महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव का राजनीतिक समीकरण- किसकी क्या है तैयारी और कौन किस पर पड़ेगा भारी

महाराष्ट्र

महाराष्‍ट्र में 288 विधानसभा सीटों के लिए चुनावी शंखनाद हो गया है। मुख्‍य चुनाव आयुक्‍त सुनील अरोड़ा ने ऐलान किया है कि 21 अक्‍टूबर को एक चरण में राज्‍य में विधानसभा चुनाव होगा और वोटों की गिनती 24 अक्‍टूबर की जाएगी। इसके साथ ही राज्‍य में आदर्श आचार संहिता लागू हो गई है। महाराष्‍ट्र में 9 नवंबर को विधानसभा का कार्यकाल खत्‍म हो रहा है। राज्य में 288 विधानसभा सीटों पर मतदान के लिए 1.8 लाख ईवीएम का इस्‍तेमाल किया जाएगा।

महाराष्ट्र शुरू से ही भारत के चुनावी परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण राज्य रहा है। अब जब राज्य में विधानसभा चुनाव की घोषणा हो चुकी है। ऐसे में सभी पार्टियां चुनाव की तैयारियों में जुट गयी हैं। इस राज्य में बीजेपी-शिवसेना का गठबंधन पहले से काफी मजबूत नजर आ रहा है तो वहीं दूसरी ओर एनसीपी-कांग्रेस टक्कर देने की कोशिश कर रही है। हालांकि यह तैयारी तो लोकसभा चुनाव के दौरान ही शुरू हो चुकी थी। आइये एक नजर डालते हैं महाराष्ट्र की राजनीति पर और देखते हैं किस पार्टी में कितना है दम।

2011 की जनगणना के अनुसार, महाराष्ट्र की जनसंख्या 11.24 करोड़ है मतलब दुनिया के 11 देश ही महाराष्ट्र की जनसंख्या से अधिक हैं। भारत का यह तीसरा सबसे बड़ा राज्य 288 विधानसभा सीटों में बंटा है और यूपी के बाद इसी राज्य में सबसे ज्यादा लोकसभा सीटें हैं। यानि महाराष्ट्र देश की केंद्रीय राजनीति में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस राज्य में मुख्यतः 4 पार्टियां ही सरकार बनाने के लिए लड़ती हैं। पहली- महाराष्ट्र की सत्तारूढ़ भाजपा जो कि केंद्र में भी सत्ता में है। दूसरी पार्टी- भाजपा के साथ गठबंधन करने वाली शिवसेना है और वह भी एनडीए की एक प्रमुख सदस्य है। तीसरी पार्टी विपक्ष की एनसीपी यानि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और चौथी सोनिया गांधी की कांग्रेस पार्टी। यहां अन्य क्षेत्रीय दल भी चुनावी मैदान में उतरते हैं जैसे- बहुजन अगाड़ी, असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM। पिछले विधानसभा चुनाव की बात करें तो महाराष्ट्र के 288 सीटों में से बीजेपी को 122, शिवसेना को 63, कांग्रेस को 42, एनसीपी को 41 मनसे को एक और निर्दलीय उम्मीदवारों ने 19 सीटों पर कब्जा जमाया था।

अगर वोट शेयर की बात करें तो वर्ष 2014 के विधानसभा चुनावों में भाजपा को कुल 27.8 प्रतिशत वोट मिले थे वहीं शिवसेना को 19.3, कांग्रेस को 18, एनसीपी को 17.2 प्रतिशत वोट मिला था।

वहीं अक्टूबर 2017 में, महाराष्ट्र राज्य के 34 जिलों में फैले 7,576 ग्राम पंचायतों में चुनाव हुए, इस चुनाव में भी बीजेपी 2,768 सीटों पर जीत दर्ज कर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी, जबकि कांग्रेस केवल 613 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर रही, शिवसेना को 517 सीटें मिली थीं। एनसीपी आखिरी नंबर पर थी जिसे सिर्फ 491 सीटें ही मिली थीं।

भाजपा के लिए इस बार का विधानसभा चुनाव और ज्यादा आसान लग रहा है और इसका कारण राज्य में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस द्वारा किए गए विकास कार्य हैं जो स्पष्ट रूप से नज़र आ रहे हैं। पिछले पांच सालों में राज्य में हुए लगभग सभी चुनावों में बीजेपी और शिवसेना ने जीत हासिल की। इसमें पंचायत, नगरपालिका, महानगरपालिका के चुनाव हैं जिसमें दोनों दल मिलकर चुनाव लड़े और विपक्षी दलों को राज्य के किसी भी चुनाव में जीतने का मौका नहीं दिया।

प्रदेश के मौजूदा सियासी समीकरण की बात करें तो एनसीपी और कांग्रेस इस बार साथ चुनाव लड़ने वाले हैं। पिछली बार दोनों ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था लेकिन इस बार दोनों दल 125-125 सीटों पर चुनाव लड़ने को सहमत हुए हैं।

राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष में बिखराव के बाद अब राज्यों के सियासी दांव-पेंच में भी बीजेपी भारी पड़ती नज़र आ रही है। महाराष्ट्र में बीजेपी और शिवसेना का गठबंधन है और राज्य में माहौल ऐसा बन चुका है जिससे पिछले तीन महीने के भीतर विपक्षी दलों के 18 नेता इस गठबंधन का हिस्सा बन चुके हैं। विपक्षी दल के 11 नेता बीजेपी में और 7 शिवसेना में शामिल हो चुके हैं। आश्चर्य की बात यह है कि 18 में से 12 तो एनसीपी के ही हैं बाकी छह कांग्रेस के हैं। आम चुनाव में बीजेपी-शिवसेना गठबंधन ने कांग्रेस और एनसीपी को बुरी हार का स्वाद चखाया था। 2019 के लोकसभा चुनावों में महाराष्ट्र की 48 लोकसभा सीटों में से भाजपा और शिवसेना ने 41 सीट पर कब्जा जमाया था। इस बार के विधानसभा चुनाव में तो बीजेपी कुछ ज्यादा ही आक्रामक नजर आ रही है।

वहीं राज्य में विकास की बात करें तो सरकार ने मराठाओं को आर्थिक और शैक्षणिक स्तर पर पिछड़ा घोषित करते हुए 18 फ़ीसदी आरक्षण दिया है। उच्च न्यायालय ने भी यह आरक्षण बरकरार रखा। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस द्वारा शुरू किए गए जलयुक्त शिवार अभियान ने विदर्भ और मराठवाड़ा के सूखे-प्रभावित इलाकों के किसानों को काफी राहत पहुंचायी है। अभी इसी वर्ष जुलाई में खबर आई थी कि रूस की कंपनी नोवोलिपस्टेक स्टील महाराष्ट्र में दो चरणों में वर्ष 2022 तक 6,800 करोड़ रुपये का निवेश करेगी। महाराष्ट्र सरकार ने राज्य के इनफ्रास्ट्रक्चर को और ज़्यादा विकसित करने के लिए कई अहम कदम उठाए हैं। फडणवीस सरकार ने इसी वर्ष जुलाई में मुंबई और पुणे के बीच परिवहन के लिए हाइपरलूप परिवहन परियोजना को हरी झंडी दिखाई थी। इन सभी कार्यों से जनता खुश है और फिर से बीजेपी को लौटा सकती है। इसका नमूना हम लोकसभा चुनाव में देख ही चुके हैं। बीजेपी के तरफ से स्पष्ट है कि मुख्यमंत्री बीजेपी का ही होगा। किसी को कोई शक नहीं होना चाहिये कि चुनाव में देवेंद्र फडणवीस ही मुख्यमंत्री का चेहरा होंगे और चुनाव जीतने के बाद फिर से मुख्यमंत्री की कुर्सी वही संभालेंगे।

शिवसेना की बात करें तो वह भाजपा की प्रमुख सहयोगी दल है लेकिन बीच-बीच में अपनी विरोधी तेवर दिखाती रहती है। प्रधानमंत्री मोदी के महाराष्ट्र जाने से पहले तक शिवसेना की ओर से ऐसी तैयारी चल रही थी कि लग रहा था पार्टी लोकसभा चुनाव से अलग रूख अख्तियार करेगी। इसकी एक वजह ठाकरे परिवार की तीसरी पीढ़ी के नेता आदित्य ठाकरे की राजनीतिक सक्रियता है।  आदित्य ठाकरे ‘आशीर्वाद यात्रा’ और ‘आदित्य संवाद’ जैसे कार्यक्रमों में व्यस्त थे। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के महाराष्ट्र दौरे के बाद अब तो कोई चांस नहीं लगता कि आदित्य ठाकरे मुख्यमंत्री भी बन पाएंगे। हालांकि बीजेपी नेतृत्व की ओर से किसी भी प्रकार का कोई संकेत नहीं दिया गया है। न तो अमित शाह ने ऐसा कुछ कहा है न ही पीएम मोदी ने, बल्कि उद्धव ठाकरे ने ही ऐसा बयान दिया है जिससे लग रहा है कि आदित्य ठाकरे का मुख्यमंत्री बनने के दरवाजे फिलहाल तो बंद हो गये हैं।

वहीं विपक्ष की बात करें तो कांग्रेस और एनसीपी पहले से ही बिखरी हुई नजर आ रही ही है। कांग्रेस की राज्य इकाई को हाल ही में नए हाथों में सौंपा गया है। इससे पार्टी को स्थिरता मिल सकती है। साथ ही चुनाव प्रचार अभियान को रफ्तार भी मिल सकती है। कांग्रेस ने स्क्रीनिंग कमेटी का गठन किया है और पूर्व सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया को इसका चेयरमैन बनाया है। वहीं मणिकम टैगोर, हरीश चौधरी और पार्टी के वरिष्ठ नेता मल्लिकार्जुन खड़गे इसके सदस्य होंगे। पार्टी के पास फंड्स की कमी है और सबसे बड़ा सवाल राज्य में एक लोकप्रिय चेहरे का है। जो विपक्ष के पास नहीं है, ऐसे में इस बात की चिंता भी कांग्रेस और एनसीपी को रहेगी। शरद पवार के नजदीकियों समेत बड़ी संख्या में नेताओं के बीजेपी में जाने से नुकसान तो हुआ ही है। अब सवाल यह है कि पार्टी की कमान आगे चलकर किसके हाथों में होगी, अजित पवार या सुप्रिया सुले। छगन भुजबल जैसे नेताओं का घोटाले में नाम आना और अजित पवार और दूसरे नेताओं के खिलाफ राज्य सहकारी बैंक कर्ज केस में एफआईआर होने से पार्टी की छवि पर नकारात्मक प्रभाव भी पड़ चुका है।

ऐसे में अगर पूरी स्थिति को समझें तो महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव को लेकर जहां बीजेपी खेमे में उत्साह का माहौल है, वहीं कांग्रेस-एनसीपी खेमे में निराशा छाई हुई है। तीन तलाक और जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाने के बाद देश में यह पहला बड़ा चुनाव होने जा रहा हैं। इन चुनावों के माध्यम से जनता का सही मूड भांपने का अवसर मिलेगा।

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