गहलोत बाबू क्षेत्रवाद से किसी को फ़ायदा नहीं हुआ है, और आपका 75% का कोटा बिल्कुल बकवास है

आरक्षण

(PC: DNA India)

राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार स्थानीय लोगों को प्राइवेट नौकरियों में 75 फीसदी आरक्षण देना चाहती है। इसके लिए राज्य सरकार ने एक मसौदा तैयार किया है। प्रस्ताव के मुताबिक, राजस्थानी लोगों के लिए 75 फीसदी आरक्षण सभी इंडस्ट्रियल यूनिट्स, फैक्ट्री, सरकार और निजी क्षेत्र के पार्टनरशिप में चल रहे प्रोजेक्ट्स पर लागू होंगे। यह भी कहा गया है कि कौशल विकास में ट्रेनिंग के लिए 75 फीसदी आरक्षण राजस्थानी लोगों को दिया जाए। हालांकि कहा जा रहा है कि फीडबैक में उद्योग संगठनों ने कहा है कि इसे पुराने उद्योगों पर लागू न किया जाए। इसे नए उद्योगों पर लागू किया जाए क्योंकि पुराने चल रहे उद्योगों में अभी भी 50 फीसदी से ज्यादा बाहर के लोग काम करते हैं। इसमें ज्यादातर बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल के लोग हैं। बता दें कि मध्य प्रदेश सरकार औद्योगिक इकाइयों से जुड़ी नौकरियों में राज्य के लोगों के लिए 70 फीसदी आरक्षण लागू करने का विचार कर रही है। वहीं आंध्रप्रदेश सरकार ने स्थानीय लोगों को 75 फीसदी आरक्षण देने का प्रावधान किया है।

प्राइवेट सेक्टर में आरक्षण देने का यह नया बदलाव है। लेकिन ऐसे बदलाव लागू होने के बाद कई तरह के सवाल भी खड़े होते हैं। सवाल यह है कि क्या कोई राज्य सरकार अपने नागरिकों के हितों की रक्षा के लिए इस तरह का आरक्षण देने वाला कानून बना सकती है? क्या ऐसा कानून बनाना संवैधानिक तौर पर सही है? क्या इससे राजस्थान, मध्यप्रदेश और आंध्र प्रदेश के नागरिकों को सही मायने में फायदा मिल पाएगा? अब तक जातीय भेदभाव पर आधारित आरक्षण देने की संवैधानिक व्यवस्था से अलग रिजर्वेशन देने के इस नए कानून को किस तरह से देखा जाए?

इस तरह के बदलाव के कई मायने होते हैं। यह समाज पर गहरा असर करने वाला है। न्यूज़ 18 की रिपोर्ट के अनुसार संवैधानिक व्यवस्था के मुताबिक रिजर्वेशन देने वाले ऐसे कानून ठीक नहीं है। दिल्ली विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र के एसोसिएट प्रोफेसर सुबोध कुमार कहते हैं कि ‘ये ना तो संवैधानिक तौर पर सही है और ना ही व्यावहारिक तौर पर। संविधान में जाति आधारित आरक्षण की व्यवस्था है। इसमें क्षेत्र आधारित आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं है। इसलिए संविधान की कसौटी पर ये खरा नहीं उतरेगा। दूसरी बात ये है कि ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में इस तरह का कानून किसी मायने में सही नहीं है। आज पूरी दुनिया के लोग एकदूसरे से लिंक्ड हैं। ऐसे में ये कानून अलग-थलग करने वाला है। इससे आंध्र प्रदेश को फायदा नहीं मिलने वाला। उल्टे इंडस्ट्रियलिस्ट अब वहां इंडस्ट्री लगाने से हिचकेंगे। जो कंपनियां वहां हैं वो भी भागना चाहेंगी।’

अगर ऐसे बदलाव होते हैं तो इसका असर प्राइवेट कंपनियों की गुणवत्ता पर भी होगा। फार्मा, ऑटोमोबाइल, इंजीनियरिंग और केमिकल सहित कई उद्योग ऐसे हैं, जिनमें कर्मचारियों की नियुक्ति ऑल इंडिया लेवल पर होती है क्योंकि स्थानीय स्तर पर योग्य कर्मचारी न मिलने का भी खतरा रहता है। निजी क्षेत्र के बैंकों में भी स्थानीय स्‍तर पर आरक्षण लागू करने में कई तरह की बाधाएं है। इससे कंपनियाँ राज्य में निवेश नहीं करना चाहेंगी।

अगर बात राजस्थान के लोगों की करें तो वह खुद दूसरे राज्य में जाकर नौकरी करना पसंद करते हैं या राज्य में नौकरी न मिलने की वजह से उनका राज्य के बाहर जाना मजबूरी है। वर्तमान में, राजस्थान प्रति व्यक्ति आय के मामले में बहुत पीछे खड़ा है। राजस्थान में प्रति व्यक्ति आय 39,967 रुपये है जो 54,527 रूपये के राष्ट्रीय औसत से बहुत कम है। स्कूली शिक्षा, गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं, मजबूत सामाजिक बुनियादी ढाँचा और सुरक्षा की कमी जैसे कई कारण शामिल हैं। इन्हीं कारणों से राजस्थान के लोग लगातार पलायन भी कर रहे है। गुजरात, हरियाणा और मध्य प्रदेश, राजस्थान से पलायन करने वालों के लिए प्रमुख स्थलों में से एक है। राजस्थान के 16 प्रतिशत प्रवासी महाराष्ट्र में पलायन करते हैं जबकि राजस्थान के 20 फीसदी प्रवासी गुजरात को जाते हैं।

जबकि राजस्थान उन राज्यों में से है जहां अन्य राज्यों के लोग बुनियादी सुविधाओं की कमी के कारण नहीं जाना चाहते हैं। 2001 की जनगणना के अनुसार केवल 3.3 प्रतिशत लोग ही राजस्थान में है जबकि उनके बगल में ही हरियाणा में 14 फीसदी माइग्रेन्ट्स रहते हैं।

फेडरल स्ट्रक्चर में भारत कई राज्यों का समूह है। इस देश के लोग अन्य राज्यों में अपनी आजीविका खोजने के लिए जाते हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार, 56.3 मिलियन लोग एक राज्य से दूसरे राज्य में पलायन करते हैं। यह आकड़ा 2001 में 42.3 मिलियन था।

ऐसे में कोई राज्य सरकार अगर सिर्फ अपने क्षेत्र के हित के लिए कोई व्यापक कानून बनाती है, जिसका पूरे देश में नकारात्मक असर पड़ता हो, तो वह बिल्कुल उचित नहीं है। इस तरह से अगर सभी राज्य अपने-अपने यहां कानून बनाने लगें तो भारत के संघीय ढांचे का क्या होगा? इस लिहाज से भी ये कानून सही नहीं है। राज्यों को चाहिए कि अपने राज्य के बुनियादी ढाँचे में सुधार लाएं। जिससे राज्य में दूसरे राज्यों की कंपनियां निवेश करें और उन्हें योग्य कर्मचारी मिल सकें तभी देश का विकास होगा।

Exit mobile version