कैसे ब्रह्मोस मिसाइल भारत के लंबे तट प्रांतों और समुद्र की रक्षा करता है

ब्रह्मोस और राफेल की जोड़ी ने भारत की शक्ति को बढाया है!

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Source- Tfi Post

भारत ने बुधवार को सुपरसोनिक मिसाइल ब्रह्मोस (BrahMos Supersonic Cruise Missile) का परीक्षण किया. जमीन से जमीन पर मार करने वाली इस मिसाइल (Surface to Surface Missile) का अंडमाननिकोबार में सफल परीक्षण किया गया, रक्षा अधिकारियों ने इस संबंध में जानकारी दी है। ANI ने ट्विटर पर रक्षा अधिकारियों के हवाले से लिखा “भारत ने आज अंडमान और निकोबार में सतह से सतह पर मार करने वाली ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल का सफल परीक्षण किया। विस्तारित दूरी की मिसाइल ने सटीक सटीकता के साथ अपने लक्ष्य को मार गिराया।” इस अवसर पर एयर चीफ मार्शल वी आर चौधरी ने सतह से सतह पर मार करने वाली सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल के सफल परीक्षण पर बधाई दी। वह परिचालन तैयारियों की समीक्षा करने के लिए अंडमान और निकोबार के द्वीप क्षेत्र में थे।

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ब्रम्होस मिसाइल भारत के शरासन पर चढ़ा वह बाण है जो अमोघ अस्त्र की तरह कभी खाली नहीं जाता। यह मिसाइल ध्वनि की गति से तीन गुना चाल पर चलती है और 1 मीटर सर्कलिक एरर प्रोबिबिलिटी के साथ हमला करती है। अर्थात यह मिसाइल किसी तय लक्ष्य के आसपास केवल 1 मीटर के गोले के अंदर हमला करने में सक्षम है। इस मिसाइल के आकार के कारण इसे रडार पकड़ नहीं सकते और यह रडार की रेंज से बचने के लिए भूमि से केवल 3 4 मीटर ऊंचाई पर उड़ने में सक्षम है। ब्रम्होस रडार की पकड़ में नहीं आता इसका प्रमाण हाल ही में पाकिस्तान पर गलती से चले ब्रम्होसमिसाइल ने दे दिया है।

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समुद्र में भी मुहतोड़ जवाब देने को तैयार 

भारत में 2016 में यह निर्णय किया था कि इस मिसाइल को सुखोई विमान के साथ जोड़ा जाएगा। वर्तमान में भारत के 40 सुखोई विमान ब्रह्मोस मिसाइल दागने में सक्षम है और विमानों को इसके लिए तैयार किया जा रहा है। अंडमान निकोबार में हुआ परीक्षण चीन को ध्यान में रखकर किया गया है। अंडमान बंगाल की खाड़ी में भारत का सबसे प्रमुख सैन्य बेस है। अंडमान पर बनी एयरस्ट्रिप किसी एयर क्राफ्ट कैरियर की तरह संपूर्ण बंगाल की खाड़ी के क्षेत्र को सुरक्षा प्रदान करती है।

बंगाल की खाड़ी के पास ही स्ट्रेट ऑफ मलक्का का चोकपॉइंट है, जो अंडमान के बिल्कुल निकट है। यहाँ से  चीन का 80 प्रतिशत व्यापार होता है और चीन के मैन्युफैक्चरिंग गुड्स से लेकर, आयातित तेल तक सब यही से जाता है। ऐसे में भारत का अंडमान में सतह से सतह पर वार करने वाली ब्रम्होस मिसाइल का यहाँ परीक्षण करना चीन की नौसेना और सरकार को सन्देश है कि भारत हिमालय में उनकी किसी भी उकसावे की कार्रवाई का जवाब समुद्र में भी दे सकता है।

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भारत की शक्ति बहुत अधिक बढ़ जाएगी 

चीन ने भारत को घेरने के लिए स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स की योजना बनाई है, जिसके अंतर्गत हिन्द महासागर क्षेत्र के अंदर कई बंदरगाहों को चीन अपने कब्जे में लेकर भारत को घेरना चाहता है। जिबूती, ग्वादर, हम्बनटोटा जैसे बन्दरगाह इसी का प्रमाण है। चीन हिन्द महासागर की प्रभावी शक्ति बनना चाहता है। इसलिए भारत ने दक्षिण में तमिलनाडु में तंजावुर में ब्रम्होस दागने में सक्षम सुखोई विमानों को तैनात किया है। सुखोई स्वयं 3000 किलोमीटर तक उड़ान भरने में सक्षम है और मिड एयर रिफ्यूलिंग के बाद यह दूरी और अधिक हो जाती है। ब्रम्होस की वर्तमान मारक क्षमता 400 किलोमीटर है, इसे बढ़ाकर 800 किलोमीटर किया जाएगा। सुखोई और ब्रह्मोस के दम पर भारत तंजावुर देश से पूरे हिंद महासागर को अपने सैन्य पहुंच में रख सकता है।

भारत चीन की किसी भी योजना को सफल होने से रोकने में सक्षम है। ब्रम्होस जैसे हथियारों के कारण भारत अपने बलपर चीन की चुनौती का सामना कर सकता है। अब आवश्यकता है स्वदेशी हेवी वेट एयरक्राफ्ट की, जो सुखोई जैसे विमानों का विकल्प बनकर भारत को पूर्णतः आत्मनिर्भर बना दे। इसके अतिरिक्त भारत को ब्रह्मोस को राफेल के साथ जोड़ने पर कार्य करना चाहिए।हालांकि यह बड़ा कठिन प्रोजेक्ट होगा क्योंकि राफेल फ्रेंच तकनीक पर आधारित है और ब्रम्होस भारत और रूस द्वारा विकसित है।किंतु भारत ने इसके पूर्व भी इजराइली मिसाइल को रूसी हेलीकॉप्टर पर तैनात करने जैसा कठिन प्रोजेक्ट पूरा किया है। भारत की तकनीक से विकसित तेजस पर इजराइल और फ्रेंच मिसाइल तैनात कर चुका है, इसलिए यह आश्चर्य भी भारतीय वैज्ञानिकों के लिए सम्भव है कि राफेल को ब्रम्होस से जोड़ा जाए। जहाँ तक उम्मीद है भारत अपने नए एयरक्राफ्ट कैरियर के लिए राफेल विमान नही खरीदेगा। इसलिए विक्रांत एयरक्राफ्ट कैरियर पर तैनात ब्रम्होस और राफेल की जोड़ी भारत की शक्तियों को बहुत अधिक बड़ा देगी।

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