कट्टरपंथ इस्लाम एक अर्थव्यवस्था को क्या से क्या बना देता है, तुर्की इस बात का उदाहरण है

मुद्रास्फीति

तुर्की एशिया का एक समृद्ध व्यवस्था माना जाता है। एक समय मुस्लिम जगत में आदर्श लोकतांत्रिक देश के रूप में तुर्की को वैश्विक स्तर पर सम्मान प्राप्त था, जो नाटो का मेंबर भी है और जहां आर्थिक वृद्धि दर भी ऊंची है। परंतु, तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन कि इस्लामिक नीतियों ने तुर्की की अर्थव्यवस्था को बर्बाद करना शुरू कर दिया। स्वघोषित खलीफा एर्दोगन की महत्वाकांक्षी मुस्लिम जगत में स्वयं को शासक के रूप में स्थापित करने की है। खलीफा बनने की चाहत में एर्दोगन ने तुर्की की आर्थिक नीतियों को भी शरिया के अनुसार ढालने का प्रयास शुरू कर दिया है। एर्दोगन की सनक आर्थिक नीतियों की मूलभूत बातों का भी उल्लंघन कर रही है। तुर्की में मुद्रास्फीति बढ़ती जा रही है इसके बावजूद ब्याज दर बढ़ाकर उसे नियंत्रित करने का प्रयास नहीं हो रहा है। यहां तक कि जो आर्थिक सलाहकार अर्थव्यवस्था को पुनः पटरी पर लाने के लिए ब्याज दर बढ़ाने का सुझाव दे रहा है उसे भी तुर्की के राष्ट्रपति निलंबित कर रहे हैं।

इस्लामिक नीतियों का दुष्प्रभाव

इस्लामिक कानूनों में ब्याज लेने को हराम माना गया है। शरीयत में ब्याज को रिबा कहा गया है और रिबा की वसूली पर प्रतिबंध है। यही कारण है कि सऊदी अरब जैसे देशों में सरकार समर्थित वित्तीय संस्थाओं द्वारा बहुत कम ब्याज दर पर लोन उपलब्ध कराया जाता है। एर्दोगन सऊदी अरब के आर्थिक मॉडल को तुर्की पर लागू करना चाहते हैं, भले ही इसके परिणाम कैसे भी हों।

एर्दोगन ने अर्थशास्त्र के मूल सिद्धांत को पलट दिया है। उनका मानना है कि अधिक ब्याज दर से मुद्रास्फीति होती है। अर्थशास्त्र का कोई भी विद्यार्थी जिसे विषय की थोड़ी बहुत समझ होगी वह एर्दोगन की बातों पर केवल हँस सकता है।

यह एक स्थापित आर्थिक सिद्धांत है कि मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए ब्याज दर बढ़ानी पड़ती है, लेकिन एर्दोगन का मानना है कि ब्याज दर बढ़ाने के कारण मुद्रास्फीति बढ़ती है।

पिछले वर्ष मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए तुर्की के केंद्रीय बैंक ने Borrowing costs बढ़ा दी थी तो एर्दोगन ने कहा था कि ‛मेरा मानना है कि अधिक ब्याज दर से हम कुछ भी हासिल नहीं कर सकते हैं।’ उन्होंने कहा था कि ‛वे (केंद्रीय बैंक) मेरी बात सुने या ना सुने, मैं अपना संघर्ष जारी रखूंगा।’ एर्दोगन की जिद का परिणाम यही हुआ कि तुर्की में मुद्रास्फीति दहाई के आंकड़े को छू रही है। ऐसे में निवेशक भी तुर्की के बाजार से दूरी बना रहे हैं।

ब्याज दर में कमी का प्रभाव तुर्की की मुद्रा पर भी पड़ रहा है। ब्याज दर में कमी के परिणामस्वरुप तुर्की की मुद्रा में 1.5 प्रतिशत की गिरावट आई है।

तुर्की की अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए जो भी व्यक्ति एर्दोगन को सही निर्णय लेने की सलाह दे रहा है तुरंत उसे पद से बर्खास्त कर दिया जा रहा है। पूर्व वित्त मंत्री Berat Albayrak और केंद्रीय बैंक के गवर्नर Murat Uysal ऐसे ही लोग हैं।

तुर्की के राष्ट्रपति ने Naci Agbal को केंद्रीय बैंक का नया गवर्नर नियुक्त किया। उन्होंने भी इंटरेस्ट रेट को दो बार बढ़ाया जिसके बाद तुर्की के राष्ट्रपति ने Naci Agbal को भी निलंबित कर दिया, जबकि दोनों ही बार तुर्की की मुद्रा डॉलर के मुकाबले थोड़ी मजबूत हुई थी और तुर्की के स्टॉक एक्सचेंज में भी सुधार हुआ था।

एर्दोगन की नीतियां तुर्की को भविष्य में बहुत नुकसान पहुंचा सकती हैं। एक ओर तुर्की ने यूरोपीय शक्तियों के साथ अपने संबंध खराब किए हैं, वहीं, दूसरी ओर मुस्लिम जगत की 2 सबसे बड़ी शक्तियों ईरान और सऊदी अरब से भी अपने संबंध खराब कर लिए हैं। विश्व में सबसे तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था वाले देश भारत के साथ भी तुर्की के संबंध ठीक नहीं है और अब तुर्की की स्वयं की अर्थव्यवस्था भी गर्त में जा रही है।

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