जानिए, कैसे कांग्रेस के अराजक आंदोलन ने उसके सबसे बड़े नेता अमरिंदर सिंह की छवि पर बट्टा लगा दिया

इस आंदोलन से भले ही कांग्रेस ने कुछ न पाया हो पर अपना सबसे बड़ा नेता खो दिया है

कांग्रेस

पंजाब-हरियाणा के किसानों का दिल्ली की सीमाओं पर चल रहा कृषि कानूनों के विरोध में आंदोलन पंजाब की अमरिंदर सरकार की उपज है, इस बात में कोई शक नहीं है। पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह शुरू से ही केंद्र द्वारा पारित कृषि कानूनों के खिलाफ बयान देते रहे हैं। उन्होंने ही पंजाब में सबसे पहले ट्रैक्टर रैली निकालकर किसानों के समर्थन में दिखने की कोशिश की, लेकिन कांग्रेस के केंद्रीय महकमे ने देश भर में अपनी राजनीति चमकाने के लिए कैप्टन अमरिंदर सिंह की छवि को सवालों के घेरे में ला दिया है क्योंकि अब कांग्रेस और कैप्टन दोनों के मंसूबे जनता के सामने आ रहे हैं।

अमरिंदर सिंह को पंजाब की राजनीति में हमेशा ही एक कद्दावर कांग्रेसी सिख चेहरे के रूप में देखा जाता था। सिखों के प्रति अमरिंदर का लगाव ऐसा रहा कि 1984 में जब ऑपरेशन ब्लूस्टार हुआ तो अमरिंदर ने इस्तीफा दे दिया, और 14 साल बाद दोबारा पार्टी की सदस्यता ली। कैप्टन अमरिंदर सिंह का अपना कद हमेशा ही कांग्रेस की राजनीति से लग रहा है। यही कारण था कि 2017 में जब पूरे देश में कांग्रेस की हार का सिलसिला जारी था तब भी पंजाब में कैप्टन ने अपने नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार का झंडा लहरा दिया था। खास बात यह भी थी कि कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने पंजाब के विधानसभा चुनावों में कोई तवज्जो नहीं दिखाई थी।

अब किसानों के मुद्दे पर कैप्टन की इस छवि का फायदा कांग्रेस ने राष्ट्रीय राजनीति में उठाने का सोचा, जिसके तहत केंद्र द्वारा पारित तीन कृषिक कानूनों के विरोध में शुरू से ही पंजाब में कांग्रेस ने अपना अलग एजेंडा चलाया। कैप्टन भी पार्टी हित के चलते किसानों के समर्थन में कूद पड़े, लेकिन जैसे-जैसे किसान आंदोलन के नाम पर खालिस्तानी समर्थकों की अराजकता और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मारने की धमकियां सामने आने लगीं तो कैप्टन के हाथ ठंडे पड़ गए हैं क्योंकि अब उनकी छवि पर अराजकता फैलाने के दाग लग चुके हैं। देश का एक बड़ा वर्ग यह मानने लगा है कि पंजाब में कांग्रेस की कैप्टन सरकार की शह पर ही पंजाब और हरियाणा के किसानों ने दिल्ली की सीमाओं पर सबसे ज्यादा अराजकता फैलाई है।

इसके अलावा वो कैप्टन अमरिंदर सिंह जो पहले किसानों के नाम पर राजनीति कर रहे थे जब खालिस्तानी समर्थकों का मुद्दा सामने आ गया तो अब वो भी इस किसान आंदोलन को देश की सुरक्षा के लिए खतरा मानने लगे हैं। अमरिंदर भी चाहते हैं कि जल्द से जल्द किसानों का यह अराजक आंदोलन खत्म हो जाए लेकिन उनकी मजबूरी यह है कि वो अपनी पार्टी की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के चलते खुलकर यह बात नहीं बोल पा रहे हैं क्योंकि इसका उन्हें पार्टी स्तर पर बुरा खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।

पंजाब में किसानों की अराजकता इस कदर बढ़ गई है कि वह लोग सरकारी संपत्ति को खुलेआम नुकसान पहुंचा रहे हैं। अंबानी और अडानी का विरोध करने के नाम पर कम्युनिकेशन कंपनी रिलायंस जिओ के मोबाइल टावरों तक को इन तथाकथित आंदोलनकारी किसानों ने नुकसान पहुंचाया है। इसके चलते बड़ी-बड़ी कंपनियां अब पंजाब छोड़कर दूसरे राज्यों में अपना व्यापार स्थानांतरित करने की सोच रही हैं जिसका सीधा नुकसान राज्य की पहले से बद्तर हालत में जा चुकी अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। यही कारण है कि अब कैप्टन किसान आंदोलन पर ज्यादा रुचि नहीं ले रहे हैं, लेकिन राष्ट्रीय नेतृत्व की मांग कुछ और ही है।

कांग्रेस के भावी राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी कुछ देर के लिए किसानों के पास जाकर उन्हें भड़काते हैं कि ये आंदोलन रुकना नहीं चाहिए, लेकिन दिलचस्प बात ये है कि वो खुद दूसरे दिन अपनी नानी से मिलने इटली के मिलान चले जाते हैं। कांग्रेस का राष्ट्रीय नेतृत्व किसानों के इस अराजक आंदोलन के जरिए पूरे देश में अपनी राजनीतिक संभावनाएं तलाश रहा है। जबकि कांग्रेस के इस पूरे खेल में सबसे ज्यादा फजीहत पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की हुई है क्योंकि उन्होंने ही पंजाब के किसानों को अराजकता फैलाने के लिए अंदर खाने मौन समर्थन दिया था और यही समर्थन अब उनकी छवि के लिए नुकसानदायक हो गया है।

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