“सारा तेल का खेल है”, आर्मीनिया-अज़रबैजान के युद्ध से आखिर दुनिया चिंतित क्यों है?

दो छोटे देशों की लड़ाई में क्यों कूद रही हैं बड़ी Powers?

आर्मीनिया

अज़रबैजान और Armenia (आर्मीनिया) की लड़ाई अब एक हिंसक युद्ध की ओर अग्रसर हो रही है। वे Nagorno Karabakh नामक क्षेत्र के लिए लड़ते हुए दिखाई दे रहे हैं। लेकिन जिस प्रकार से इन दो छोटे देशों के बीच की हिंसक झड़प में फ्रांस, रूस और तुर्की भी शामिल हो रहे हैं, उससे एक प्रश्न तो पूछना बनता है – यह लड़ाई केवल ज़मीन के लिए है, या किसी और बात के लिए?

यहां पर दक्षिण Caucasus क्षेत्र की रणनीतिक अहमियत सामने आती है। दरअसल, दक्षिण Caucasus क्षेत्र न केवल एक अहम कनेक्टिविटी हब है, अपितु जिस क्षेत्र के लिए आर्मीनिया और अज़रबैजान लड़ रहे हैं, वो असल में एक अहम तेल आपूर्ति मार्ग भी है। अज़रबैजान और आर्मीनिया की Nagorno Karabakh के लिए लड़ाई आज से नहीं, बल्कि पिछले 100 वर्षों से चली आ रही है। आर्मीनिया और अज़रबैजान किसी समय सोवियत संघ का ही हिस्सा थे। जहां आर्मीनिया ईसाई बहुल देश है, तो अज़रबैजान इस्लाम बहुल देश है।

इसी भांति Nagorno Karabakh के लिए लड़ाई भी इन्हीं समीकरणों के इर्द गिर्द घूमती है। अंतर्राष्ट्रीय रूप से इस क्षेत्र को अज़रबैजान का हिस्सा माना गया है, लेकिन इस क्षेत्र में मूल रूप से आर्मीनियाई लोगों का निवास है। 1990 के दशक से Nagorno Karabakh क्षेत्र पर आर्मीनिया का अधिकार है। 1991 में स्वयं Nagorno Karabakh ने अज़रबैजान से अपने आपको स्वतंत्र घोषित किया, और इसलिए आर्मीनिया ने इस क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाना शुरू किया।

परंतु अज़रबैजान और आर्मीनिया के बीच की लड़ाई न सिर्फ इस क्षेत्र की शांति भंग कर रही है, अपितु यूरोप के ऊर्जा परिवहन को भी काफी नुकसान पहुँच रहा है। इसी क्षेत्र के जरिये अज़रबैजान से तेल और गैस की दो पाइपलाइन पूरे यूरोप को तेल और गैस सप्लाई करती है। ऐसे में इस क्षेत्र में अज़रबैजान और आर्मीनिया के बीच युद्ध का अर्थ है कि यूरोप को Caspian क्षेत्र से तेल और गैस की निर्बाध आपूर्ति नहीं मिल पाएगी।

Caspian क्षेत्र तेल और गैस के भंडारों से सम्पन्न है, और यहां की क्षेत्रीय शक्तियां इन संसाधनों को पूरे यूरोपीय महाद्वीप में वितरित करना चाहती हैं। लेकिन Caspian क्षेत्र से ऊर्जा को निर्यात करने के केवल दो ही मार्ग हैं। एक रूस के रास्ते उत्तर पश्चिम दिशा से होते हुए जाता है, और दूसरा दक्षिण पश्चिमी दिशा से Caucasus क्षेत्र के रास्ते होते हुए जाता है। ऐसे में यदि आर्मीनिया और अज़रबैजान के बीच तनातनी युद्ध में परिवर्तित होती है, तो रूस पर अपने तेल और गैस की आवश्यकता के लिए निर्भरता को कम करने में जुटे बाकी यूरोपीय देशों के लिए किसी आपदा से कम नहीं होगा।

पर तेल और गैस की आपूर्ति तो इस समस्या का केवल एक ही पहलू है। चूंकि दक्षिण Caucasus अंतर्राष्ट्रीय चौराहे पर स्थित है, इसलिए यह एशिया को यूरोप से भी जोड़ सकता है।  ऐसे में चीन के प्रभाव को भी नहीं नकारा जा सकता है। अज़रबैजान जैसे देशों की लोकेशन चीन के तथाकथित BRI परियोजना के लिए बेहद अहम माना जा रहा है।

चीन भली भांति जानता है कि वह तब तक यूरोप नहीं पहुंच सकता, जब तक वह दक्षिण Caucasus में निवेश नहीं करता, और इसीलिए चीन एक ट्रांस कैस्पियन इंटरनेशनल ट्रांजिट रूट का निर्माण कर रहा है, जिसका एक महत्वपूर्ण हिस्सा बाकू, तुलसी और कार्स को पार करने वाला रेल मार्ग है। यह रेल लाइन चीनी सामान को तुर्की तक पहुँचने का सबसे छोटा और सबसे सरल रूट माना जा रहा है, लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि इस रूट के कारण चीन को यूरोप पहुँचने में एक महीने के बजाए अब केवल 15 दिन लगते हैं।

चीन विवादित Nagorno Karabakh क्षेत्र से गुजरने वाले तेल और गैस आपूर्ति मार्गों के महत्व को भी समझता है। चीनी राज्य मीडिया आउटलेट CGTN ने यहां तक ​​बताया है कि, “Nagorno Karabakh क्षेत्र भौगोलिक रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह यूरोप और क्षेत्र के अन्य देशों के लिए एक महत्वपूर्ण पाइपलाइन और ऊर्जा का द्वार है।”

वहीं, रूस और तुर्की के लिए भी आर्मेनिया और अजरबैजान न केवल भौगोलिक स्थिति के कारण महत्वपूर्ण हैं, बल्कि इसलिए क्योंकि दक्षिण Caucasus इस्लामी और रूढ़िवादी ईसाई के बीच टकराव का एक बड़ा कारण है।

तुर्की के लिए वर्तमान लड़ाई के पीछे मध्य एशिया का लिंक भी है। तुर्की मध्य एशिया तक प्रत्यक्ष रूप से नहीं पहुँच पाता, और उसके सपने के बीच में आर्मीनिया और Nagorno Karabakh के क्षेत्र आते हैं। आर्मीनिया पर हमला कर Nagorno Karabakh क्षेत्र पर कब्जा जमाना एर्दोगन के खलीफा बनने के प्लान का ही हिस्सा है। ऐसा इसलिए है क्योंकि तुर्की और मध्य एशिया को जोड़ने के लिए कोई स्पष्ट लिंक नहीं है, और दोनों क्षेत्रों में संबंध स्थापित करने में कथित रूप से आर्मीनिया और Nagorno Karabakh क्षेत्र के आड़े आ रहे हैं। वहीं, दूसरी तरफ पुतिन यह इसलिए नहीं होने देंगे क्योंकि मध्य एशिया पर पारंपरिक रूप से मॉस्को का प्रभाव रहा है। इसलिए यदि तुर्की ने अज़रबैजान का पक्ष लिया है, तो रूस को हर हाल ही में आर्मीनिया का बचाव करना होगा। ऐसे में यदि आर्मीनिया और अज़रबैजान के बीच युद्ध छिड़ा, तो रूस, यूरोप, चीन और तुर्की को इस युद्ध का हिस्सा बनने में ज़्यादा समय नहीं लगेगा।

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