मैदान ASEAN का, लड़ाई अमेरिका और चीन की; चीन को जीतना होगा वरना उसका बर्बाद होना तय

चीन के लिए करो या मरो का मुक़ाबला!

चीन

अमेरिका और चीन के बीच का तनाव अब चीन के पिछले दरवाजे तक आ पहुंचा है और इससे चीन को बड़ी घबराहट हो रही है। अमेरिका अब दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के संगठन यानि आसियान को अपने साथ मिला रहा है। अब तक चीन आसियान को अपनी तरफ रखने में कामयाब रहा था। जब पूरी दुनिया चीनी व्यापार पर प्रतिबंध लगा रही थी, तब आसियान अमेरिका और यूरोपीय संघ को पछाड़कर चीन का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार बन गया था।

अब चीन का अमेरिका से तनाव धीरे-धीरे आसियान तक भी पहुंच रहा है। अमेरिका अपने QUAD सहयोगियों- भारत, ऑस्ट्रेलिया और जापान की मदद से, दो प्रमुख जलस्रोतों यानि दक्षिण चीन सागर और मेकांग नदी के ऊपर अपना प्रभाव बढ़ा रहा है ताकि अवैध चीनी आधिपत्य चुनौती दी जा सके और आसियान देशों को अपनी तरफ लाया जा सके। अमेरिकी चाल को देखते हुए अब चीन ने मेकांग नदी और दक्षिण चीन सागर दोनों में अपनी आक्रामक स्थिति को कम करना शुरू कर दिया है ताकि वो भी आसियान देशों को अपने पाले रख सके।

ट्रम्प प्रशासन लगातार रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण दक्षिण चीन सागर में चीन के आस-पास अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ा रहा है। विवादित जलमार्गों में अमेरिकी तैनाती से आसियान देशों को चीन की गुंडई के खिलाफ बोलने का एक अच्छा मौका मिला है और वो इसका भरपूर फायदा उठा रहे हैं। इसकी शुरुआत तब हुई जब अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने विवादित जलमार्गों के लिए एक नई और सख्त अमेरिकी नीति की घोषणा की।

अमेरिका की इस रणनीतिक चाल के बाद चीनी सरकार को यह महसूस हुआ कि दक्षिण चीन सागर में वियतनाम, ब्रुनेई, मलेशिया और इंडोनेशिया जैसे देशों पर आक्रामकता दिखाने से ये देश अमेरिका की तरफ और ज्यादा आकर्षित होंगे। यही कारण है कि, चीनी सरकार ने अगस्त की शुरुआत में एक अभूतपूर्व निर्णय लेते हुए, सभी आसियान सदस्य देशों के राजनायिकों को बुलाया और दक्षिण चीन सागर में एक आचार संहिता (COC) के गठन लिए कहा।

आसियान देश वर्ष 1996 से ही दक्षिण चीन सागर में सहयोग के नियमों को औपचारिक रूप से लागू करना चाहते हैं। लेकिन चीन अपनी विस्तारवादी नीति के कारण कभी सहमत नहीं हुआ। नियमों को ताक पर रख उसने आस-पास के देशों को अपनी ताकत दिखा कर आतंकित करने की नीति पर काम किया, ताकि वह इस क्षेत्र पर अपना प्रभुत्व जमा सके।

पर अब जब अमेरिका चीन को उसकी औकात बताने को तैयार है, तब चीनी राजनयिक समुद्री क्षेत्र में कानूनी रूप से बाध्यकारी COC को लागू करवाना चाहते हैं। अब आसियान देशों के राजनयिक भी यह महसूस कर रहे हैं कि, दक्षिण चीन सागर में मुद्दों को हल करने के लिए बीजिंग अधिक इच्छुक है।

इसी तरह, अमेरिका और जापान ने मेकांग नदी में चीनी एकाधिकार को चुनौती दी है। मेकांग नदी, जिसे चीन में Lancang के रूप में जाना जाता है, वह लोअर मेकांग बेसिन (LMB) के देशों जैसे लाओस, वियतनाम, कंबोडिया और थाईलैंड में रहने वाले लगभग 70 मिलियन लोगों के लिए एक जीवनधारा की भूमिका निभाती है। मेकांग केवल अपने जल के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि इसलिए भी है क्योंकि यह नदी LMB देशों में मछलीपालन और धान की खेती को बढ़ावा देती है। अगर यह नदी सूख गयी तो दक्षिण पूर्व एशियाई देशों में भुखमरी आना तय है।

यह सच है मेकांग नदी सूख रही है। इसका कारण कोई और नहीं बल्कि चीन है जिसने मेकांग नदी पर 11 विशाल बांध बना दिये हैं। ये बांध लगभग 47 बिलियन क्यूबिक मीटर से अधिक की जल क्षमता को संरक्षित कर सकते हैं जो मेकांग को सुखाने के लिए काफी है।

लेकिन अब अमेरिका ने इस मुद्दे पर चीन को निशाना बनाना शुरू कर दिया है। हाल ही में कंबोडिया में अमेरिकी राजदूत पैट्रिक मर्फी ने बीजिंग पर तीखा हमला करते हुए कहा था कि, चीन द्वारा पानी की जमाखोरी के कारण ही मेकांग नदी का जल स्तर घटा है और Lower Mekong Basin में बदलाव हो रहा है।

अमेरिका बीजिंग पर एक और हमला करते हुए Mekong River Commission (MRC) के जैसा एक अलग निकाय स्थापित कर रहा है, जिसे Lancang Mekong Cooperation(LMC) कहा जा रहा है। इस तरह से देखा जाए तो मेकांग नदी का मुद्दा चीन और ASEAN देशों के बीच तनाव का मुख्य कारण बन सकता है।

इस बीच, SCMP की एक रिपोर्ट के अनुसार, जापानी विदेश मंत्री Toshimitsu Motegi ने भी निचले मेकांग क्षेत्र के देशों की मदद करने का वादा किया है। इससे चीनियों के खिलाफ बन रहे माहौल को और मजबूती मिली है।

मेकांग में अमेरिका के रणनीतिक हस्तक्षेप से चीन बौखला गया है। हाल ही में, चीनी प्रधानमंत्री Li Keqiang ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से तीसरे Lancang-Mekong Cooperation (LMC) नेताओं की बैठक में भाग लिया। यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि इन देशों को लालच देते हुए उन्होंने LMB देशों को COVID-19 के वैक्सीन बन जाने पर पहले उन्हें ही सप्लाइ करने का आश्वासन दिया।

यहां दो मुद्दे हैं, पहला तो यह कि चीन ने अभी तक कोरोना की वैक्सीन विकसित नहीं की है और दूसरा यह कि, वैक्सीन भोजन और पानी का विकल्प नहीं हो सकता है जो बीजिंग मेकांग देशों से छीनना चाह रहा है।

इसलिए अब अमेरिका-चीन की प्रतिद्वंद्विता ASEAN तक पहुंच गई है। चीनियों को पता है कि इस क्षेत्र में अमेरिका अकेला नहीं है और उसे QUAD देशों से भरपूर मदद मिल रही है। जिस चीज़ से वह आज तक डरता आया है, अब वह उसके सामने वास्तविकता बन कर खड़ा है। आज इस क्षेत्र में बीजिंग के पास एक भी दोस्त नहीं बचा है और अब अमेरिका ASEAN देशों को भी अपने पाले में कर रहा है और वह कुछ नहीं कर पा रहा है।

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