पीएम मोदी और डोनाल्ड ट्रम्प ने अब हमेशा के लिए मालदीव को चीन से छीन लिया है

PM मोदी के दिमाग और ट्रम्प की चाल से मालदीव में चीन हुआ चित!

मालदीव

चीन को बड़ा झटका देते हुए मालदीव ने अमेरिका के साथ एक रक्षा समझौता कर लिया है। अमेरिका की ओर से दक्षिण और दक्षिण-पूर्वी एशिया के डिप्टी असिस्टेंट सेक्रेटरी फॉर डिफेंस रीड वार्नर और मलेशिया की ओर से रक्षा मंत्री मारिया ने समझौते पर हस्ताक्षर किए।  Framework for U.S. Department of Defense-Maldives Ministry of Defence Defense and Security Relationship नामक समझौते के तहत दोनों देशों की सेनाएं हिन्द महासागर की सुरक्षा के लिए सहयोग करेंगी।

 

महत्वपूर्ण यह है कि दोनों देशों ने हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में स्वतंत्र नाविक आवागमन के लिए अपनी प्रतिबद्धता दिखाई है। यह सीधे तौर पर संकेत करता है कि मालदीव पूरी तरह से चीन विरोधी धड़े में शामिल हो गया है।

वैसे तो मालदीव कोई महत्वपूर्ण सैनिक शक्ति नहीं है, किंतु हिंद महासागर में इसकी स्थिति इस देश के सामरिक महत्व को बढ़ाती है। यही कारण रहा है कि मालदीव को चीन डेट ट्रैप पॉलिसी में फंसाकर अपने पक्ष में करना चाहता था। मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन के शासन के दौरान मालदीव पूरी तरह से चीन के पक्ष में हो गया था। चीन ने उसे 3 बिलियन डॉलर का लोन देकर डेट ट्रैप में फंसा लिया था।

इब्राहिम मोहम्मद सोलिह के शासन में आने पर मालदीव की विदेश नीति में परिवर्तन आना शुरू हुआ। इसमें सबसे महत्वपूर्ण भूमिका प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रही। भारत श्रीलंका की तरह मालदीव को भी चीन के चंगुल से छूटने में सहायता प्रदान कर रहा है। मालदीव को भारत सरकार ने कुल 500 मिलियन डॉलर की आर्थिक मदद देने का फैसला किया है।

भारत द्वारा मालदीव में Greater Male connectivity project की शुरुआत की जा रही है, जो Maldives में अब तक का सबसे बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट है। इस प्रोजेक्ट में मालदीव की राजधानी माले के तीन द्वीपों (Villingili, Gulhifahu and Thilafushi) को जोड़ा जाएगा।

इतना ही नहीं दोनों देशों ने द्विपक्षीय व्यापार बढ़ाने के लिए भी समझौता किया है। भारत और मालदीव के बीच direct cargo ferry service भी शुरू होगी।  मालदीव खाद्यान्न सहित अन्य कई जरूरी सामानों के लिए पूर्णतः आयात पर निर्भर है ऐसे में यह योजना मालदीव के बाजारों तक भारतीय उत्पादों को पहुंचाने में काफी मददगार होगी।

भारत ने पहले ही मालदीव को आर्थिक और खाद्य सुरक्षा दी है, अब अमेरिका द्वारा सामरिक सुरक्षा दिए जाने के बाद इस देश पर से चीन का खतरा पूर्णतः समाप्त हो गया है। भारत का अमेरिका के साथ रक्षा सहयोग तेजी से बढ़ रहा है। भारत अमेरिका की हिन्द-प्रशांत क्षेत्र की रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण साझीदार है। ऐसे में इस बात की उम्मीद है कि आने वाले समय में भारत भी मालदीव के साथ कोई मिलिट्री लॉजिस्टिक समझौता करे या इसी समझौते का हिस्सा बन जाए।

वैसे भी अमेरिका और भारत के बीच एक दूसरे के सैन्य ठिकानों के इस्तेमाल को लेकर समझौता हो चुका है। साथ ही भारत दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और जापान के साथ भी ऐसे समझौते कर चुका है जिसके चलते भारत को हिन्द महासागर क्षेत्र में चीन पर अच्छी खासी बढ़त हासिल है।

अब अमेरिका यह  समझौता करना, भारत की हिंद महासागर नीति के लिए एक और लाभकारी पहलू है। अमेरिका की नौसेना पहले ही मालदीव के समीप डिएगो गार्सिया टापू पर स्थित अपने सैन्य बेस द्वारा हिन्द महासागर में भारत की सहायता करने के लिए तत्पर रहती हैं। ऐसे में अमेरिका की नौसेना को मालदीव के बंदरगाहों की भी पहुंच मिलती है तो उनकी उपस्थिति इस क्षेत्र में और बढ़ेगी, जो भारत के लिए अच्छा है।गौरतलब है कि लद्दाख में भारत और चीन के बीच चल रहे स्टैंड ऑफ के दौरान, भारत के प्रति अपना समर्थन प्रदर्शित करने के लिए अमेरिका ने अपने B2 बॉम्बर डिएगो गार्सिया सैन्य बेस पर तैनात कर दिए थे।

भारत के लिए सामरिक दृष्टि से भी यह  अत्यंत महत्वपूर्ण है।  मालदीव दक्षिण भारत के सबसे निकट स्थित देशों में है, यदि यहाँ चीन को अपने सैन्य अड्डे बनाने या सर्विलांस सिस्टम तैनात करने का मौका मिल जाता तो भारत के लिए चुनौतियां बढ़ जाती। चीन इनका इस्तेमाल भारतीय नौसेना की गतिविधियों की निगरानी हेतु कर सकता था। लेकिन अमेरिका ने इसकी सभी संभावनाएं समाप्त कर दी हैं। मोदी सरकार और ट्रंप प्रशासन मिलकर हिन्द प्रशांत क्षेत्र को चीन के वर्चस्व से मुक्त करने के लिए प्रयास कर रहे हैं और मालदीव से समझौता दोनों नेताओं की सफल विदेश नीति का ही परिणाम है।

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