सार्वजनिक मंचो की मदद से बाइडन को जापान-अमेरिकी संबंधों की याद दिला रहा है जापान

जापान मौके पर चौका मारने से नहीं चूक रहा!

बाइडन

दूसरे विश्व युद्ध के बाद से ही अमेरिका और जापान एक दूसरे के बेहद करीबी मित्र देश माने जाते हैं। परन्तु जब से जो बाइडन अमेरिका में सत्ता के शीर्ष पर बैठे है तब से उनका चीन के प्रति झुकाव बढ़ता जा रहा है। इस झुकाव को देख कर जापान अब लगभग सभी अंतरराष्ट्रीय मंचों से बाइडन को अमेरिका और जापान के मजबूत रिश्तों की याद दिला रहा है।

दरअसल, जापानी प्रधानमंत्री योशिहिदे सुगा ने शनिवार को G7 वार्ता में चीन द्वारा पूर्व और दक्षिण चीन सागर में यथास्थिति बदलने के एकतरफा प्रयासों के बारे में चिंता व्यक्त की। बता दें कि इस मीटिंग में अमेरिका के तरफ से पहली बार जो बाइडन ने हिस्सा लिया था। यानी जापान ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि अगर अमेरिका ने चीन को और ढील दी तो खतरा और बढ़ जाएगा।

जिन डेमोक्रेट्स ने बाइडन को राष्ट्रपति पद पर बिठाने का फैसला किया, उन्हें मित्र राष्ट्रों से उनकी विदेशी नीतियों के खुले समर्थन की उम्मीद थी। जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश जो बहुत लंबे समय तक अमेरिका के सबसे क़रीबी सहयोगी रहे हैं, साथ ही पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की विदेश नीति में चीन के प्रति कड़े रुख को आगे बढ़ाने में समर्थक रहे हैं।

जिस मशीनरी की मदद से पूर्वी क्षेत्र के जिओ पॉलिटिक्स में संतुलन बना रहता है, वह दशकों के परिश्रम से हासिल की गई है और इसे ध्वस्त करने के बजाय अधिक समर्थन और मज़बूती की जरूरत है।

दूसरे विश्व युद्ध में रोम-बर्लिन एक्सिस की हार के बाद, जापान अपनी ताकत को फिर से हासिल करने के लिए कड़ी मेहनत कर रहा है। तब जापान के सामान्यीकरण और कम्युनिस्ट शक्तियों के विस्तार को सीमित करने के लिए, अमेरिका ने जापान के साथ पारस्परिक सहयोग की एक महत्वपूर्ण संधि पर हस्ताक्षर करने का निर्णय लिया था।

यह संधि इन दोनो देशों के बीच एक मजबूत सैन्य गठबंधन का हिस्सा था, जो पूर्वी क्षेत्र में शांति के लिए आधारशिला बना। यह दोनों देशों के लिए एक जीत की स्थिति थी क्योंकि इससे जापान को सैन्य आक्रमण के बाहरी खतरों से डर के बजाय अपने समाज के पुनर्निर्माण के लिए समय और संसाधन मिला।

दूसरी ओर अमेरिका का उस समय जापान में सैन्य संसाधनों को तैनात करने का कारण USSR भी था।  इस संधि पर साल1951 में हस्ताक्षर किए गए थे और तब से लेकर अब तक थोड़ा बहुत संशोधित किया गया है। इससे दोनों पक्षों को लाभ मिलता है और विश्व शांति के लिए भी बेहतर होता है।

लगभग सत्तर साल से चली आ रही यह संधि आधुनिक दुनिया में बेहद महत्वपूर्ण है। जापान के पूर्व प्रधानमंत्री शिंजो आबे के नेतृत्व में जापान ने वैश्विक राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने का फैसला किया। टोक्यो ने चीन जैसे बाहरी खतरों से निपटने के लिए कई स्वायत्त कदम उठाए और इसके परिणामस्वरूप, ’QUAD’  का निर्माण हुआ तथा उसे अप्रत्याशित ताकत मिली।

अब उनके उत्तराधिकारी, पीएम योशीहिदे सुगा ने दुनिया के समान विचारधारा वाले और शांतिप्रिय देशों के बीच खुले और मुक्त संवाद में वृद्धि की आवश्यकता और महत्व को दोहराया है।  हाल ही में उन्होंने पूर्व और दक्षिण चीन सागर में चीन की गुंडागर्दी और अवैध रूप से यथास्थिति को बदलने में बीजिंग के प्रयासों के बारे में गंभीर चिंता व्यक्त की है।

इस हफ्ते की शुरुआत में जब QUAD देशों के विदेश मंत्री बैठक कर रहे थे तब उन सभी ने चीन के वैश्विक स्तर पर आक्रामकता सहित कई मुद्दों पर चर्चा की।

जापान लंबे समय से चीन की बढ़ती आक्रामकता से सावधान रहा है और उसने बीजिंग द्वारा उत्पन्न खतरे से निपटने के लिए अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप का समर्थन किया है।

अब जो बाइडन की चीन के प्रति नरमी देख कर ऐसा लगता है कि जैसे कि वह सीसीपी के पूर्णकालिक कर्मचारी थे। हालांकि जापान ने प्रत्यक्ष रूप से तो नहीं लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से है अमेरिका के नए प्रशासन के चीन के साथ नरमी पर नाराज़गी व्यक्त की है।

जापान कई बार चीन की गुंडागर्दी के बारे में विश्व को आगाह कर चुका है। फिर से वह इन्हीं बातों को अलग अलग मंचों से दोहरा रहा है। अब जापान द्वारा लगातार इस बात पर जोर देना दिखाता है कि वह बाइडन प्रशासन को जापान और अमेरिका के मजबूत रिश्तों को याद दिलाना चाहता है।

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