तीन दिवसीय यात्रा पर केन्या पहुंचे भारतीय विदेश मंत्री, चीन के चंगुल से केन्या को बचाने की है कोशिश

केन्या को सपोर्ट करने भारत कूदा मैदान में!

केन्या

कोरोना काल में भारत की विदेश नीति एक नए स्तर पर पहुँच चुकी है। इसी विदेश नीति के तहत विदेश मंत्री एस जयशंकर ने सोमवार को केन्या के शीर्ष नेतृत्व के साथ हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा स्थिति सहित वैश्विक और क्षेत्रीय मुद्दों पर चर्चा की। इस प्रमुख पूर्वी अफ्रीकी देश के साथ भारत के संबंधों को मजबूत करने के लिए तीन दिवसीय यात्रा पर शनिवार को केन्या पहुंचे जयशंकर ने केन्या के राष्ट्रपति Uhuru Kenyatta से भी मुलाकात की। देखा जाये तो भारत के विदेश मंत्री की यह यात्रा एक सामान्य यात्रा दिखाई देती है, लेकिन इससे जिओपॉलिटिक्स पर दूरगामी असर होने वाला है। भारत पिछले कुछ वर्षों से कई देशों को चीन के चंगुल से निकालने की रणनीति पर काम कर रहा है। यह यात्रा भी केन्या को चीन के चंगुल से निकालने की शुरुआत थी।

दरअसल, चीन ने कई अफ़्रीकी देशों को अपने BRI परियोजना के तहत अपने ऋण जाल में फंसा चुका है। Debt-trap diplomacy के तहत चीन ने केन्या को मोम्बासा और नैरोबी के बीच राजमार्ग और रेलवे के निर्माण के लिए 2020 तक कुल 6.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक का ऋण दिया है। इतना ही नहीं केन्या के बिजनेस डेली अखबार द्वारा प्राप्त ट्रेजरी के document के अनुसार, चीन अब केन्या का सबसे बड़ा ऋणदाता है और केन्या के द्विपक्षीय ऋण का 72% हिस्सा चीन का है।

केन्या ने अपने यहाँ BRI के तहत Standard Gauge Railway के लिए चीन के Export-Import Bank से 3.2 बिलियन डॉलर का कर्ज़ लिया हुआ है। हालांकि, अब केन्या सरकार को इस कर्ज़ को वापस चुका पाने में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। इस वर्ष केन्या सरकार को चीन को 315 मिलियन डॉलर वापस चुकाने पड़े हैं और कर्ज़ चुकाने के लिए उसे अपने कुल राजस्व का करीब 40 प्रतिशत हिस्सा खर्च करना पड़ रहा है। केन्या का सार्वजनिक कर्ज़ बढ़कर 65 बिलियन का स्तर पार कर चुका है। केन्या को यह पता है चीन का मकसद उसे Debt-trap में जकड़ने का है।

चीन ने जिस तरह श्रीलंका को अति-महत्वपूर्ण हंबनटोटा पोर्ट विकसित करने के लिए पहले बड़ा कर्ज़ दिया और बाद में जब श्रीलंका उस कर्ज़ को वापस लौटाने में विफ़ल साबित हुआ तो चीन ने 99 वर्षों के लिए उस पोर्ट को लीज़ पर ले लिया। उसी तरह चीन ने केन्या के Mombasa पोर्ट के साथ भी करने की सोची थी। चीनी कर्ज़दाताओं का कहना था कि समझौतों के तहत अगर केन्या चीन का कर्ज़ लौटाने में अक्षम रहता है तो चीन Mombasa Port को अपने नियंत्रण में ले लेगा। हालांकि, केन्या ने इसी वर्ष मार्च में स्पष्ट कर दिया था कि कर्ज़ के समझौतों में इस प्रकार का कोई प्रावधान शामिल ही नहीं था और केन्या के सार्वजनिक संसाधन किसी भी कीमत पर चीन को नहीं सौंपे जाएँगे।

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इसी तरह चीन कई अफ्रीकी देशों को कर्ज में फंसा चुका है। हालाँकि, अब भारत के मैदान में कूदने और सहयोग बढ़ाने के साथ ही भारत ने केन्या को चीन के चंगुल से मुक्त कराना शुरू कर दिया है। विदेश मंत्री एस जयशंकर की यात्रा के दौरान दोनों पक्षों ने साझा प्रयासों के माध्यम से हिंद महासागर क्षेत्र की अधिक सुरक्षा और समृद्धि सुनिश्चित करने के महत्व को भी स्वीकार किया।

चीन की बढ़ती गुंडागर्दी के बीच दोनों पक्षों ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र और हॉर्न ऑफ अफ्रीका में सुरक्षा स्थिति सहित वैश्विक और क्षेत्रीय मुद्दों पर व्यापक आदान-प्रदान किया। उन्होंने केन्या के शीर्ष मंत्रियों से भी मुलाकात की और दोनों देशों के बीच व्यापक साझेदारी के निर्माण पर चर्चा की। भारत ने व्यापार और निवेश, रक्षा और सुरक्षा सहयोग, क्षेत्रीय और बहुपक्षीय मंचों में विकास साझेदारी के साथ-साथ लोगों से लोगों के बीच बातचीत के क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने के लिए केन्या के साथ चर्चा शुरू की।

बता दें कि भारत और केन्या वर्तमान में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अस्थायी सदस्यों के रूप में कार्यरत हैं। यही नहीं वे राष्ट्रमंडल के सदस्य भी हैं। यानी इन दोनों देशों के बीच संबंध अब बेहतर से बेहतरीन होने जा रहे हैं। अपनी केन्या यात्रा पर एस जयशंकर ने एक ट्वीट में कहा, “हम यूएनएससी के वर्तमान सदस्य के रूप में एक साथ काम कर रहे हैं, अब हमने अपनी निकटता को बड़े वैश्विक मंच पर पहुंचा दिया है।”

ध्यान देने वाली बात यह है कि पिछले ही वर्ष भारत के एक्सपोर्ट इंपोर्ट बैंक ने केन्या में एक टेक्सटाइल फैक्ट्री के नवीनीकरण को स्वीकृति दी थी। तब इस फैक्ट्री ने हज़ारों की तादाद में फेस मास्क का निर्माण किया और कोरोना के समय में ये पूरे अफ्रीकी महाद्वीप के लिए वरदान साबित हुआ। वहीँ जब केन्या के सचिव ने भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर से HCQ दवाई पर एक्सपोर्ट बैन हटाने का अनुरोध किया था, तो भारत ने इस याचिका को स्वीकार करने में तनिक भी विलंब नहीं किया। भारतीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग कार्यक्रम के अन्तर्गत केन्या के स्थानीय चिकित्सकों को इस महामारी से निपटने के लिए उचित प्रशिक्षण भी दिया गया है।

अफ्रीका में पहले BRI और फिर कोरोना के कारण पहले ही चीन विरोधी मानसिकता पनप रही थी, वहीं चीन में लगातार हो रहे अफ्रीकी लोगों पर हमलें ने इस मानसिकता को और ज़्यादा बढ़ा दिया, जिसके परिणामस्वरूप केन्या सहित कई अफ़्रीकी देश चीन के खिलाफ खड़े होने लगे हैं। अब ऐसे में इन देशों को भारत जैसे देश के सपोर्ट की आवश्यकता है जिससे वे चीन पर से निर्भरता समाप्त कर सके। भारत ने जिस तरह से मालदीव और श्रीलंका जैसे देशों से चीनी प्रभाव को कम किया अब उसी प्रकार से अफ़्रीकी देशों की मदद कर रहा है। विदेश मंत्री एस जयशंकर की केन्या यात्रा से अफ़्रीकी देशों को चीन के चंगुल से निकालने की शुरुआत हो चुकी है।

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