“सहमति से शारीरिक संबंध बनाने के बाद शादी न करना बलात्कार नहीं”, बॉम्बे HC ने किया साफ

विवाह संस्कार के उद्देश्य से भटक गई है दुनिया!

शारीरिक संबंध

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गीता में लिखा है कि परिवर्तन संसार का सबसे बड़ा और शाश्वत सत्य है। प्रकृति क्या, अगर परिवर्तन न हो तो परंपराएं भी सड़ जाती हैं। सृष्टि के संतुलन और संचालन के लिए प्रजनन अनिवार्य है। प्रजनन ही प्रकृति को जीवंतता प्रदान करती है। परंतु, शुचिता के बिना जीवन का क्या मोल है? संभवत: कुछ भी नहीं। अतः प्रजनन और शारीरिक संबंध की शुचिता बनाए रखने के लिए विवाह नामक संस्कार को सृजित किया गया है, ताकि समाज की सबसे छोटी इकाई ‘परिवार’ की स्थापना हो सके। कालांतर में हम विवाह संस्कार के उद्देश्य से भटक गए। विवाह को हमने समाज और संस्कार के बजाए स्वतंत्रता से जोड़ दिया। वैश्वीकरण के इस युग में लोगों ने इस स्वतन्त्रता को कुकर्म, भोगविलास और कर्तव्यहीनता के सीमाओं तक पहुंचा दिया। इसका प्रतिफल शादी जैसे विवाह संस्कार और पुरुष-स्त्री सम्बन्धों तक भी पहुंचे। प्रकृति के इन दोनों प्रतिबिंबों ने एक दूसरे को अपने शारीरिक भोग विलास की वस्तु के रूप में देखा।

स्त्री का शरीर अब मंदिर स्वरूप नहीं था और न ही पुरुष का चरित्र राम स्वरूप। दोनों मिलकर हर वो काम करने लगे, जिसे सिर्फ विवाह संस्कार के द्वारा पारंपरिक मान्यता देना ही उचित है। जीवन का वो काल जिसे ब्रह्मचर्य के कठोर तप से सींचकर राष्ट्र निर्माण का ईंधन बनाना चाहिए, उसे आज के युवा और युवतियां छद्म गृहस्थी में परिवर्तित कर समाज के नींव को कमजोर कर रहे हैं! मामला तब सबसे ज्यादा बिगड़ता है, जब उनके इस अवैवाहिक गृहस्थी में खटपट शुरू होती है। इस कारण आज के दौर में बलात्कार, यौन दुराचार, शारीरिक शोषण, व्यभिचार इत्यादि के झूठे मामले न्यायालय में बढ़ गए हैं। इस आर्टिकल में न्यायालय के एक ऐसे ही निर्णय के बारे में विस्तार से समझेंगे, जिसमें न्यायाधीश ने अवैवाहिक गृहस्थी जीवन के परिणय परिणीति तक न पहुंच पाने के कारण लगाए जाने वाले यौन दुराचार को बलात्कार की श्रेणी में रखने से इनकार कर दिया है।

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जानिए क्या है पूरा मामला?

मामला कुछ यूं है कि एक couple अपने शादी का सुंदर स्वप्न पाले live-in में रहने लगा। आज कल की भाषा में कहें, तो कुछ समय बाद उनका Break-up हो गया। शादी के स्वप्न के टूटने से झल्लाई नायिका के लिए नायक खलनायक में बदल गया। लड़की ने लड़के पर भारतीय दंड संहिता की धारा-417 (धोखाधड़ी) और 376 (बलात्कार) के तहत मुकदमा दर्ज कराया।

तीन साल के परीक्षण के बाद, पालघर में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने आरोपी को आईपीसी की धारा-417 के तहत दंडनीय अपराधों का दोषी ठहराया अर्थात् बलात्कार (धारा 376) का आरोप हटाते हुए न्यायालय ने लड़के को धोखाधड़ी (धारा-417) का दोषी पाया। इसके बाद उसे एक साल के कारावास की सजा सुनाई गई और उस पर 5,000 रुपये का जुर्माना लगाया गया। उसके बाद लड़की ने इस फैसले के खिलाफ हाइकोर्ट में अपील दायर की। जिसके बाद यह मामला 25 साल तक लंबित रहा और 25 साल बाद पालघर के इस व्यक्ति को धोखाधड़ी के मामले में भी छोड़ दिया गया है।

बॉम्बे हाईकोर्ट ने उस व्यक्ति को यह कहते हुए बरी कर दिया कि चूंकि “यह साबित करने के लिए कोई सबूत नहीं है कि महिला ने तथ्य की गलत धारणा पर शारीरिक संबंध के लिए सहमति दी थी, केवल शादी से इनकार करना आईपीसी की धारा 417 के तहत अपराध नहीं होगा।”

1996 से दर्ज हुई थी प्राथमिकी

महिला ने वर्ष 1996 में प्राथमिकी दर्ज कराते हुए आरोप लगाया था कि आरोपी ने शादी का झांसा देकर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए और बाद में उसने उससे शादी करने से इनकार कर दिया। उसने अदालत में खुलासा किया कि आरोपी उसे जानता था। उसने कहा कि उसके तीन साल से अधिक समय तक आरोपी के साथ यौन संबंध थे। यहां तक ​​कि उसकी बहन ने भी कोर्ट को बताया कि दोनों के बीच प्रेम-प्रसंग चल रहा था। सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने महिला समेत आठ गवाहों से जिरह की थी। सुनवाई के दौरान आरोपी ने अपने ऊपर लगे सभी आरोपों से इनकार किया।

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न्यायमूर्ति प्रभुदेसाई के कथन

बॉम्बे हाईकोर्ट की जस्टिस अनुजा प्रभुदेसाई ने आरोपी द्वारा दायर अपील की जांच करते हुए कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सबूत बताते हैं कि दोनों के बीच यौन संबंध सहमति से थे। न्यायमूर्ति प्रभुदेसाई ने कहा, “आरोपी को आईपीसी की धारा 417 के तहत अपराध का दोषी ठहराया गया है, क्योंकि उसने अभियोक्ता से शादी करने से इनकार कर दिया था। सवाल यह है कि क्या ऐसी परिस्थितियों में शादी से इनकार करना धोखाधड़ी या अपराध है?”

इस मुद्दे की आगे जांच करते हुए, न्यायमूर्ति प्रभुदेसाई ने कहा कि महिला के साक्ष्य से यह संकेत नहीं मिलता है कि उसने शादी के वादे की गलत धारणा के तहत आरोपी के साथ यौन संबंध बनाए थे या उसकी सहमति शादी के कपटपूर्ण और गलत बयानी पर आधारित थी। जस्टिस प्रभुदेसाई ने कहा, “यह इंगित करने के लिए रिकॉर्ड पर कोई सबूत नहीं है कि शुरुआत के बाद से आरोपी का उससे शादी करने का इरादा नहीं था। सबूत के अभाव में यह साबित करने के लिए कि महिला ने तथ्य की गलत धारणा पर शारीरिक संबंध के लिए सहमति दी थी, जैसा कि धारा-90 के तहत निर्धारित है। IPC की धारा-417 के तहत केवल शादी से इंकार करना अपराध नहीं माना जाएगा।“

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निष्कर्ष

गौरतलब है कि इस तरह के बेबुनियाद आरोप न सिर्फ न्यायपालिका की बुनियाद हिलाते हैं, बल्कि समाज, स्त्री, संस्कार, परिवार, विश्वास, गृहस्थी और प्रतिष्ठा सबकी नींव खोद देते है। आरोपी को बरी कर दिया गया है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल तो ये है उसके जीवन के 25 साल कौन चुकाएगा? वो न्यायालय जो ऐसे कानून को मान्यता देता है या फिर वो लड़की जिसने ऐसे बेबुनियाद आरोप लगाए!

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