क्यों अब भारत की ‘चीन नीति’ का सारा फोकस अब ताइवान पर होना चाहिए?

ताइवान

मलेशिया, तुर्की और चीन! ये तीन देश कश्मीर और CAA जैसे मुद्दों पर भारत के खिलाफ बोलने से हिचकिचाए नहीं हैं। भारत ने भी इन तीनों देशों को कड़े शब्दों में यह समझा दिया है कि कश्मीर और CAA भारत के आंतरिक मामले हैं और किसी भी देश को इन मामलों में अपनी टांग अड़ाने का अधिकार नहीं है। मलेशिया और तुर्की के खिलाफ तो भारत ने आर्थिक कदम भी उठाए हैं, लेकिन जहां तक चीन की बात आती है, तो अब तक भारत सरकार का रुख बेहद नर्म ही रहा है। चाहे हाँग-काँग का मुद्दा हो, चाहे ऊईगर मुसलमान का मामला हो हो, चाहे साउथ चाइना सी विवाद हो या फिर ताइवान ही क्यों ना हो, भारत ने कभी चीन के लिए इन संवेदनशील मुद्दों पर कोई टिप्पणी नहीं की है। हालांकि, अब समय आ गया है कि मोदी सरकार चीन की दुखती रग यानि ताइवान का मुद्दा उठाकर चीन के साथ उसी की भाषा में बात करे।

चीन ताइवान को लेकर शुरू से ही बेहद संवेदनशील रहा है। इसी को लेकर वर्ष 1954 में भारत और चीन के बीच जो पंचशील समझौता हुआ था, तो उसमें इस बात पर दोनों देशों ने सहमति जताई थी कि वे एक दूसरे के आंतरिक मामलों में दखलंदाज़ी नहीं करेंगे। तभी से भारत आधिकारिक तौर पर एक-चीन की नीति का पालन करता आया है। हालांकि, जब भी भारत ताइवान के साथ अपने रिश्ते बढ़ाने की पहल करता है, तो चीन को इससे भारी तकलीफ पहुंचती है। भारत ने 1950 में Taiwan से द्विपक्षीय संबंधों को ख़त्म करते हुए पीपल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना को स्वीकार किया था, यानि आज़ादी के बाद से ही भारत ताइवान को लेकर चीन पर नर्म रहा है।

वर्ष 2014 में जब भारत में मोदी सरकार बनी, तो ताइवान को यह आशा हुई थी कि अब भारत के साथ उसके द्विपक्षीय संबंध मजबूत हो सकेंगे। ताइवान ने भारत में मोदी सरकार बनने का स्वागत किया था। उसके बाद मोदी सरकार ने भी वर्ष 2017 में दिसंबर महीने में ताइवान की सरकार के साथ एक memorandum पर हस्ताक्षर किए थे, जिससे चीन पूरी तरह बौखला गया था। चीन के सरकारी अख़बारों ने इस समझौते को लेकर भारत को चेताया था। ग्लोबल टाइम्स ने लिखा था कि भारत ताइवान के मामले में आग से खेल रहा है।

ग्लोबल टाइम्स ने लिखा था, ”हालांकि ताइवान का सवाल कोई सरकारी स्तर का मुद्दा नहीं है. कुछ भारतीय लगातार मोदी सरकार को सलाह दे रहे हैं कि वो Taiwan कार्ड का इस्तेमाल करे और वन चाइना पॉलिसी के मामले में चीन से फ़ायदा उठाए। यह समझ आर्थिक मसलों से आगे की है और भारत-चीन संबंधों के लिए ख़तरनाक साबित हो सकता है। दरअसल ताइवान कार्ड को खेलते हुए भारतीय भूल जाते हैं कि वो ख़ुद कई संवेदनशील मुद्दों से जूझ रहे हैं। भारत को यह ख़्याल रखना चाहिए कि वन चाइना पॉलिसी की लकीर को वो पार कर इसका वहन नहीं कर सकता है।”

वहीं ताइवान ने इस कदम का स्वागत किया था। Taiwan और भारत के बीच हुए समझौते को लेकर ताइवान टुडे ने लिखा था, ”ताइपेई इकनॉमिक एंड कल्चरल सेंटर (टीइसीसी) के प्रतिनिधि तियान चुंग-क्वांग ने नई दिल्ली में भारतीय राजनयिक श्रीधरन मधुसूदन के साथ इस समझौते पर हस्ताक्षर किया है। इस समझौते से दोनों देशों के संबंध और मधुर होंगे”।

यह दिखाता है कि खुद ताइवान की सरकार भी भारत सरकार के साथ रिश्तों को मजबूत करना चाहती है। वैसे भी ताइवान एक स्वतंत्र राष्ट्र की तरह एक फलता-फूलता लोकतन्त्र है जिसपर कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा शासित चीन की नज़र सदैव टिकी रहती है। हालांकि, वर्ष 2017 में चीन द्वारा भारत को दी गयी धमकी के बाद भारत के रुख में बड़ी नरमी देखने को मिली है और मोदी सरकार ने भी चीन के लिए किसी भी संवेदनशील मुद्दे पर कोई बयान नहीं दिया है। यहाँ तक कि चीन के दबाव में भारत की सरकारी एयरलाइन कंपनी एयर इंडिया ने अपने destination list में Taiwan का नाम बदलकर चीनी तेपई रख दिया था और साथ ही वेबसाइट पर भी यह बदलाव कर दिया गया था।

लेकिन अब भारत सरकार को अपने इस रुख में बदलाव करना ही होगा और चीन के साथ Taiwan कार्ड खेलने से मोदी सरकार को परहेज नहीं करना चाहिए। चीन पहले ही अमेरिका, जापान के आक्रामक रुख की वजह से बैकफुट पर है, और भारत को मौके पर चौका मारने में संकोच नहीं करना चाहिए। भारत सरकार को ताइवान के साथ राजनयिक संबंध स्थापित करने का विचार करना चाहिए, जो भारत ने आज़ादी के तुरंत बाद ही खत्म कर दिये थे। भारत कई बार चीन से कश्मीर और NSG जैसे मुद्दों पर भारत के खिलाफ ना जाने की दरखाव्स्त कर चुका है, लेकिन अब ड्रैगन को आंखे दिखाने का समय आ चुका है और भारत को किसी भी सूरत चीन को अपनी स्थिति स्पष्ट करनी ही होगी। यही एक तरीका है जिससे चीन को रास्ते पर लाया जा सकता है।

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