“हमारे देश की मस्जिदें कट्टरपंथियों के हाथ में हैं”, नीदरलैंड्स अब इस्लामिक आतंकवाद के खिलाफ जाग चुका है

नीदरलैंड्स में मस्जिदों पर उठा प्रश्न चिह्न!

नीदरलैंड्स

नीदरलैंड्स के सामने एक नई समस्या उभर के आई है। मुस्लिम ब्रदरहुड संगठन और संगठन का पालन पोषण करने वाले खाड़ी देश भर भर के नीदरलैंड्स के मस्जिदों में निवेश, जहां से डच विरोधी गतिविधियों को स्पष्ट रूप से बढ़ावा दिया जाता है। डच सांसद माइकल रॉग द्वारा गठित संसदीय inquiry कमेटी ने पिछले महीने एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी, जिसमें ये बात सामने आई थी। इन मस्जिदों को पल्लवित पोषित करने में कतर, कुवैत और तुर्की का बहुत बड़ा हाथ है, और माना जा रहा है की इन्हीं मस्जिदों में डच विरोधी गतिविधियों और मुस्लिम ब्रदरहुड के सदस्यों को बढ़ावा दिया जाता है।

कमेटी द्वारा की गई जांच पड़ताल के अनुसार इस रैकेट की असलियत अब डच जनसंख्या के समक्ष सामने आई है। इस कमेटी के अनुसार इन संस्थानों के विदेशी फंडिंग पर तत्काल प्रभाव से प्रतिबंध लगाना चाहिए, और दिलचस्प बात तो यह है कि डच सरकार की कैबिनेट भी इससे पूर्णतया सहमत है।

डच संसदीय कमेटी की यह चिंता उचित भी है, क्योंकि तुर्की ने अपने आधिकारिक धार्मिक प्रोपेगेंडा संगठन डियानेट यानि धार्मिक गतिविधि निदेशालय [Directorate of Religious Affairs] को नीदरलैंड्स में स्थित तुर्क मूल के डच अल्पसंख्यकों को प्रभावित करने का जिम्मा सौंपा गया है। इस कारण ये अल्पसंख्यक अब न केवल तुर्की के तानाशाह Recep Tayyip Erdoğan की प्रशंसा कर रहे हैं, अपितु अपने ही देश के विरुद्ध भी जाने को तैयार है। कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार डियानेट का प्रमुख उद्देश्य नीदरलैंड्स में इस्लाम का प्रचार कराना है। चिंताजनक बात तो यह है कि नीदरलैंड्स में कम से कम एक तिहाई, यानि 148 मस्जिदें इस कुख्यात संगठन से जुड़े हुए है, और इनका प्रतिनिधित्व डियानेट द्वारा मान्यता प्राप्त इस्लामिक फाउंडेशन नीदरलैंड्स करता है।

सच कहें तो इस्लामिक देश मस्जिदों के जरिये गैर मुस्लिम देशों में अपनी पैठ जमाने का हरसंभव प्रयास कर रहे हैं। जब नीदरलैंड्स में ऐसी स्थिति है, तो बाकी देशों में इन इस्लामिक संगठनों और उनके आकाओं का क्या प्रभाव क्या होगा, ये शायद ही हम माप पाएँ। ऐसे सॉफ्ट पावर को कट्टरपंथ में परिवर्तित होने में अधिक समय नहीं लगता है, और इस कुत्सित अभियान के प्रति सतर्क न रहने के क्या दुष्परिणाम होते हैं, वो आप स्वीडन और यूके के उदाहरणों से समझ सकते हैं, जहां अत्यंत उदारवाद के कारण कट्टरपंथी मुसलमानों ने  ‘No Go Zones’ तक बना लिए हैं।

सच कहें तो अब दुनिया भर में मस्जिदें कहीं कट्टरपंथ को बढ़ावा देने का जरिया बन चुकी हैं, तो कहीं  आतंकवाद को पनाह देते हुए भी पकड़े जाते हैं। इन संस्थानों को जिस प्रकार से कुछ लोग बेहिसाब फंडिंग देते हैं, वो वर्तमान समस्या का मूल कारण है, और ऐसे में जिस तरह से नीदरलैंड इस विषय पर काम कर रहा है, उसी प्रकार सभी संस्थानों को भी काम करना चाहिए, क्योंकि नीदरलैंड्स इकलौता देश नहीं है जहां आतंकी और देशविरोधी गतिविधियों को बढ़ावा देने हेतु मस्जिदों में निवेश किया जाये।

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