‘अश्वेत गुलामों’ के व्यापार की हुई खूब चर्चा लेकिन भारतीय ‘गिरमिटिया’ की कोई बात नहीं करता

'गिरमिटिया' भारतीयों के उदय की भयावह कहानी!

गिरमिटिया

वैश्विक स्तर पर अश्वेत लोगों के व्यापार और उन पर हुए अमानवीय अत्याचार की कहानी सभी जगह सुनाई गई है। किताबों से लेकर फिल्म जगत तक अफ्रीकन-यूरोपियन और अफ्रीकन-अमेरिकन समुदाय के लोगों की कहानी बताई जाती है। कैसे यूरोपीय व्यापारियों ने अश्वेत लोगों को भेड़ बकरियों की तरह नीलाम किया? पिता की खरीद अमेरिकी उद्योगपति ने की तो माता की ब्रिटिश उद्योगपति ने और बच्चों की फ्रांसीसी उद्योगपति ने। दास व्यापार ने अफ्रीकी लोगों के परिवार तोड़ दिए और वर्षों तक यही अमानवीय अत्याचार उन पर होता रहा। लेकिन अफ्रीकी मूल के लोग, अकेले ऐसे लोग नहीं, जिन्हें यूरोपीय अत्याचार झेलने पड़े।

एक कहानी हम भारतीय मूल के लोगों की भी है, जिसे उतना कहा सुना नहीं गया, जितना अफ्रीकियों की कहानी को। फिजी, गुआना, मॉरीशस आदि देशों में रहने वाले भारतीयों के पूर्वज किन स्थितियों में अपनी मातृभूमि को छोड़कर विदेशों में बसे और वहां क्या-क्या अत्याचार उन्हें झेलने पड़े? वर्षों पहले पलायन करने वाले इन भारतीयों को गिरमिटिया कहा जाने लगा। इसकी एक अलग कहानी है। आइए जानते हैं।

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अंग्रेजों ने भारतीय अर्थव्यवस्था को कर दिया था ध्वस्त

ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में उद्योग व्यापार समाप्त हो चुके थे। यदि हम औपनिवेशिक भारत के आर्थिक मॉडल को समझें तो इतिहास में हुई बहुत-सी घटनाएं सरलता से समझ में आ जाएंगी। अंग्रेजों ने भारत में राजनीतिक वर्चस्व स्थापित करने के बाद, कच्चे माल की आपूर्ति पर एकाधिकार कर लिया। ईस्ट इंडिया कंपनी के राज में अतिरिक्त कच्चे माल की आपूर्ति किसी और को नहीं की जा सकती थी। कच्चे माल की किल्लत ने भारत के हर छोटे बड़े व्यापार को समाप्त कर दिया, तेल से लेकर सुई तक, सबका निर्माण ब्रिटिश फैक्ट्रियों में होने लगा।

1813 में ईस्ट इंडिया कंपनी का भारतीय व्यापार से एकाधिकार समाप्त कर दिया गया और भारत का बाजार इंग्लैंड की सभी कंपनियों के लिए खोल दिया गया। भारत में चाय और चीन में अफीम के अतिरिक्त बाकी सभी व्यापार अंग्रेजी कंपनियों के लिए खोल दिये गए। कम शब्दों में कहें तो भारत की लूट के लिए ब्रिटेन की हर कंपनी को लाइसेंस मिल गया। 1818 में मराठा साम्राज्य के अंतिम भारतीय शासक को अंग्रेजों ने परास्त कर दिया। 1833 के चार्टर एक्ट में कंपनी के अंतिम व्यापारिक एकाधिकार भी खत्म कर दिए गए। दूसरी ओर दुनिया भर में फैले उपनिवेशों पर अब चाय, नील, कॉफ़ी, चावल और गन्ने के उत्पादन जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र के लिए श्रमिकों की आवश्यकता थी। वहीं, भारत से कच्चे माल के साथ अब श्रम का निर्यात भी शुरू होने वाला था।

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गिरमिटिया भारतीयों के उदय की भयावह कहानी

स्थानीय उद्योगों का व्यापार चौपट होने के बाद अब भारतीयों के पास केवल दो विकल्प थे। पहला था कि लोग कृषि की ओर लौटें लेकिन भारत में उद्योग बहुत विस्तृत था, सभी जातियों का अपना- अपना व्यापार था। वहीं, ब्रिटिश राज में व्यापार पूरी तरह ध्वस्त हो चुका था और अब इतने लोगों के रोजगार का आधार केवल कृषि बचा था। ऐसे में, खेती पर अत्यधिक दबाव बना हुआ था। स्थिति भयावह होती जा रही थी।

1833 में दास प्रथा उन्मूलन कानून खत्म हुआ और दास व्यापार बन्द हो गया। लेकिन दास अर्थात श्रमिकों की आवश्यकता समाप्त नहीं हुई। भारतीयों के पास कोई कार्य नहीं था। वहीं, दूसरे विकल्प के तौर पर अंग्रेजों ने भारतीयों को श्रमिक के रूप में विदेशों में कार्य करने का प्रस्ताव दिया और यहीं से शुरू हुआ अनुबंध श्रम या परमिट सिस्टम। इसी परमिट वाले श्रमिक को आम बोलचाल में परमिटिया और फिर गिरमिटिया कहा गया। जहाज से विदेश जाने पर इनको जहजिया नाम से भी पुकारा जाने लगा। गिरमिटिया मजदूरों को कैरेबियाई द्वीपों, दक्षिण अमेरिका के देशों सहित मॉरीशस, फिजी आदि स्थानों पर भेजा गया। सूरीनाम में बसे भारतीय आज भी अपने लोकगीतों में वह कहानी गाते हैं :

“कलकत्ता से छूटल जहाज

हमरा कोई नहीं

भाई भी छूटे, पिता भी छूटे

भइया छूटे भाभी

हमरा कोई नहीं

पूरब से आइल रेलिया

पछिम से जहजिया

पिया के ले गइले हो

रेलिया न बैरी जहजिया न बैरी

पइसवा बैरी हो

देशवा-देशवा भरमावे

उहे पइसवे बैरी हो…”

विदेशों में भी जीवित है भारतीय संस्कृति

दरअसल, जो भारतीय विदेश जाकर बस गए, वह कभी लौट कर अपने परिवार से नहीं मिल सके। बहुतों को कुछ वर्षों के एग्रीमेंट पर विदेश भेजा गया लेकिन वह विदेश में जाकर फंस गए क्योंकि एग्रीमेंट करवाने वाले ठेकेदारों ने दोबारा उनकी सुध नहीं ली। अपने धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए उन्होंने नई लोक संस्कृतियों को जन्म दिया। बहुत से लोगों ने रामचरितमानस, भगवत गीता आदि के माध्यम से अपनी हिंदू पहचान को जीवित रखा।

यह उनकी पारंपरिक संरक्षता का ही परिणाम है कि त्रिनिदाद और टोबैगो में एक हिंदू मंदिर का निर्माण समुद्र के बीचों-बीच किया गया है। स्थानीय हिंदुओं को जब ईसाई प्रशासन द्वारा त्रिनिदाद और टोबैगो की भूमि पर मंदिर बनाने की अनुमति नहीं दी गई तो उन्होंने समुद्र में मंदिर बना कर भोलेनाथ की आराधना शुरू कर दी। अपनी संस्कृति को जीवित रखने के लिए पैसे जोड़ कर, चंदा जुटाकर एग्रीमेंट पर भारत से पंडित बुलाए गए, उनसे शादी विवाह की रस्में सीखी गईं। अंततः ऐसी कई कहानियां वहां के स्थानीय हिंदुओं से सुनने को मिलती हैं।

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ऐसे में, दुखद पक्ष यह है कि इन कहानियों को पॉप कल्चर का हिस्सा नहीं बनने दिया गया, ना ही इसके लिए गंभीर प्रयास हुए। अफ्रीकी लोगों की कहानी हॉलीवुड ने दुनिया को सुनाई, लेकिन क्या गिरमिटिया भारतीयों की कहानी सुनाने की जिम्मेदारी भारत की फ़िल्म इंडस्ट्री उठाएगी? क्या भारत सरकार इस ओर ध्यान देगी? यह एक बड़ा प्रश्न है, जिसका जवाब लंबे से प्रतीक्षारत है।

 

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