Black Sea में शायद कोई Gas Reserve है ही नहीं, एर्दोगन बस अपनी डूबती इकॉनमी को बचाना चाहते हैं

Gas Reserve के झूठे दावे के साथ क्या दुनिया का पागल बना रहा है तुर्की? शायद हाँ

एर्दोगन

आज अगर चीन के बाद कोई देश सभी के गले का कांटा बना हुआ है तो वह है तुर्की। सीरिया में युद्ध, भूमध्य सागर में युद्ध और फिर ओटोमन साम्राज्य की भांति अन्य देशों के क्षेत्रों को हथियाना, तुर्की अब सभी की नजर में चढ़ चुका है। हालांकि, तुर्की की अर्थव्यवस्था गर्त में गोते लगा रही है, परंतु तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन ने इसे बचाने का नया उपाय ढूंढ लिया है। अब वे यह दावा कर रहे हैं कि तुर्की ने Black Sea में एक प्राकृतिक गैस भंडार के 320 बिलियन क्यूबिक मीटर (bcm) की खोज की है। टीवी पर एक भाषण में, एर्दोगन ने बताया कि 20 जुलाई को ड्रिलिंग शुरू करने वाले तुर्की के Fatih ड्रिलिंग जहाज ने ट्यूना-1 प्राकृतिक गैस क्षेत्र में भंडार की खोज की थी – जिसे Sakarya गैस क्षेत्र के रूप में भी जाना जाता है।

तुर्की की मुद्रा लीरा के मूल्य गिरने और मुद्रास्फीति के रिकॉर्ड ऊंचाई पर जाने के कारण तुर्की की अर्थव्यवस्था के लिए यह एक दर्दनाक संकट है। इसलिए, जब तुर्की ने Black Sea में गैस रिजर्व की खोज की, तो एर्दोगन ने तुरंत एक “नए युग” की शुरुआत की घोषणा कर दी। एर्दोगन का दावा है, Black Sea के गहरे पानी में प्राकृतिक गैस भंडार की खोज का तुर्की की अर्थव्यवस्था पर दूरगामी प्रभाव पड़ेगा। तुर्की की मंशा पर तब शक और गहरा हो जाता है जब एर्दोगन खुद सामने आकर बड़े-बड़े दावे कर रहे।

खैर अब ये गैस भंडार वास्तव में मिला है या नहीं इसकी पुष्टि खुद एर्दोगन के लिए भी करना मुश्किल होगा। हो सकता है कि ये दावा एर्दोगन की ही नीति का एक हिस्सा हो ताकि वह तुर्की से तेल खरीदने के लिए अन्य देशों को जोड़े रख सकें, जिससे इस देश की विदेशी मुद्रा भंडार बढ़े और अर्थव्यवस्था बचाई जा सके।

आज अगर तुर्की की मुसीबतें जो बढ़ी हैं उसके पीछे तुर्की के राष्ट्रपति की रूढ़िवादी नीतियां भी एक बड़ा कारण है। दरअसल, रूढ़िवादी एर्दोगन की नीतियां आर्थिक मामलों में भी दिखाई देते हैं। एर्दोगन के सत्ता में आने के शुरुआती दिनों में आर्थिक हालात बेहतर तो हुए थे, पर बाद में हालात बिगड़ने लगे। बीतते समय के साथ तुर्की अपनी नीतियों के कारण यूरोपीय संघ से दूर हुआ, और हागिया सोफिया पर लिए गए फैसले ने और कड़वाहट भरने का काम किया। भारत के मामलों में कश्मीर को लेकर एर्दोगन हस्क्षेप करते रहे हैं जिसके बाद भारत ने तुर्की से दूरी बनानी शुरू कर दी। एर्दोगन की नीतियों के कारण अमेरिका भी तुर्की से खुश नहीं।

आज तुर्की की हालत ऐसी है गई है कि उसके विदेशी मुद्रा भंडार में लगातार कमी आ रही है, इसकी मुद्रा अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुकी है। इसके अलावा तुर्की जाने वाले पर्यटकों में लगातार गिरावट हुई है, वहीं अमेरिका से प्रतिबंधों का खतरा मंडरा रहा है जिससे तुर्की की अर्थव्यवस्था गर्त के मुहाने पर है। ऐसे में विदेशी मुद्रा भंडार का लगातार गिरना तय है। तुर्की के सेंट्रल बैंक के आंकड़ों के अनुसार, इस साल इस्तांबुल स्टॉक एक्सचेंज में विदेशी निवेश 32.3 बिलियन अमेरिकी डॉलर से घटकर 24.4 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया है। वर्ष 2013 में यह आंकड़ा 82 बिलियन अमेरिकी डॉलर था। पिछले 16 वर्षों में ऐसा पहली बार हुआ है कि 50 प्रतिशत से कम शेयरों का स्वामित्व विदेशी निवेशकों के पास है। कोई भी एक ऐसे देश में निवेश नहीं करना चाहता है जहाँ की अर्थव्यवस्था पहले ही गर्त में जा रही हो, और ऊपर से उस देश का मुखिया जो आये दिन अपने क़दमों से दोस्त कम दुश्मन अधिक बना रहा हो तो भला कोई क्यों निवेश कर रिस्क उठाये।  निवेशकों को पता है कि तुर्की के बढ़ते कदमों के कारण अमेरिका और यूरोपीय संघ जैसी शक्तियाँ कभी भी प्रतिबंध लगा सकती है।

एर्दोगन की कमज़ोर आर्थिक नीतियों ने तुर्की को एक विकासशील अर्थव्यवस्था से आज दिवालियापन के कगार पर खड़ी अर्थव्यवस्था बना दिया है। अब गैस भंडार मिलने की खबर से तुर्की के लोगों में उत्साह है परन्तु इस खबर की सच्चाई से वो भी अनभिज्ञ हैं।

ऐसे में हम कह सकते हैं कि शायद एर्दोगन तुर्की के लोगों को एक विशाल गैस भंडार के खोज के नाम पर झूठी उम्मीद बेच रहे हैं। अब एर्दोगन गैस भंडार के दावे के साथ अन्य देशों का ध्यान तुर्की की ओर करना चाहते हैं ताकि वो सभी तुर्की से तेल लेते रहे और तुर्की की अर्थव्यवस्था को फिर से पटरी पर ले आये। परंतु तुर्की का यह दावा वैसा ही है जैसे बुझते दीये की लौ का प्रकाश। Economist के अनुसार, 320 बीसीएम प्राकृतिक गैस का भंडार अधिकतम सात वर्षों तक तुर्की की अपनी मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त होगा है लेकिन यह तुर्की की किस्मत नहीं बदल सकता और वह गैस निर्यातक नहीं बन सकता।

परंतु एर्दोगन अन्य देशों का तुर्की में भरोसा बनाए रखना चाहते हैं जिससे उनकी अर्थव्यवस्था न डूबे और इसके लिए अब वे एक गैस भंडार की खोज का दावा कर रहे हैं वह भी गाजे-बाजे के साथ। तुर्की समर्थक सरकारी मीडिया ने भी एर्दोगन के अतिशयोक्ति का खूब समर्थन किया और गैस खोज की मार्केटिंग तुर्की की समस्याओं के अंत के रूप में की। लेकिन यह तुर्की के आर्थिक संकट का कोई हल नहीं है। और जिस तरह से Lira की कीमत लगातार गिर रही है उससे यह स्पष्ट है कि गैस के भण्डार से तुर्की के दिन नहीं लौटने वाले बल्कि एर्दोगन को अपनी नीतियों में बदलाव करने होंगे।

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