ओली एक असहाय नेता हैं, भारत से नफरत के बाद मदद के लिए भारत की ओर देख रहे हैं

सीमा पर जारी तनाव के बीच नेपाल और भारत के बीच सोमवार को उच्च स्तरीय बैठक हुई। इस दौरान भारत और नेपाल के शीर्ष राजनयिकों ने भारत की मदद से नेपाल में चल रही विकास संबंधी विभिन्न परियोजना की प्रगति की समीक्षा की। भले ही इस बैठक का सीमा विवाद से कोई संबंध न हो फिर भी इसकी टाईमिंग महत्वपूर्ण मानी जा रही है, वो भी तब जब भारत और नेपाल अपने द्विपक्षीय रिश्तों का सबसे बुरा दौर देख रहे हैं। ऐसे में इस बैठक के द्वारा यही संकेत मिलते हैं कि भारत अब भी नेपाल के लिए बहुत महत्वपूर्ण है, भले ही दोनों के बीच सीमा विवाद हो। गौरतलब है कि 15 अगस्त को भारतीय स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर नेपाल के प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली ने भारत के प्रधानमंत्री को बधाई दी।

बता दें कि पिछले कुछ समय से ओली का व्यवहार भारत के प्रति कड़वाहट भरा रहा है। वो भारत के खिलाफ बयानबाजी करने से भी बाज नहीं आए। के प्रति अपने रुख को लेकर ओली नेपाल में ही बुरी तरह घिर चुके हैं। हाल ही में रिपोर्ट आयी थी की चीन ने नेपाल की जमीन को हड़प लिया है। चीन ने नेपाली सीमा पर 10 स्थानों को अपने कब्जे में ले लिया था। इस खबर को रिपोर्ट करने वाले पत्रकार बलराम बनिया की नेपाल में संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई है। 50 वर्षीय पत्रकार की बागमती नदी के किनारे लाश मिलने के बाद चीन और ओली सरकार के प्रति आम नेपालीयों में गुस्सा और भी बढ़ गया है । पत्रकार संघ का कहना है कि उन्हें इस बात की आशंका है कि इस हत्या के पीछे चीन का हाथ है। ओली की सरकार पर नेपाल की जनता का दबाव बढ़ता जा रहा है।

वास्तव में ओली अपनी नीतियों के जाल में फंस चुके हैं। ओली ने नेपाल की राष्ट्रवादी भावनाओं को भढ़काने के लिए कालापानी विवाद को हवा दी। भारत के प्रधानमंत्री मोदी ने, प्रधानमंत्री बनने के बाद, अपने पहले नेपाल दौरे के समय इन सभी विवादों का समाधान करने के लिए कमिशन का गठन करने का समझौता कर लिया था। ऐसे में जो विवाद बातचीत की मंच पर थे उन्हें उठाकर ओली ने साफ़ जाहिर कर दिया था की वे चीन के इशारों पर काम कर रहे है हैं।

ओली सरकार ने ऐसे समय में भारत के साथ सीमाविवाद उठाया जब भारत पहले ही चीन के साथ संघर्ष में जूझ रहा था। इसलिए भारत ही नहीं नेपाल में भी इस बात पर लोगों का विश्वास पुख्ता हो गया कि ओली सरकार पूर्णतः चीन के इशारे पर चल रही है। यहाँ तक कि नेपाली विदेशन नीति के विशेषज्ञों भी मानने लगे हैं कि ऐसे समय में भारत विरोध करना ओली की बड़ी रणनीतिक भूल है।

वास्तव में ओली के शासन से पहले भी नेपाल चीन और भारत के बीच संतुलन बनाकर चलने की नीति पर चर्चा होती थी। नेपाल में बहुत से लोगों का मानना था कि ऐसा नेपाल के आर्थिक विकास के लिए महत्वपूर्ण है। दक्षिण एशिया के अन्य देशों की तरह ही नेपाल भी चीन के “बेल्ट एंड रोड प्रोजेक्ट” का हिस्सा बन गया।

तब तक भारत और चीन के तमाम टकरावों के बाद भी दोनों देशों में आपसी सहयोग था। भारतीय क्षेत्र में चीन की आक्रामकता के बाद भी भारत चीन के खिलाफ पहले उतना मुखर नहीं था। परंतु मोदी सरकार में भारत की चीन नीति में धीरे-धीरे बदलाव आया जो पहली बार डोकलाम standoff के समय खुलकर दिखा था।  लेकिन गलवान के टकराव के बाद तय हो गया है कि अब भारत और चीन एकसाथ नहीं चल सकते। ऐसे में नेपाल जैसा छोटा देश, जो दोनों क्षेत्रीय महाशक्तियों के साथ बॉर्डर साझा करता है, भारत और चीन के बीच संतुलन बनाने में असफल रहा। उसपर भी ओली का अनावश्यक भारत विरोध और चीन द्वारा नेपाल की जमीन हड़पने पर भी ओली के लिए गले में फंसी हड्डी हो गया है।

अब ओली सरकार के पास विकल्प सीमित हैं। या तो वे किसी प्रकार से भारत और चीन के बीच वाकई संतुलन बना लें, या फिर वे भारत की मदद से अपने वपर चीन के दबाव को कम करें। उनके पास अब अनावशयक भारत विरोध का रास्ता बंद हो चुका है और इसका इशारा भारत में नेपाल के राजदूत के बयान से भी लगाया जा सकता है, जिन्होंने कहा है की “नेपाल और भारत के रिश्ते बहुत प्रगाढ़ और दोस्ताना हैं और दोनों देश किसी भी विवाद को कभी भी बैठकर सुलझा सकते हैं।”

साफ दिख रहा है कि ओली इस बात को समझ गए हैं कि मालदीव और श्रीलंका की तरह नेपाल को भी चीन ने बुरी तरह से अपनी जकड़ में ले लिया है और यहाँ से उनकी रक्षा केवल भारत सरकार ही कर सकती है। यही कारण है कि वे भारत के प्रति नर्म रुख अपनाने लगे हैं।

 

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