यूएन में पाक की भाषा बोलना पड़ा तुर्की को भारी, अब अपने तरीके से निपट रहा भारत

तुर्की

भारत द्वारा कश्मीर पर लिए गए ऐतिहासिक फैसले पर अपना एजेंडा चला रहे पाकिस्तान को पूरी दुनिया से अब तक फटकार ही मिली है, लेकिन तुर्की एक मात्र ऐसा देश है जिसने कश्मीर मामले पर भारत-विरोधी रुख अपनाया है। इसी का एक और उदाहरण हमें तब देखने को मिला जब तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब इरदुगान ने संयुक्त राष्ट्र में अपने भाषण के दौरान कश्मीर का मुद्दा उठाते हुए कहा कि न्याय और समानता के आधार पर संवाद के जरिये कश्मीर मसले का समाधान निकालना जरूरी है, ना कि टकराव के रास्ते से। कश्मीर पर तुर्की की इस बेतुकी बयानबाजी के बाद भारत ने अब तुर्की को एक के बाद एक झटके देने का मन बना लिया है। यूएन की 74वीं आम सभा के दौरान जहां पीएम मोदी ने तुर्की के दो विरोधियों आर्मेनिया और साइप्रस के राष्ट्राध्यक्षों से मुलाक़ात की, वहीं अब भारत ने आर्थिक तौर पर तुर्की को झटका देने के लिए उसकी एक कंपनी के साथ लगभग 2.3 बिलियन डॉलर की एक डील पर रोक लगा दी है। स्पष्ट है कि तुर्की द्वारा पाकिस्तान की भाषा बोलने के कारण अब उसे भारी वित्तीय घाटे से दो चार होना पड़ रहा है।

दरअसल, इस वर्ष जून महीने में भारत ने नौसेना के लिए 5 जहाजों के निर्माण के लिए तुर्की की एक कंपनी TAIS के साथ समझौता किया था। कुल 2.3 बिलियन यूएस डॉलर के साथ इस प्रोजेक्ट की अवधि 8 साल तक होनी थी। जब इस कंपनी को इस प्रोजेक्ट के लिए चुना गया था, तो कंपनी के सीईओ ने इसपर खुशी जताते हुए कहा था ‘हमने दुनिया के सबसे बड़े बाज़ारों में से एक भारत में वैश्विक स्तर की कंपनियों को पछाड़ते हुए इस टेंडर को जीता है। यह हमने अपने साहस, दृढ़ता और गुणवत्ता के आधार पर किया है। हमने यह दिखा दिया है कि तुर्की का प्राइवेट सेक्टर क्या कर सकता है’। स्पष्ट है कि इस कंपनी के सीईओ इस डील से बेहद खुश थे लेकिन चूंकि उनके राष्ट्रपति ने यूएन में पाक का एजेंडा आगे बढ़ाने में अपनी रूचि दिखाई, इसलिए भारत ने अब इस डील पर रोक लगा दी है।

हालांकि, यह तो बस शुरुआत है और अगर भारत चाहे तो भारत में काम कर रही और भी कई तुर्की की कंपनियों की घर-वापसी करा सकता है। तुर्की की आधिकारिक विदेश मंत्रालय की वेबसाइट के अनुसार अभी टर्की की कंपनिया भारत में लगभग 430 मिलियन डॉलर राशि के अनुबंधों पर काम कर रही हैं। उनमें से टर्की की कुछ कंपनी मुंबई सबवे और लखनऊ सबवे निर्माण में लगी हैं तो वहीं जम्मू-कश्मीर में भी कुछ टर्किश कंपनी घर बनाने में काम में लगी हैं। ऐसे में अगर भारत इन कंपनियों से इनके प्रोजेक्ट छीन लेता है तो देखते-देखते इन कंपनियों को बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है।

इसके अलावा आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार भारत से टर्की जाने वाले पर्यटकों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है। वर्ष 2017 में भारत से कुल 7,700 पर्यटक तुर्की गए थे, जबकि वर्ष 2018 में यह संख्या 16 हज़ार पहुँच गई, और इस वर्ष मई महीने तक यह संख्या 28 हज़ार तक पहुँच चुकी है। ऐसे में अगर भारत सरकार अपने नागरिकों को टर्की जाने से हतोत्साहित करती है तो इसका खामियाजा टर्की के टूरिज़म सेक्टर को भुगतना पड़ सकता है।

साफ है कि जब तुर्की भारत के खिलाफ लगातार बयानबाजी करके अपना एजेंडा चला रहा है तो वहीं अब भारत ने भी उसको मज़ा चखाने का मन बना लिया है। यही कारण है कि अब भारत ना सिर्फ तुर्की के दुश्मनों के साथ अपने रिश्ते मजबूत कर रहा है,  वहीं अब वह तुर्की को आर्थिक झटके भी दे रहा है। अब तुर्की को भी समझ लेना चाहिए कि भारत के खिलाफ अपना एजेंडा चलाकर उसे कुछ हासिल नहीं होने वाला, और उसका हित भारत के साथ ही खड़ा होने में है।

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