आखिरकार चीन ने बता ही दिया कि क्यों छुपाया था उसने कोरोना से हुए मौतों का आधिकारिक आंकड़ा

जानिए, दुनिया के सबसे बड़े झूठ को, जिसका पर्दाफाश हो चुका है

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जब से कोरोना शुरू हुआ तब से लेकर आज तक चीन ने न तो कभी यह स्वीकार किया कि कोरोना की उत्पति उसके यहाँ से शुरू हुई और न ही कभी अपने देश के कोरोना पॉज़िटिव मामलों और मौतों की वास्तविक संख्या दुनिया के सामने रखा। परंतु अब ऐसा लगता है कि CCP के मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स ने अप्रत्यक्ष रूप से इस बात को स्वीकार कर लिया है कि आखिर चीन ने कोरोना से होने वाली मौतों और पॉज़िटिव मामलों को विश्व से क्यों छुपाया। ग्लोबल टाइम्स के लेख से यह स्पष्ट होता कि चीन ने पश्चिमी देशों की कड़ी प्रतिक्रिया आने के डर के कारण दुनिया के सामने सच को आने ही नहीं दिया।

अपने एक संपादकीय में अमेरिका को निशाना बनाते हुए ग्लोबल टाइम्स ने एक लेख प्रकाशित किया और अमेरिका में हुए कोरोना के कारण मौतों पर सवाल करते हुए कहा कि क्या होगा अगर चीन में 3,00,000 लोग कोरोनोवायरस से मर गए होते और अमेरिका तथा अन्य पश्चिमी देशों में यह महामारी नियंत्रण में होती?

इसी प्रश्न का उत्तर बताते हुए इस मीडिया पोर्टल ने अप्रत्यक्ष रूप से यह स्वीकार किया कि चीन आखिर अपने डेटा को पूरी दुनिया से क्यों छुपा रहा है। ग्लोबल टाइम्स ने लिखा कि यदि यह धारणा सच होती तो चीन पर लगातार पश्चिमी देशों का हमला होता और पश्चिमी जनमत के लिए वह एक निशाना बन जाता।

ग्लोबल टाइम्स ने बताया कि अमेरिका तथा अन्य देश चीन की मदद तो करते लेकिन तब कोरोना फैलने और उसके कारण हो रही मौतों के लिए एक राजनीतिक कारण को ढूंढा जाता। चीन में इतने बड़े पैमाने पर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट के राजनीतिक कारणों की और इसे फैलने से रोकने में चीन की असमर्थता पर कठोरता से जांच होती। अगर ऐसे होता तो पहला, वे इस बात पर जोर देते कि यह चीन की एक बड़ी मानवीय आपदा है, वह भी प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि मानव निर्मित आपदा।

ग्लोबल टाइम्स ने चेर्नोबिल परमाणु दुर्घटना का उदाहरण देते हुए लिखा कि इस दुर्घटना को उस समय पश्चिमी देशों द्वारा मानव निर्मित आपदा के रूप में लेबल किया गया था, और यह पश्चिम के लिए सोवियत संघ पर हमला करने का एक साधन बन गया था जो सोवियत संघ का पतन का एक निश्चित कारण बना। यदि कोरोनोवायरस से चीन में 3,00,000 लोग मारे जाते, तो चीन पर पश्चिमी हमलों की तीव्रता कल्पना से परे होती।

यही नहीं, ग्लोबल टाइम्स ने आगे लिखा कि “अमेरिका और पश्चिम देश चीन के तथाकथित सत्तावादी तंत्र की अकुशलता की आलोचना करते, और चीन पर देश तथा विदेश में जानकारी छुपाने का आरोप लगाए जाते ताकि चीन की व्यवस्था के कारण होने वाली उच्च मृत्यु दर की “अनिवार्यता” का खुलासा हो सके। यदि 3,00,000 चीनी लोग मारे गए होते, तो पश्चिमी देशों का चीन पर आरोप किसी परमाणु विस्फोट की तरह होता।“

इस लेख में ग्लोबल टाइम्स ने जिस चपलता के साथ लिखा है और इसे एक कल्पना बताने की कोशिश की है, वह कल्पना नहीं बल्कि सच का अनुभव है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि चीन ने जो सिर्फ 5000 मौतों का आधिकारिक  आंकड़ा दुनिया के सामने रखा है वो एक दिखावा है। वास्तविक मौतों का आंकड़ा उससे कई गुना अधिक होने का अनुमान लगाया गया है। चीन के शव गृहों के पास लगी भीड़ और अपारदर्शिता की कई रिपोर्ट्स आ चुकी हैं। जब वुहान शहर खुला था और मरने वालों के परिजन अस्थियाँ लेने पहुंचे तो नजारा कुछ और ही था। एक रिपोर्ट के अनुसार अनुमानित मृत्यु लगभग 40 हजार के ऊपर है। पश्चिमी देशों के हमले और सोवियत संघ की तरह टूटने के डर से ही अभी तक चीन ने पूरी तरह से अपारदर्शिता बनाई हुई है। चीन अपने इस लेख से यही समझाने की कोशिश है कि वह अपने कोरोनावायरस से हुई मौतों की संख्या दुनिया से क्यों छिपा रहा है। उसे पता है कि अगर वह अपने वास्तविक आंकड़ों को बता देगा तो उसका हश्र क्या होगा।

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