदी के तौर पर खड़ी है। लोकसभा चुनाव 2019 में उत्तर प्रदेश में मायावती ने सभी को चौंकाते हुये 10 सीटों पर अपना कब्जा जमा लिया। पिछली बार एक भी सीट न जीत पाने वाली मायावती के लिए ये किसी चमत्कार से कम नहीं था।

अब ऐसे में मायावती को अन्य पार्टियों के मुक़ाबले बहुत जल्द ही यह आभास हो गया है कि भाजपा से जीतना तो दूर की बात, चुनौती देना भी कोई आसान काम नहीं है और मौजूदा समय में राजनीति में अपना औचित्य बनाए रखना है तो उसके लिए उन्हें राष्ट्रवाद की नीति पर चलना होगा और यही उन्होंने चुना भी है। बसपा प्रमुख मायावती अपने जातिगत राजनीति के लिए बदनाम रही हैं ऐसे में एकाएक एक राष्ट्रवादी पार्टी को समर्थन दे देना अन्य विपक्षी दलों को नहीं पच रहा है।

यहीं नहीं मायावती अगर चाहें तो अनुसूचित जाति से कई ऐसे स्वतंत्रता सेनानियों की विचारधारा को अपने राजनीति में जीवित कर सकती हैं। ऐसा करके वे अपने जातिगत राजनीति का टैग हटा कर राष्ट्रवाद का टैग लगा सकती हैं। चाहे वे तैमूर से लोहा लेने वाले वीर योद्धा धूला भंगी हो, या फिर वीर रानी वेलु नचियार की विश्वसनीय सेनापति कुयिली हो, अंग्रेजों के छक्के छुड़ाने वाली वीरांगना ऊदा देवी हो या फिर नेताजी के आज़ाद हिन्द फ़ौज में उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ने वाले वीर योद्धा कैप्टन मोहनलाल कुरील हो, इन उदाहरणों से साफ पता चलता है कि वीरों की कोई जात-पात नहीं होती।

मायावती ने अनुच्छेद 370 पर अपने रुख से ये साफ सिद्ध कर दिया है कि वे हर राजनैतिक परिदृश्य में ढलने वाली चुनिन्दा भारतीय राजनेताओं में से एक हैं। जिस तरह उन्होंने समय की रीति व जनता के मूड को भाँपते हुए सरकार के समर्थन में सामने आई है उससे मायावती के राजनीतिक सूझ-बूझ को देखा जा सकता है। हालांकि इस मामले में सपा प्रमुख पीछे रह गए न वे बसपा प्रमुख से कुछ सीख पाए और न ही वे अपने पिता मुलायम सिंह यादव से सीखे और इसीकारण वे राजनीतिक हाशिए पर चले गए।

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