न दवा, न कोई मेडिकल सुविधा: अमेरिका में नस्लवाद के कारण कोरोना से अश्वेतों में मृत्यु दर 40 फीसदी

अश्वेत

PC: AP Photo/Tony Dejak

कहा जाता है कि कभी मृत्यु धर्म, जाति या रंग देखकर नहीं आती और जीवन की तरह वह कभी किसी के साथ भेदभाव नहीं करती, लेकिन कोरोना से जूझ रहे दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमेरिका में हमें यही देखने को मिल रहा है। दरअसल, अमेरिका में श्वेत लोगों के मुक़ाबले अश्वेत लोगों की ना सिर्फ ज़्यादा मौतें हो रही हैं बल्कि उनमें संक्रमण दर भी ज़्यादा है। अश्वेत लोगों के ज़्यादा मरने का सीधा मतलब है कि अमेरिका में ना सिर्फ इनका जीवनस्तर बाकी अमेरिकियों से निम्न है, बल्कि इन्हें मेडिकल सुविधा प्रदान करने में भी भेदभाव किया जा रहा है। दुनिया को समानता का पाठ पढ़ाने वाले अमेरिका को अब कोरोना ने एक्सपोज करके रख दिया है।

अब आपको बताते हैं कि कैसे अमेरिका में अश्वेत लोगों की ज़्यादा जानें जा रही हैं। अमेरिकी राज्य मिशिगन कोरोना वायरस से मृत्यु दर के मामले में तीसरे नंबर पर है। यहां कोरोना वायरस से अब तक जितनी मौतें हुई हैं उनमें 40 फीसदी काले लोग हैं जबकि यहां इनकी आबादी महज 14 फीसदी ही है। कुछ ऐसी ही हालत शिकागो की भी है। शिकागो में कोरोना से मरने वाले कुल लोगों में से 70 फीसदी लोग ब्लैक हैं, जबकि शिकागो में अश्वेतों की आबादी महज 30 फीसदी ही है। जॉन हॉपकिन यूनिवर्सिटी और अमेरिकन कम्युनिटी सर्वे का आंकड़ा कहता है कि अमेरिका में हर एक लाख अश्वेत आबादी में 137.5 लोग कोरोना से संक्रमित हैं और 6.3 लोग मर गए हैं। वहीं श्वेत आबादी में हर एक लाख में महज 39.8 लोग ही कोरोना संक्रमित हैं और मरने वालों का आंकड़ा महज 1.1 है। ये आंकड़ें अमेरिकी समाज की एक भयावह तस्वीर प्रस्तुत करते हैं।

अब आपको बताते हैं कि आखिर क्या कारण है कि अमेरिका में इतनी बड़ी संख्या में काले लोग मारे जा रहे हैं। दरअसल, अमेरिका में अश्वेत लोग अधिकतर मजदूरी से जुड़े काम करते हैं, वो ऐसी सेवाओं में हैं, जहां कोरोना से ग्रसित होने का सबसे ज़्यादा खतरा होता है, वे ग्रोसरी स्ट्रोर्स पर काम करते हैं, वे डिलिवरी बॉय्ज़ होते हैं और इसके साथ ही वे सफाई जैसे काम भी कर रहे होते हैं, जिसके कारण वे इस बीमारी से संक्रमित हो गए। इसके अलावा अमेरिका में काले लोग बहुत ही भीड़-भाड़ वाली जगह में रहते हैं, जिसके कारण यह वायरस इन लोगों में बड़ी तेजी से फैल गया होगा। इन लोगों की आर्थिक हालत भी श्वेत लोगों के मुक़ाबले कमजोर मानी जाती है।

इसे लेकर मिशिगन की गवर्नर ग्रेटचेन व्हाइटमर ने कहा ह अमेरिकी समाज में लंबे समय की विषमता को दिखाता है। यह स्वीकार्य नहीं है और इसे ठीक करने के लिए और काम करने की जरूरत है। ऐसे वक्त में हम वो सब कुछ करेंगे जिनसे लोगों की जान बचाई जा सके। अमेरिका की विषमता किसी भी सूरत में ठीक करने की जरूरत है”। ऐसे ही लुसियाना के गवर्नर जॉन बेल एडवर्ड्स ने इसके पीछे का एक अलग तर्क दिया। उनका मानना है कि अश्वेत अमेरिकियों यानि कि अफ्रीकी अमेरिकियों में डायबिटीज, दिल की बीमारी और फेफड़े की बीमारी श्वेत अमेरिकियों के मुकाबले ज्यादा है और ये एक तथ्य है। उनके मुताबिक इसी कारण कोरोना का संक्रमण भी श्वेतों के मुकाबले अश्वेतों पर ज्यादा हो रहा है।

आज इलाज के समय बेशक अश्वेत लोगों के साथ कोई भेदभाव नहीं किया जा रहा हो, लेकिन इस बात में कोई शक नहीं है कि अमेरिका में रह रहे अफ्रीकी अमेरिकियों के साथ दशकों से भेदभाव होता आया है जिसके कारण स्वास्थ्य के मामले में ये लोग बाकी अमेरिकियों से पिछड़े हुए हैं। और यही कारण है कि आज यही लोग कोरोना से सबसे ज्यादा मर रहे हैं।

कभी अमेरिकी जान की कीमत दुनिया में सबसे ज़्यादा मानी जाती थी, लेकिन कोरोना के समय इन्हीं अमेरिकियों को mass graves में दफनाया जा रहा है। मरने वालों का कोई हिसाब नहीं है और अमेरिका में मेडिकल सप्लाई को लेकर केंद्र सरकार और राज्य सरकार एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने में व्यस्त हैं। अमेरिका वही देश है जो पूरी दुनिया को समानता पर पाठ पढ़ाता फिरता है। हाल ही में अमेरिकी सरकार की संस्था USCIRF ने भारत को “अधिक चिंता वाले देशों” की सूची में डाल दिया था और कहा था कि भारत में अल्पसंख्यकों के अधिकार सुरक्षित नहीं हैं। USCIRF को इन आंकड़ों पर नज़र डालकर पहले अपने देश के अफ्रीकी-अमेरिकी नागरिकों के समान अधिकारों के लिए लड़ना चाहिए।

Exit mobile version