इटली ने 100 डॉक्टर खो दिये, भारत भी उसी राह पर, कोरोना वॉरियर्स को बचाने के लिए सरकार को तुरंत ये कदम उठाना चाहिए

इटली, अमेरिका ने एक बड़ी गलती की है, भारत भी वही करने जा रहा है, अभी रुकना होगा!

डॉक्टरों

कोरोना के खिलाफ युद्ध में हमारे मेडिकल केयर से जुड़े स्वास्थ्य कर्मी सबसे पहली कतार में खड़े नज़र आते हैं। चाहे बात कोविड के रोगियों को ठीक करने की हो, या फिर बात वुहान वायरस का इलाज ढूँढने की हो, हर जगह डॉक्टरों और हैल्थ स्टाफ ही मशक्कत कर रहा है। डॉक्टरों ओवरटाइम कर रहे हैं, उन्हें सोने का समय नहीं मिल पा रहा है, वे घरवालों से दूर रहकर काम कर रहे हैं और सबसे बड़ी बात, इस काम में उनकी खुद की जान दांव पर लगी हुई है। भारत में तो इन डॉक्टरों पर हमले तक हो रहे हैं। इतना सब कुछ होने के बाद भी ये कोरोनावॉरियर्स अपनी जगह से टस से मस नहीं हो रहे हैं। ऐसे में भारत सरकार को ना सिर्फ इनकी सुरक्षा के लिए बल्कि इनके मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी जरूरी कदम उठाने चाहिए।

दुनियाभर में यह ट्रेंड देखने को मिला है कि डॉक्टरों और नर्सें, जो कोरोना के मरीजों के रखरखाव और इलाज़ के काम में जुटे होते हैं, उन्हें कोरोना का खतरा सबसे ज़्यादा होता है। जो व्यक्ति हर दिन कोरोना के मरीजों के सीधे संपर्क में आता हो, फिर चाहे उस व्यक्ति ने अपने बचाव के सारे उपकरण और कपड़े क्यों ना पहने हो, उसे इस वायरस से संक्रमित होने का खतरा सबसे ज़्यादा होता है। उदाहरण के तौर पर स्पेन और इटली जैसे देशों में, जहां कोरोना ने सबसे ज़्यादा तबाही मचाई, वहाँ बड़ी संख्या में हैल्थ केयर स्टाफ को इस बीमारी से ग्रसित पाया गया।

स्पेन में जब कोरोना के कुल मामले सिर्फ 40 हज़ार तक पहुंचे थे, तो उनमें से 14 प्रतिशत मामले स्वास्थ्य कर्मचारियों से जुड़े थे। इसके अलावा इटली में 22 मार्च तक हर 10 से में 1 कोरोना का मामला स्वास्थ्य कर्मी से जुड़ा था। इतना ही नहीं, अमेरिका के बॉस्टन शहर में सिर्फ 3 अस्पतालों के 100 से ज़्यादा स्वास्थ्य कर्मचारियों को कोरोना पॉज़िटिव पाया गया है। यही हाल वुहान शहर का भी था जहां इस वायरस की सबसे पहले शुरुआत हुई थी। वुहान में फरवरी के शुरू में जब सिर्फ 1700 मामले ही सामने आए थे, तो उनमें से 15 प्रतिशत मामले स्वास्थ्य कर्मियों से जुड़े थे, और इन 15 प्रतिशत मामलों में से भी 5 से 10 प्रतिशत स्वास्थ्य कर्मियों की हालत बेहद नाज़ुक थी। 2 दिन पहले इटली से आई एक रिपोर्ट बताती है कि इटली में अभी 130 से ज़्यादा डॉक्टरों और नर्सों की मौत हो चुकी है।

भारत में भी डॉक्टरों में कोरोना पॉज़िटिव होने के मामले सामने आ चुके हैं।  दिल्ली में AIIMS अस्पताल में 1, केंद्र के सफदरजंग अस्पताल में 2 और दिल्ली सरकार के दो अस्पतालों में 2 स्वास्थ्यकर्मियों में कोरोना पॉज़िटिव के मामले सामने आ चुके हैं। इतना ही नहीं, देश में कोरोना का हॉटस्पॉट बनते इंदौर में तो कोरोना से लड़ते-लड़ते 1 डॉक्टर की जान तक चली गयी है। उन्हें कुछ दिनों पहले कोरोना पॉज़िटिव पाया गया था।

ऐसे में यहाँ सबसे बड़ा सवाल उठता है कि आखिर कैसे इन स्वास्थ्य कर्मियों की जान को बचाया जाये, और वो कौन से कदम उठाए जाने चाहिए जिनसे हमारे डॉक्टरों की जान को कम से कम खतरा हो। डॉक्टरों को सही से PPE यानि पर्सनल प्रोटेक्टिव ईक्विपमेंट देने के साथ साथ ही कोरोना के मरीजों की देखभाल में लगे डॉक्टर और नर्सों को तीन दिन सेवा के बाद तीन दिनों के लिए क्वारंटाइन फ़ैसिलिटी में भेजने की सुविधा की जानी चाहिए। इससे ना सिर्फ डॉक्टरों का तनाव कम होगा बल्कि वे वायरस से भी कम एक्सपोज होंगे। लगातार वायरस के मरीजों के साथ संपर्क के कारण डॉक्टरों में इस वायरस के संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है।

इससे पहले अमेरिका के कुछ अस्पतालों में भी इसी तरह के सिस्टम का पालन किया जा चुका है, जहां कोरोना के मरीजों को देख रहे डॉक्टरों को क्वारंटाइन किया जाता था, लेकिन अब वहाँ मरीजों की संख्या इतनी बढ़ चुकी है कि डॉक्टरों को हर दिन काम पर आने को बोला गया है। भारत में अभी मरीजों की संख्या इतनी नहीं बढ़ी है कि डॉक्टरों को ओवरटाइम करने की आवश्यकता हो, ऐसे में भारत में अभी डॉक्टरों को समय-समय पर क्वारंटाइन करने की प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए ताकि कोरोना के खिलाफ लड़ाई में इन कोरोनावॉरियर्स की जान को कोई नुकसान ना पहुंचे।

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