बहुत हुआ सम्मान, अब कोलंबो एयरपोर्ट पर पर यू-टर्न लेने वाले श्रीलंका को सबक सिखाना जरूरी है

भय बिन प्रीत न होई- भारतीय मदद लेकर चीन का गुणगान करने वाले पड़ोसी पर हर तरह की कार्रवाई आवश्यक है

श्रीलंका

लगता है कि भारत के कुछ पड़ोसी एक बार फिर से अपनी हदें पार कर रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार श्रीलंका ने भारत के साथ कोलंबो बंदरगाह के ईस्टर्न कंटेनर टर्मिनल (ईसीटी) के संचालन को लेकर हुए समझौते को तोड़ दिया है। इस पर भारत ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उसने उम्मीद की थी कि श्रीलंका समझौते का पालन करेगा पर उसने ऐसा नहीं किया। हैरानी की बात यह है कि श्रीलंका भारत से सभी प्रकार की मदद लेने के बाद इस तरह के भारत विरोधी कदम उठा रहा है। अब लगता है कि श्रीलंका के इस यूटर्न के बाद भारत को कुछ सख्त कदम उठाने ही होंगे, जिसमें उसे “प्रतिकूल पड़ोसी” की कैटेगरी में डाल देना तत्काल उचित कदम होगा।

दरअसल, श्रीलंका के कैबिनेट की बैठक के बाद जारी विज्ञप्ति में कहा गया कि कोलंबो बंदरगाह के ईस्टर्न टर्मिनल का पूरी तरह से संचालन सरकारी एजेंसी श्रीलंका पोर्ट अथॉरिटी (एसएलपीए) द्वारा किया जाएगा। यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि इस टर्मिनल को विकसित करने के लिए भारत, श्रीलंका और जापान के बीच समझौता हुआ था। इसमें कहा गया था कि टर्मिनल के संचालन में भारत और जापान की हिस्सेदारी 49 फीसदी और शेष हिस्सेदारी SLPA के पास होगी। परन्तु अब इस पोर्ट का संचालन पूरी तरह से SLPA को दे दिया गया है।

वक्तव्य में कहा गया है कि इसके बजाय भारत और जापान को सार्वजनिक-निजी साझेदारी के आधार पर पास के पश्चिमी टर्मिनल को विकसित करने के लिए आमंत्रित किया जाएगा।

बता दें कि श्रीलंका का यह फैसला भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर की कोलंबो यात्रा के एक महीने से भी कम समय में आया, जब वह इस समझौते के लिए समर्थन हासिल करने गए थे। हालाँकि, इस फैसले के जवाब में भारत ने भी कड़ी प्रतिक्रिया दी है और कहा है कि श्रीलंका को अपने वादे का पालन करना चाहिए। रिपोर्ट के अनुसार कोलम्बो में भारत के दूतावास के एक प्रवक्ता ने मंगलवार को एक ईमेल में कहा, “श्रीलंका सरकार की प्रतिबद्धता को हाल के दिनों में शीर्ष नेतृत्व से कई बार अवगत कराया गया था।”

भारत ने अभी कुछ दिनों पहले ही वैक्सीन मैत्री के माध्यम से श्रीलंका को कोरोना के लिए वैक्सीन उपलब्ध करवाया था। उसके जवाब में श्रीलंका ने इस तरह से पीठ में छुरा घोंपा है।

श्रीलंका का इस तरह से विरोधी रुख अपनाना दिखाता है कि सरकार किसी न किसी दबाव में है। कुछ ऐसी भी रिपोर्ट्स आई हैं कि श्रीलंका की सरकार पर ट्रेड यूनियन का दबाव था जिसके कारण उन्हें झुकना पड़ा। यह भी रिपोर्ट सामने आई है कि चीन ने भारतीय हित के खिलाफ पोर्ट यूनियनों के विरोध को उकसाने में एक भूमिका निभाई है। श्रीलंका के 223 यूनियनों ने ईसीटी समझौते को रद्द करने के लिए पोर्ट ट्रेड यूनियनों की मांग के लिए समर्थन की घोषणा की थी। यानि अगर यह कहा जाये कि चीन के दबाव में आ कर श्रीलंका की सरकार भारत के खिलाफ फैसले लेने पर मजबूर हुई तो यह गलत नहीं होगा।

परन्तु इस तरह से अंतर्राष्ट्रीय स्तर के समझौते की अवमानना के गंभीर परिणाम भी हो सकते हैं जिसका खामियाजा श्रीलंका को कई वर्षों तक भुगतना पड़ सकता है। भारत श्रीलंका को अपने छोटे भाई की तरह मदद के लिए सर्वदा तत्पर रहा है लेकिन अगर श्रीलंका इस तरह से अपने वादों से मुकर जायेगा तो यह उसके लिए ही घातक साबित होगा और भारत्त को कोई ठोस कदम उठाने के लिए मजबूर कर देगा।

श्रीलंका भारत और चीन के बीच दक्षिण एशिया में वर्चस्व की लड़ाई के लिए महत्वपूर्ण है। चीन के बढ़ते अतिक्रमण के कारण भारत की चिंता बढ़ गयी थी, जिसके बाद यह समझौता किया गया था। परन्तु अब लगता है कि चीन ने श्रीलंका को भीतर से अपने कब्जे में कर लिया है और अब उसे सबक सिखाने के लिए कदम उठाना चाहिए और उसे तत्काल प्रभाव से एक ‘प्रतिकूल पड़ोसी’ का दर्जा दे देना चाहिए, जो केवल अपने हितों को ध्यान में रखकर अपने कार्यों को कुटिलता से अंजाम देता है।

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