उनकी ‘चॉइस’ स्वतंत्रता और दूसरे की ‘चॉइस’ नपुंसकता!

जेएनयू

यार, जेएनयू में जाने घुसने वाले नकाबपोश छात्र कौन थे ये तो अभी तक पता नहीं लगा है! झगड़े की शुरुआत कहाँ से हुई, पता नहीं लगा है! मारपीट में छात्र यूनिवर्सिटी के थे या बाहर के वो भी पता नहीं लगा है! लेकिन बड़ा अजीब है कि एकदम से किसी एक को गुंडा बता दिया जा रहा है और दूसरे को पीड़ित! आरोप दोनों तरफ से हैं इसलिए पुलिस को समय दिया जाना चाहिए कि वे छानबीन पूरी कर लें!

मैं मानता हूं कि 5जनवरी को जो कुछ हुआ वह किसी भी तरह से वाज़िब नहीं था, ऐसा करने वालों की जल्द से जल्द पहचान कर उन्हें सज़ा मिलनी चाहिए! लेकिन आज जो लोग ‘आज़ादी’ के नारों से गुलामी का रोना रो रहे हैं वे लेफ्ट वाले भी कोई दूध के धुले नहीं है!

उनपर कटी पहली FIR में लिखा है कि ‘1 जवनरी को कुछ नक़ाबपोश लोग एडमिन ब्लॉक के पास मौजूद CIS में घुस गए। उन्होंने सभी टेक्नीकल स्टाफ को बाहर निकाल दिया, बिजली की सप्लाई बंद कर दी, और सर्वरों को ऐसा कर दिया कि उनसे काम नहीं लिया जा सके। उन्होंने सरकारी कर्मचारियों को उनकी ड्यूटी निभाने से रोका। ये भी आरोप है कि नक़ाबपोश छात्रों ने सर्वर रूम में मौजूद कर्मचारियों को डराया, गालियां दी और धमकी देकर बाहर निकाल दिया। उन्होंने कमरा बंद कर दिया और कर्मचारियों को दोबारा कमरे में घुसने नहीं दिया। इसके बाद जेएनयू के चीफ सिक्योरिटी अफसर ने कम्प्लेन की, जिसके बाद FIR दर्ज की गयी।’

दूसरी FIR में कहा गया कि ‘3 और 4 जनवरी की रात CIS को बंद कर दिया गया, जिसके बाद रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया में बाधा पहुंची। जेएनयू के सुरक्षाकर्मियों की मदद से 4 जनवरी की सुबह 6 बजे CIS को खोलने की कोशिश की गयी। इस FIR में आरोप लगाए गए कि उन्होंने सुरक्षाकर्मियों को धमकाया, महिला गार्डों को धक्का दिया, गाली दी, शारीरिक रूप से हिंसा की, और धमकी दी कि अगर गेट खोला तो बहुत गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। कुछ गार्डों को पीटा भी गया।’ ऐसे ही कुछ आरोप 5 जनवरी की घटना को लेकर ABVP पर भी लगे हैं! लेकिन फिर क्यों ऐसी छवि बना दी गई है कि ABVP वाले तो गुंडे हैं और लेफ्ट वाले पीड़ित हैं! ABVP के पक्ष में बोला तो आप भक्त हैं और लेफ्ट के पक्ष में बोला तो आप ब्रेवो हैं! जबकि दोनों गुटों से छात्र अस्पतालों में हैं! मारपीट दोनों गुटों के बीच हुई है तो दोनों ओर से छात्र शामिल होंगे ही!

दूसरी बड़ी बात, आज़ादी के नारों में जिन सेलेब्स का समर्थन है उनका ये अधिकार ‘फ्रीडम ऑफ़ चॉइस’ है लेकिन दूसरी ओर जो सेलेब्स अपनी ‘फ्रीडम ऑफ़ चॉइस’ का इस्तेमाल कर इस नारेबाज़ी पर समर्थन नहीं कर रहे हैं उनको तो गालियां दी जा रही है!

अभी थोड़ी देर पहले ही कुछ ट्वीट्स पढ़ीं जहां अमिताभ बच्चन, लता मंगेशकर, सचिन तेंदुलकर, सलमान, आमिर, शाहरुख़, अनुपम खेर जैसी हस्तियों के लिए बुरे-भले शब्द लिखें थे। मैं ट्वीटर को इतना सीरियसली नहीं लेता लेकिन जब सेक्युलर होने का दावा ठोकने वाले मीडिया समूहों को भी यह बिनबिनाते हुए पढ़ा तो सोचा ये क्या चल रहा है!

स्क्रॉल ने बड़ी चालाकी से बच्चन साहब को तो बीजेपी का एजेंट साबित करने का प्रयत्न कर दिया!

सत्य हिंदी बड़ा क्यूट सा सवाल कर रहा है कि आमिर, शाहरुख़, आमिर जैसे मेगा स्टार की चुप्पी का क्या संकेत है? वह जावेद अख्तर को ब्रेवो बताते हुए उनके पाठकों की जिज्ञासा यह बताते हुए शांत कर रहा है कि “जावेद अख़्तर को डर क्यों नहीं लगता?”

अजय देवगन ने एक इंटरव्यू में कहा कि “हम (एक्टर्स) जब भी कुछ कहते हैं, तो उसे सीरियसली लिया जाता है। कभी सही, तो कभी गलत तरीके से। मैं ये कहूंगा कि जब तक आपको किसी मामले के बारे में सबकुछ नहीं पता, तब तक आपको उस पर बोलने का कोई हक नहीं है। पहले ही कुछ साफ नहीं है और उस पर कमेंट करके हम कंफ्यूज़न नहीं बढ़ाना चाहते। हमें इस मामले को और जानने की ज़रूरत है। जब तक हम नहीं जानते, हमें चुप रहना चाहिए। अगर लोगों को लगता है कि इस मामले पर कुछ नहीं बोलने का मतलब, दोषियों के साथ खड़ा होना है, तो ये बेवकूफी है। हम आग में और घी नहीं डाल सकते।”

लेकिन अजय की परिपक्व बात पर लल्लनटॉप ने एक लेख इस शीर्षक के साथ छाप दिया कि “अजय देवगन ने जेएनयू हिंसा पर जो बोला, वो उनके कद के सुपरस्टार से सुनकर बुरा लगता है।”

सोचने वाली बात है ना, ये लोग सदी के महानायक को, लताजी को, तेंदुलकर को कहेंगे कि उन्हें क्या करना चाहिए! वाह!

उनकीचॉइसस्वतंत्रता और दूसरे कीचॉइसनपुसंकता! ग़जब! बहुत क्रांतिकारी है!

खैर, आप समझेंगे कि यह एक बहुत ही सुनियोजित तरीके से पिछले कुछ दिनों से पूरा खेल चलाया जा रहा है! इसमें उनका पूरा एक नेटवर्क काम कर रहा है जिसमें मीडिया से पत्रकार, फ़िल्मी दुनिया से कलाकार, कॉलेजों से छात्र, पार्टियों से नेता, वगैरह सब अपना-अपना शत प्रतिशत दे रहे हैं!

पहले मुसलमानों को भड़काया गया कि आपकी नागरिकता छीन ली जाएगी! पत्रकार अपनी टीवी स्क्रीन से निकल कर सड़कों पर आ गए! सेलेब्स भी परदे से निकल कर धरने देने लगे! कुछ ने प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर तोड़-फोड़-मारपीट की-करवाई लेकिन उनका मकसद जब उजागर हो गया तो अब दूसरे तरीके ढूंढे जा रहे हैं!

युद्ध का समर्थन मैं भी नहीं करता लेकिन कभी पाकिस्तान से युद्ध की बात हो तो इनका कहना है कि बातचीत से हल निकालों लेकिन, जेएनयू के मुद्दे पर ये लोग तो बातचीत के लिए तैयार ही नहीं है! बस उनकी मान लो या इस्तीफा दे दो! उनके घर पर गटर भर जाये तब भी ये प्रधानमंत्री से इस्तीफा मांग लेते हैं! अब उनका अगला टारगेट बन गए जेएनयू के VC जिन्होंने उनकी बात नहीं मानी और सेमेस्टर-2 के रेजिस्ट्रेशन रद्द नहीं किये! उनके हिसाब से VC को सभी छात्रों का रेजिस्ट्रेशन रोक देना चाहिए था क्योंकि वे ऐसा चाहते हैं! अब VC ने ऐसा नहीं किया तो एक और नारा जुड़ गया – “वाइस चांसलर से, आज़ादी!”‘

इन सब के बीच सरकार ने कुछ सेलेब्स को CAA के बारे में बातचीत हेतु आमंत्रित किया था जिसमें जावेद साहेब और उनकी फैमिली का भी नाम था लेकिन वे गए नहीं! अब बताओ वे टीवी इंटरव्यूज में तो पहुँच जातें है अपने विचार रखने लेकिन सरकार ने बुलाया तो कट लिए!

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