दिल बेचारा Review : हँसते-रुलाते हुए अपनी आखिरी फिल्म में जीवन का सार बता गए सुशांत सिंह राजपूत

दिल बेचारा

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दिल बेचारा : सुशांत सिंह राजपूत की आखिरी फिल्म

“जन्म कब लेना है और मरना कब है, ये हम डिसाइड नहीं कर सकते, पर जीना कैसे है, वो हम डिसाइड कर सकते हैं”। कभी-कभी अपनी छोटी-छोटी समस्याओं में हम इतना उलझ जाते हैं कि हम यही भूल जाते हैं कि जीवन कैसे जीना है। पर सच कहें तो यदि आप चीजों को सरलता से देखें, तो इतना कठिन भी नहीं है। उक्त संवाद ये बताने के लिए काफी है कि दिल बेचारा का मूल उद्देश्य क्या है।

मुकेश छाबड़ा द्वारा निर्देशित ‘दिल बेचारा’ सुशांत सिंह राजपूत की अंतिम फिल्म है, जो जॉन ग्रीन की विश्व प्रसिद्ध पुस्तक ‘द फ़ौल्ट इन आवर स्टार्स’ पर आधारित है। इसमें मुख्य भूमिका में है सुशांत सिंह राजपूत और संजना सांघी, और सहायक भूमिकाओं में है साहिल वैद, शाश्वत चैटर्जी और स्वास्तिका मुखर्जी। ये कहानी है किज़ी बासु नामक एक लड़की के बारे में, जिसे थायरोइड कैंसर है।

उसकी मुलाक़ात इमैनुएल राजकुमार जूनियर उर्फ मैनी नामक एक हंसमुख, जीवट स्वभाव के लड़के से होती है, जिसने Osteosarcoma नामक बीमारी को मात दी थी। कैसे मैनी किज़ी को जीवन का वास्तविक अर्थ सिखाता है और कैसे दोनों के जीवन देखने के दृष्टिकोण में एक अहम बदलाव आता है, ये फिल्म इसी बारे में है।

सुशांत सिंह राजपूत भले ही हमारे बीच नहीं है, लेकिन ‘दिल बेचारा’ में उनकी भूमिका को देखकर ऐसा बिलकुल नहीं लगता। ऐसा लगता है मानो वे कहीं गए ही नहीं है, वो हमारे बीच हैं और हमारी प्रतिक्रिया को देखकर मुस्कुरा रहे हैं। यदि मुकेश छाबड़ा ने कोई विशेष उपलब्धि हासिल की है, तो वो निस्संदेह इस फिल्म के लिए उचित अभिनेता को चुन कर की है। जिस प्रकार एन्सेल एल्गोर्ट ने हॉलीवुड फिल्म ‘द फ़ौल्ट इन आवर स्टार्स’ में अपनी मासूमियत और अपने जीवट स्वभाव से सबको मोहित किया था, वैसे ही सुशांत सिंह राजपूत ने अपने अंतिम रोल में एक अमिट छाप छोड़ी है।

संजना सांघी ने भी अपनी भूमिका के साथ न्याय किया

वहीं मुख्य अभिनेत्री के तौर पर संजना सांघी ने भी अपनी भूमिका के साथ न्याय किया है। इस भूमिका को निभाना कोई आसान काम नहीं था, और यहाँ पर दबाव में फिसलने का खतरा भी बना हुआ था, परंतु संजना सांघी ने ऐसा कुछ भी नहीं होने दिया। अपने अभिनय से उन्होंने साबित किया है कि वे अभिनय के क्षेत्र में कोई नौसिखिया नहीं है।

सहायक अभिनेताओं ने अपने बेहतरीन अभिनय से दिल बेचारा में चार चाँद लगाए हैं। बॉब बिस्वास के तौर पर हिन्दी फिल्म जगत में प्रसिद्ध हुए बंगाली कलाकार शाश्वत चैटर्जी ने अपने छोटे से रोल में काफी इंप्रेस किया है। आम तौर पर हिन्दी फिल्मों एवं वेब सीरीज़ में वैम्प के रोल में दिखने वाली स्वास्तिका मुखर्जी ने भी किज़ी की माँ की भूमिका में खूब जँची है। इन्हें देख कोई नहीं कह सकता कि यह वही अभिनेत्री हैं, जिन्होंने ‘डिटेक्टिव ब्योंकेश बख्शी’ में खलनायिका का रोल बखूबी निभाया था। अपने बेहद सीमित रोल में सैफ अली खान ने एक बेहद अहम संदेश देने का प्रयास किया है, और एक सिनेमा प्रेमी होने के नाते इस बात का पछतावा अवश्य रहेगा कि उन्हें थोड़ा और स्क्रीन स्पेस देना चाहिए था। पर इस बारे में बाद में।

दिल बेचारा का संगीत काफी समय तक संगीत प्रेमियों को याद रहेगा 

अब बात करें तकनीकी क्षेत्रों की, तो ‘दिल बेचारा’ यदि किसी जगह सबसे अधिक चमका है, तो वह है संगीत में। बड़े समय के बाद ए आर रहमान ने अपने कद के अनुरूप संगीत दिया है, जो काफी समय तक संगीत प्रेमियों को याद रहने वाला। चाहे शीर्षक गीत हो, ‘मसखरी’ हो, ‘तारे गिन’ हो या फिर ‘खुलके जीना’, हर गीत की अपनी एक अलग और सशक्त पहचान है। रीमिक्स और घटिया संगीत के इस युग में मौलिक संगीत किसी खोये खजाने से कम कीमती नहीं है, और ये देखकर बेहद अच्छा लगा कि एआर रहमान ने फिर वही संगीत दिया है, जिसे सुनने के लिए अधिकतर संगीत प्रेमी पिछले कई वर्षों से तरसे हुए थे।

लेकिन ‘दिल बेचारा’ का सबसे अहम संदेश है, जो असल ज़िंदगी में करना सबसे कठिन है – सरलता। अपनी ही जटिलता में उलझकर हम जीवन को स्पष्ट रूप से जीना ही भूल जाते हैं, और ये भी भूल जाते हैं कि छोटी से छोटी खुशी में खुश होना भी ज़िंदगी का एक हिस्सा है। सच कहें तो ‘दिल बेचारा’ एक बहुत सिम्पल सी कहानी है, पर उस कहानी को ऐसे फिल्माया गया है, कि आप भावुक हुए बिना रह नहीं सकोगे।

यदि वास्तव में दिल बेचारा में कोई कमी थी, तो वो सिर्फ एक ही थी – पटकथा। सुशांत सिंह राजपूत के बेमिसाल अदाकारी और उत्कृष्ट संगीत में एक बात ये भी छिप गई कि पटकथा के साथ पूरी तरह न्याय नहीं हुआ, जिसके लिए काफी हद तक शशांक खेतान और सुप्रतिम सेनगुप्ता दोषी हैं। सैफ अली खान का किरदार मानो हड़बड़ी में लिखा गया था, और इसीलिए वो वैसा प्रभाव नहीं डाल पााए, जो मूल पुस्तक में सैफ के किरदार ने डाला था।

लेकिन सच कहें तो ‘दिल बेचारा’ इन सब चीजों से काफी ऊपर है। ये एक सरल कथा है जिसे बखूबी फिल्माया गया है, और जिसे सुशांत सिंह राजपूत ने अपने बेहतरीन अभिनय से जीवंत किया है। इस फिल्म को देख सभी के मन में यह टीस होगी कि काश अभी सुशांत जीवित होते, लेकिन जैसे आनंद बाबू ने कहा था, “बाबू मोशाय जिंदगी बड़ी होनी चाहिए लंबी नहीं”। अंतत: हम यही कहेंगे अगर जिंदगी के हर पल को खुशी से जीना है और उसकी सच्चाई को समझना है तो इस फिल्म को एक बार अवश्य देखें।

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