डिजिटल रैलियों के विचार से क्यों उठ रही है विपक्षी पार्टियों के पेट में मरोड़े?

चुनाव से पहले ही हार मान गया है विपक्ष!

वर्चुअल रैली

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भारतीय लोकतंत्र का पर्व शुरू होने वाला है। अगले दो महीनों में पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। चुनाव आयोग ने बीते दिन शनिवार को पूरे चुनाव के रूपरेखा की घोषणा कर दी। सात चरणों में पांचों राज्य के चुनाव होने तय किये गए हैं। चुनाव आयोग के मुख्य अधिकारी सुशील चंद्रा ने इसकी घोषणा करते हुए कई सारे प्रावधानों का जिक्र किया है, जिसके अंतर्गत चुनाव संपन्न होना है। देश में बढ़ रहे कोविड के मामलों को देखते हुए यह तय किया गया है कि राजनीतिक दलों को वर्चुअल रैली (Digital Rally) के ज़रिए ही चुनाव प्रचार करना होगा।

चुनाव आयोग ने कहा कि 15 जनवरी तक किसी भी तरह के रोड शो, रैली, पद यात्रा, साइकिल और स्कूटर रैली की इजाज़त नहीं होगी। राजनीतिक दलों को वर्चुअल रैली के ज़रिए ही चुनाव प्रचार करना होगा, जीत के बाद किसी तरह का विजय जुलूस भी नहीं निकलेगा। आयोग का कहना है कि 5 जनवरी के बाद आयोग अपने इस आदेश की समीक्षा करेगा और परिस्थितियों के हिसाब से दिशानिर्देश जारी करेगा। चुनाव आयोग के इस फैसले से कई राजनीतिक दलों की नींद उड़ गई है। आयोग के वर्चुअल रैली फैसले के बाद कई विपक्षी दल इस बात का रोना रो रहे हैं कि उनके पास भाजपा जितना मजबूत डिजिटल प्लेटफॉर्म नहीं है, जिसके कारण उन्हें समस्या हो सकती है। यानी चुनाव से पहले ही विपक्षियों ने ये साफ कर दिया है कि अब वो भाजपा के सामने कहीं भी टिकने वाले नहीं है।

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विपक्षी भी मानते हैं कि सर्वशक्तिमान है भाजपा

भाजपा यह दावा करती आई है कि वह दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी है। अब नए प्रोटोकॉल के बाद राजनीतिक दल भी इस बात को स्वीकार करने लगे हैं कि भाजपा, भारतीय राजनीति की महाशक्ति है। यह सर्वविदित है कि भाजपा एकमात्र राजनीतिक पार्टी है, जिसके पास सभी स्तरों पर एक विशाल आईटी सेल के साथ एक विस्तृत डिजिटल बुनियादी ढांचा है, जिसका कोई भी प्रतिद्वंद्वी मुकाबला नहीं कर सकता है। यही बात सत्ता की इस महत्वपूर्ण दौड़ में सत्ताधारी पार्टी को अपने सभी प्रतिद्वंद्वियों से आगे रखती है।

खबरों की मानें तो भाजपा नेतृत्व ने राज्य स्तर और जिला स्तर से लेकर ब्लॉक और बूथ स्तर तक व्हाट्सएप ग्रुप बनाए हैं। माना जाता है कि बीजेपी के आईटी आउटरीच के तहत 80 लाख पार्टी कार्यकर्ता जुड़े हुए हैं। कुछ महीने पहले प्रधानमंत्री के बैनर तले और बाद में योगी आदित्यनाथ की राज्य सरकार द्वारा शुरू किए गए “मुफ्त-राशन” वितरण अभियान के दौरान नेटवर्क की परिचालन कार्यक्षमता का परीक्षण किया गया है। किसी भी मामले में, सत्ताधारी दल हमेशा ऐसे संसाधनों से संपन्न होते हैं, जिनकी बराबरी कोई विपक्षी दल नहीं कर सकता, जो वर्तमान परिस्थितियों में इसे एक असमान चुनावी लड़ाई बनाता है।

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कांग्रेस, सपा और बसपा के पास नहीं है ढ़ांचा

योगी सरकार ने पिछले दो अनुपूरक बजटों में प्रचार के लिए जिस तरह से करीब 650 करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया, वह भी अभूतपूर्व है। कोई आश्चर्य नहीं कि सरकार द्वारा किए गए प्रचार ब्लिट्ज ने पिछले सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए। भले ही रैलियों पर प्रतिबंध शुरू में 15 जनवरी तक के लिए लगाया गया हो, लेकिन व्यापक रूप से यह माना जा रहा है कि यह समय सीमा बढ़ा दी जाएगी। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार बसपा के एक वयोवृद्ध नेता ने कहा, “अगर अन्य लोग भी कोशिश करें, तो जमीनी स्तर पर उस तरह के डिजिटल आधार को बनाने में अधिक समय लगेगा।”

यहां तक ​​​​कि समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता गिरीश तिवारी को भी लगता है कि चुनाव आयोग के इस फरमान का मतलब एक समान अवसर का अभाव होगा। उन्होंने दावा किया कि कांग्रेस पार्टी भी इसी समस्या से जूझ रही है। उन्होंने कहा, “याद रखें, हमारे नेता अखिलेश यादव आईटी गतिविधियों को बढ़ावा देने वाले राज्य के पहले मुख्यमंत्री थे और उन्होंने युवा छात्रों को लैपटॉप वितरित करने की अनूठी प्रथा शुरू की थी, इसलिए हमारे पास एक डिजिटल टीम भी है।”

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अखिलेश यादव ने भी दिया बयान

वहीं, दूसरी ओर वर्चुअल रैली से आहत सपा प्रमुख अखिलेश यादव का कहना है कि “भाजपा के पास अन्य राजनीतिक दलों के विपरीत, लंबे समय से एक डिजिटल बुनियादी ढांचा है। हम चुनाव आयोग से अन्य पार्टियों के डिजिटल प्लेटफॉर्म को मजबूत करने का अनुरोध करेंगे, ताकि वे भाजपा को टक्कर देने की स्थिति में आ सकें। यदि वर्चुअल रैली की आवश्यकता है, तो हमें यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि अन्य दलों के पास भी अच्छा डिजिटल बुनियादी ढांचा हो।” गौरतलब है कि भाजपा आगामी चुनावों में सबसे बड़ी और मजबूत राजनीतिक दल है, साथ ही चुनाव आयोग के इस फैसले ने भाजपा को एक महाशक्ति बना दिया है।

बताते चलें कि उत्तर प्रदेश में 403 सीटों, पंजाब में 117 सीटों, गोवा में 40 सीटों, उत्तराखंड में 70 सीटों और मणिपुर में 60 सीटों पर सैकड़ों उम्मीदवार अपनी किस्मत आजमाएंगे। पहला चरण 10 फ़रवरी से शुरु होगा और अंतिम चरण में 7 मार्च को मतदान होगा। चुनावों के नतीजे 10 मार्च 2022 को आएंगे।

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