किस तरह तेल की घटती कीमतों के कारण अरब देश भारत के करीब हुए और पाकिस्तान को दूर किया

पाकिस्तान अब पूरी दुनिया के लिए एक गैर-ज़रूरी देश बन गया है

अरब

सऊदी और पाकिस्तान के रिश्तों में तनाव अपने चरम पर पहुँच चुका है। कश्मीर और OIC जैसे मामलों पर अरब देशों के रुख ने पाकिस्तान को कुंठित कर दिया है, जिसके कारण हाल ही में पाकिस्तानी विदेश मंत्री ने OIC का नेतृत्व कर रहे सऊदी अरब को OIC के इतर एक अलग मुस्लिम मंच स्थापित करने की धमकी तक दे डाली है। उसके बाद पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष की विफल सऊदी यात्रा से यह स्पष्ट हो गया कि, अरब देशों और पाकिस्तान की दोस्ती अब आधिकारिक तौर पर खत्म हो चुकी है। अरब देशों के लिए अब भारत एक बेहद अहम रणनीतिक साझेदार देश बन गया है, जिसके कारण कश्मीर उनके लिए अब कोई मुद्दा रहा ही नहीं। वर्ष 2004-05 के बाद से ही अरब देशों और भारत के बीच द्विपक्षीय रिश्ते मजबूत होते गए हैं। यह वही समय था जब पश्चिमी देश सऊदी के तेल पर अपनी निर्भरता को कम कर रहे थे। ऐसे में अरब देश को भारत के रूप में नया और विशाल मार्केट मिला। यहाँ से ना सिर्फ अरब देशों और भारत के रिश्तों का नया अध्याय शुरू हुआ, बल्कि इसके बाद सऊदी-पाकिस्तान के रिश्ते भी हमेशा के लिए बदल गए।

वर्ष 2000 से पहले अरब देशों और पाकिस्तान के बीच बेहद गहरे रिश्ते थे। सऊदी का पाकिस्तान के धार्मिक संस्थानों, सरकार और सेना पर गहरा प्रभाव था। उन दिनों अरब देश भारत की आलोचना करने से भी नहीं घबराते थे। उदाहरण के लिए वर्ष 1992 में उत्तर प्रदेश में जब बाबरी मस्जिद को गिराया गया, तब अरब देशों ने गहरी चिंता जताई थी और वहां की मीडिया में भारत के खिलाफ काफी कुछ लिखा जा रहा था। उस वक्त अरब देशों की दुनियाभर में तूती बोलती थी क्योंकि दुनिया में केवल वे ही “काले सोने” यानि crude oil के मालिक थे।

1970 के दशक की वैश्विक मंदी इस बात का सबूत है कि, उस वक्त अरब देशों का वैश्विक अर्थव्यवस्था पर कितना प्रभाव था। वर्ष 1973 के अरब-इजरायल युद्ध (yom kippur war) में जब अमेरिका ने इजरायल का साथ दिया, तो अरब देशों ने अमेरिका पर प्रतिबंध लगा दिये थे। इस कारण अमेरिका में भयंकर मंदी आ गयी थी।

हालांकि, उसके बाद सब कुछ बदल गया। पश्चिमी देशों को अहसास हो गया कि अरब के देशों पर उनकी ज़रूरत से ज़्यादा ही निर्भरता है। ऐसे में अमेरिका ने सऊदी के तेल के विकल्प तलाशना शुरू कर दिया। वर्ष 2005 में Fracking तकनीक के आविष्कार ने सब बदल दिया। Fracking के माध्यम से अमेरिका ने Subterranean चट्टानों से तेल और गैस निकालना शुरू कर दिया, जिसके बाद से ही अमेरिका लगातार पश्चिमी एशिया के तेल पर अपनी निर्भरता कम करता जा रहा है।

21वीं सदी की शुरुआत में ही अरब देशों को यह अहसास हो गया था कि वैश्विक अर्थव्यवस्था पर उनका एकाधिकार समाप्त होने वाला है। ऐसे में उन्हें भारत में अपने लिए अवसर दिखाई दिये। यही कारण था कि वर्ष 2002 में गुजरात दंगों पर अरब देशों ने कोई भी बयान देने से साफ मना कर दिया। उन्हें अब भारत की ज़रूरत थी। ऐसा इसलिए क्योंकि उनके पास तेल के खरीददार कम होते जा रहे थे।

आज सऊदी अरब और भारत रणनीतिक साझेदारी बन चुके हैं। वर्ष 2014 में देश में मोदी सरकार आने के बाद से UAE, ओमान, बहरीन और सऊदी अरब भारत के बड़े साझेदार बनकर उभरे हैं। यह वही समय था जब दुनियाभर में तेल के दामों में तेजी से गिरावट देखने को मिल रही थी। उस समय अमेरिका द्वारा बड़ी मात्रा में तेल उत्पादन से तेल के दामों में भारी कमी आ गयी थी, जिसके कारण सऊदी की अर्थव्यवस्था को और बड़ा झटका लगा था। पिछले एक दशक से सऊदी भारत की तेल आवश्यकताओं को पूरा करता आया है, तो वहीं भारत भी सऊदी का बड़ा व्यापारिक साझेदार बनकर उभरा है। वर्ष 2017 में सऊदी के कुल ऑइल एक्स्पोर्ट्स का करीब 11 प्रतिशत हिस्सा अकेले भारत ने खरीदा था। इस उभरती आर्थिक साझेदारी का ही परिणाम है कि अरब देशों में से एक भी देश ने कश्मीर, राम मंदिर, CAA और NRC जैसे मुद्दों पर एक शब्द भी नहीं बोला है, जबकि पाकिस्तान हर मुद्दे पर चीख-चीख कर अरब देशों से भारत के खिलाफ बोलने की अपील करता रहा है।

वर्ष 2016 में सऊदी ने अपनी इकॉनमी को diversify करने के लिए विज़न 2030 को लॉंच किया था, जिसमें भारत को अहम स्थान मिला है। सऊदी के लिए भारत एक पसंदीदा investment destination है, जहां उसे निवेश के बड़े रिटर्न्स मिलते हैं। इसके अलावा यह भी माना जा रहा है कि, वर्ष 2050 तक भारत ही वह देश होगा जहां तेल की सबसे ज़्यादा डिमांड होगी। ऐसे में अरब देश आज भारत के खिलाफ जाने की सोच भी नहीं सकते।

यही बड़ा कारण है कि अरब देशों ने अब पाकिस्तान और खासकर कश्मीर मुद्दे को अपनी प्राथमिकताओं से बाहर कर दिया है। पिछले 15 सालों से चले आ रहे भारत-सऊदी के आर्थिक रिश्ते अब रणनीतिक साझेदारी में बदल चुके हैं। भारत-अरब के रिश्तों ने पाकिस्तान को इस्लामिक जगत में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में एक गैर-ज़रूरी देश बना दिया है। सऊदी-पाक के खराब होते रिश्ते इसी बात का प्रमाण हैं।

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