पाकिस्तान के अफगानिस्तान के साथ अब कोई संबंध नहीं, नागरिक सरकार और तालिबान दोनों पाक से दूर

अफगानिस्तान में हर ओर से पाकिस्तान को बहुत बड़ी "ना"

तालिबान

पाकिस्तान का आतंकवाद के प्रति लगाव और भारत को अस्थिर करने की इच्छा उसके लिए अब बहुत बड़ी मुसीबत बनती जा रही है। भारत द्वारा पारंपरिक युद्धों में हर बार मिली हर के बाद पाकिस्तान ने आतंकवाद को समर्थन देना शुरू किया था। बाद में इन्हीं आतंकी संगठनों से सांठगांठ के कारण उसे FATF की सख्ती और आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा। अब FATF से बचने की कोशिश में पाकिस्तान को तालिबान और हक्कानी नेटवर्क पर प्रतिबंध लगाने पड़े हैं।

पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में भी अपना प्रभाव भी खत्म कर लिया है। ऐसा इसलिए क्योंकि, तालिबान से प्रेम के कारण पाकिस्तान ने कभी अफगानिस्तान की सिविलियन सरकार के साथ अच्छे संबंध नहीं बनाए। उसने हमेशा तालिबान को समर्थन दिया। लेकिन अब तालिबान भी पाकिस्तान के साथ नहीं है और इसी के साथ अफगानिस्तान के सिविल वॉर में दोनों पक्षों ने पाकिस्तान से दूरी बना ली है।

सोवियत संघ द्वारा अफगानिस्तान में आक्रमण के बाद मुस्लिम जगत में आक्रोश फैल गया था। मुसलमानों ने इसके खिलाफ धर्मयुद्ध की शुरुआत कर दी थी। बड़ी संख्या में मुजाहिद्दीन तैयार हुए जो नास्तिक सोवियत संघ के खिलाफ लड़ने के लिए अफगानिस्तान पहुंचे। इनके लिए पाकिस्तान लॉन्चिंग बेस बन गया था।

पाकिस्तान ने इस मौके का फायदा विश्व में अपना राजनीतिक महत्त्व बढ़ाने और धन कमाने के लिए किया। अमेरिका और अरब देशों ने मुजाहिद्दीन सेना को धन और हथियार मुहैया कराए। इन सब के लिए पाकिस्तान ही माध्यम बना। नतीजा यह हुआ कि, पाकिस्तान दुनिया भर के कुख्यात आतंकियों के लिए पनाहगाह बन गया और दुनियाभर की टेरर फंडिंग का जरिया भी। लंबे समय तक इनका इस्तेमाल अफगानिस्तान में भारतीय हितों को नुकसान पहुंचाने और कश्मीर में आतंकवाद फैलाने में हुआ।

लेकिन 9/11 के बाद सब बदल गया। अमेरिका का अफगानिस्तान में हस्तक्षेप करना पाकिस्तान के सारे इरादों पर पानी फेर गया। तब से आजतक पाकिस्तान के आतंकी संबंध उसके लिए बोझ बने हुए हैं।

अब जब पारंपरिक युद्ध एक अंत की ओर हैं और पाकिस्तान सभी पक्षों के लिए किसी काम लायक नहीं रहा। अमेरिका जानता है कि पाकिस्तान चीन समर्थक है, ऐसे में वह नहीं चाहता कि अफगानिस्तान में उसका थोड़ा भी प्रभाव रहे। अफगानिस्तान की सरकार तो हमेशा से पाकिस्तान के खिलाफ रही है और अब तालिबान भी उसके खिलाफ हो गया है।

यही कारण है कि जब पाकिस्तान ने कश्मीर मामले में तालिबान को घसीटने की कोशिश की तो उसने इसे भारत का आंतरिक मामला करार देते हुए कहा कि वो किसी अन्य देश के आंतरिक मामलों में दखल नहीं देना चाहते।

आज बहुत कुछ बदल गया है। भारत एक वैश्विक शक्ति के रूप में उभर रहा है। भारत द्वारा अफगानिस्तान में किये गए निवेश, दवाओं की सप्लाई और अनाज की पूर्ति करने के कारण भारत को अफगानिस्तान में हर प्रभावी पक्ष एक मित्र देश मानता है। भारत ही एकमात्र ऐसी सैन्य शक्ति है जिसने सामर्थ्य होते हुए भी अफगानिस्तान में अमेरिका, रूस या किसी भी अन्य पक्ष का साथ नहीं दिया।

यही कारण है कि आज तालिबान का स्वार्थ भारत के साथ जुड़ा है। अफगानिस्तान के आर्थिक विकास के लिए उसे भारत की आवश्यकता है। यदि भारत, जो विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, उसे समर्थन दे या बातचीत की टेबल पर उसे भी एक वैधानिक पक्ष स्वीकार कर ले तो यह तालिबान की बड़ी कूटनीतिक जीत होगी

ऐसे में पाकिस्तान से दूरी बनाना तालिबान के लिए फायदे का सौदा है। वहीं पाकिस्तान की बात करें तो FATF की तलवार और तालिबान की दुलत्ती दोनों ने उसे इस बात के लिए मजबूर किया है कि वह हक्कानी नेटवर्क पर प्रतिबंध लगाकर अपने हितों की आधिकारिक बलि दे। वैसे पाकिस्तान का क्षेत्र में अप्रासंगिक होना न सिर्फ भारत, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया के लिए अच्छी खबर है।

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