मुंबई के 26/11 हमलों में हुआ उजागर भारतीय मीडिया का निचला स्तर!

हमलों के लाइव ब्रॉडकास्ट ने की थी आतंकियों की मदद!

26/11

आज से ठीक, 13 वर्ष पहले इस देश पर वो हमला हुआ, जिसे आज भी कोई नहीं भूल सकता। 26 नवम्बर 2008 को मुंबई पर 10 आतंकवादियों ने एक घातक हमला किया था। इसमें 166 व्यक्तियों का नरसंहार हुआ और 300 से अधिक व्यक्ति घायल हुए। परन्तु इस भीषण त्रासदी में जितना योगदान सरकारी निष्क्रियता, तुष्टिकरण की राजनीति का था, उतना ही योगदान मीडिया का भी था। 26/11 ने यदि कांग्रेस पार्टी का वास्तविक स्वरुप उजागर किया, तो उसने भारतीय मीडिया और पत्रकारिता की कर्तव्यनिष्ठा का मिथक भी सदैव के लिए तोड़ दिया।

26/11 में मीडिया चैनलों ने आतंकियों काम आसान किया था

साल 2008 मानो किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं था। भारत में हर हफ्ते एक आतंकी हमले की खबर आना अब आम बात हो चुकी थी। आतंकियों का पूरे देश में बोलबाला था और सरकार एक दूसरे के ऊपर दोष डालने के अलावा पूरी तरह निष्क्रिय दिख रही थी। कुछ लोग तो हिन्दू आतंकवाद की हास्यास्पद थ्योरी को सत्य सिद्ध करने में जुटे हुए थे। इसी बीच खबर आई कि मुंबई में समुद्र के रास्ते घुसे 10 आतंकवादियों ने शहर के हर कोने में आतंक मचा रखा है। सीएसटी, ताज होटल, ओबेरॉय होटल, नरीमन पॉइंट, कामा अस्पताल इत्यादि, हर जगह आतंकी दहशत फैला रहे थे।

तो इसमें मीडिया की क्या भूमिका थी? आदर्श स्थिति में या तो मीडिया को कोई कवरेज नहीं करनी चाहिए थी, और यदि करनी चाहिए थी, तो उन्हें इस बात पर विशेष ध्यान देना चाहिए था कि अपनी कवरेज से वे शत्रुओं को कोई लाभ न पहुंचा रहे हों। परन्तु लोगों तक पहले खबर पहुंचाने की होड़ में, क्या NDTV, क्या इंडिया टुडे, हर न्यूज़ चैनल ने गिद्ध की भांति न्यूज़ कवरेज करते हुए हर गतिविधि को ब्रॉडकास्ट करना शुरू किया। स्वयं अपने स्वीकारोक्ति में आतंकी मुहम्मद अजमल आमिर कसाब ने बताया कि कैसे उनके हैंडलर के लिए भारतीय मीडिया चैनल की कवरेज उन लोगों का काम आसान कर रही थी?

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अंधी मीडिया के अजीबोगरीब कारनामे

इतना ही नहीं, कुछ चैनल तो उस समय भी इस प्रकरण में हिन्दू आतंकवाद की थ्योरी सिद्ध करने पर तुले हुए थे। वह तो भला हो वीर हुतात्मा तुकाराम ओम्ब्ले का, जिन्होंने अजमल कसाब को जीवित पकड़ लिया, अन्यथा मीडिया और बुद्धिजीवियों ने तो इसे ‘आरएसएस की साजिश’ सिद्ध करने की पूरी प्लानिंग कर रखी थी। जिसके लिए आरवीएस मणि और राकेश मारिया जैसे पूर्व उच्चाधिकारियों ने आड़े हाथों भी लिया।

परन्तु बात यहीं पर नहीं रुकी, लाईमलाईट की होड़ में अंधी मीडिया ने हमारे सुरक्षाबलों की जान को खतरे में किस प्रकार से डलवाया, यह आप NSG और ATS के ओपरेशन के लाइव कवरेज से स्पष्ट देख सकते हैं। कई लोगों का तो मानना है कि इसी अंधी होड़ के कारण अशोक काम्टे, विजय सालस्कर, हेमंत करकरे, मेजर संदीप उन्नीकृष्णन और हवलदार गजेन्द्र बिष्ट जैसे वीर अफसरों को अपने प्राण अर्पण करने पड़े थे। जब न्यूज़लौंड्री के लिए मधु त्रेहन ने बरखा दत्त का साक्षात्कार लिया, तो उसने बेशर्मी से स्वीकार करते हुए कहा कि “मीडिया की इस अंधी होड़ के कारण कई सुरक्षाकर्मियों की जान खतरे में आई, मानो इससे किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए।”

भारतीय मीडिया ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ का रोना रोती है

ZEE-5 पर 2020 में प्रसारित वेब सीरीज़ ‘State of Siege – 26/11’ में मीडिया के इस स्याह पहलू को बिना किसी लाग लपेट के ठीक उसी तरह चित्रित किया गया है, जैसे इस सीरीज़ में आई अगली फिल्म ‘State of Siege – Temple Attack’ में अक्षरधाम मंदिर पर हुए हमलों के पीछे की प्लानिंग और NSG की प्रतिक्रिया को दिखाया गया था। मीडिया की इस भूमिका के लिए अपने एक निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने भी जमकर लताड़ा था।  

ऐसे में, आज भारतीय मीडिया ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ का रोना रोती है, तो हंसी भी आती है, और क्रोध भी। हंसी इस बात पर कि असीमित स्वतंत्रता के बाद भी इन्हें हर बात पर रोना है और क्रोध इसलिए कि इनके गिद्ध मानसिकता के कारण 26/11 हमले में कई घरों के दीपक बुझ गए, कई वीर अकारण हुतात्मा हो गए और इन्हें अभी भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता चाहिए?  बाजीराव मस्तानी फिल्म में शायद ऐसे ही लोगों के लिए कहा गया था, “पराये लोगों से क्या शिकायत करना, घाव तो अपनों के ज्यादा चुभते हैं!”

 

 

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