भारत ने प्रारंभ किया चीन से तिब्बत की स्वतंत्रता का अभियान

तिब्बत तुम घबराना मत, भारत तुम्हारे साथ है

Modi

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आखिरकार जिस कार्य के लिए भारत को बहुत समय पूर्व कमर कस लेनी चाहिए थी, वो प्रारंभ हो चुका है। तिब्बत की स्वतंत्रता का अभियान आधिकारिक रूप से आरंभ हो चुका है। इस लेख में हम जानेंगे कि कैसे भारत अब आधिकारिक रूप से तिब्बत की चीन से स्वतंत्रता के लिए वैश्विक स्तर पर लड़ाई लड़ने को तैयार है।

तिब्बत की स्वायत्ता पर चर्चा तो खूब हुई, परंतु इसे वैश्विक स्तर पर गंभीरता से भारत की ओर से शायद ही कभी उठाया गया। परंतु अब ऐसा और नहीं चलेगा। ‘International Campaign for Tibet Talks’ के अंतर्गत कभी चीन में तैनात रही भारत की पूर्व राजदूत निरुपमा राव ने भारत सरकार से याचना की है कि वह अमेरिका जैसे देशों के साथ मिलकर तिब्बत के लिए कुछ असरदार विकल्प ढूँढे, और तिब्बत पर चीनी नियंत्रण का एक असरदार कूटनीतिक विकल्प निकाले।

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निरुपमा राव ने क्या कहा है?

निरुपमा राव के अनुसार, “मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि केवल बातचीत और चर्चा तक ही हमें सीमित नहीं रहना चाहिए। निर्वासित तिब्बती समुदाय के हित में हमें इससे आगे के लिए भी सोचना चाहिए”। परंतु वे इतने पे नहीं रुकी, जवाहरलाल नेहरू की खिंचाई करते हुए वे बोली, “इतिहास में हमारे कुछ नीति निर्माताओं की सोच काफी सीमित थी, क्योंकि उन्हे भविष्य की कोई सुध न थी। उन्हें इस बात का कोई अंदाजा न था कि तिब्बत की आने वाले समय में क्या महत्व होगा और ये हमारे लिए कितना महत्वपूर्ण होगा, और इसे यूं ही चीनियों को दान कर दिया”। निरुपमा राव का संकेत नेहरू की उस अदूरदर्शिता की ओर था, जिसके कारण तिब्बत चीन का भाग बन गया था।

अक्टूबर 1950 में चीन की लिब्रेशन आर्मी ने तिब्बत पर आक्रमण कर दिया। चीन के निरंकुश नेता माओ ने तिब्बत पर हमला कर उसे चीन में मिलाने का पूरा प्रबंध कर लिया था। इस पर सरदार पटेल ने जवाहर लाल नेहरू को 7 नवंबर को पत्र लिख कर आगाह किया था तथा तुरंत अपनी सीमा को दुरुस्त करने और चीन के खिलाफ कड़े निर्णय लेने का सुझाव दिया था। सरदार पटेल ने अपने पत्र में लिखा, “तिब्बत हमारे एक मित्र के रूप में था, इसलिए हमें कभी समस्या नहीं हुई। हमने तिब्बत के साथ एक स्वतंत्र संधि कर हमेशा उसकी स्वायत्तता का सम्मान किया है। उत्तर-पूर्वी सीमा के अस्पष्ट सीमा वाले राज्य और हमारे देश में चीन के प्रति लगाव रखने वाले लोग कभी भी समस्या का कारण बन सकते हैं।”

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पत्र में आगे क्या लिखा गया?

वह चीन की आक्रमणकारी नीति के बारे में बताते हुए आगे लिखते हैं, “चीन की कुदृष्टि हमारे हिमालयी इलाकों तक ही सीमित नहीं है। वह असम के कुछ महत्वपूर्ण हिस्सों पर भी नजर गड़ाए हुए है। बर्मा पर भी उसकी नजर है। बर्मा के साथ और भी समस्या है, क्योंकि उसकी सीमा को निर्धारित करने वाली कोई रेखा नहीं है, जिसके आधार पर वह कोई समझौता कर सके। हमारे उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में नेपाल, भूटान, सिक्किम, दार्जिलिंग और असम के आदिवासी क्षेत्र आते हैं’। परंतु सरदार पटेल इतने पे नहीं रुके। अपने पत्र में उन्होंने आगे लिखा, ‘चीन की अंतिम चाल, मेरे विचार से कपट और विश्वासघात जैसी ही है। तिब्बतियों ने हम पर विश्वास किया है। हम उनका मार्गदर्शन भी करते रहे हैं और अब हम ही उन्हें चीनी कूटनीति या चीनी दुर्भावना की जाल से बचाने में असमर्थ हैं। यह दुखद बात है। ताजा प्राप्त सूचनाओं से ऐसा लग रहा है कि हम दलाई लामा को भी नहीं निकाल पाएंगे’।

लेकिन जो व्यक्ति चीन को वैश्विक स्तर तक पर मान्यता दिलाने हेतु इतना अधीर था कि वह चीन द्वारा तिब्बती बौद्ध समुदाय पर हो रहे अत्याचारों पर भी आँखें मूँद ले, उसे सरदार पटेल की सलाह भला कैसे स्मरण होती? वे तो ‘हिन्दी-चीनी भाई-भाई’ का जाप कर रहे थे, एवं पंचशील के सिद्धांतों का ढोल संसार में पीट रहे थे। अब ये और बात थी कि इसका दुष्परिणाम भारत को 1962 में भुगतना पड़ा, जब चीन ने हमें एकतरफा युद्ध में खूब धोया।

परंतु जिस प्रकार से अब समीकरण बदल रहे हैं, उससे स्पष्ट होता है कि अब स्थिति पहले जैसी नहीं रही है। अब हम वो भारत नहीं, जिसे कोई भी कभी भी कुछ भी कह दे, और हम सर झुका कर उनकी आज्ञा मान ले, चाहे वो पाकिस्तान जैसा लंपट ही क्यों न हो। अब हम वो भारत है, जो अमेरिका की आंखों में आंखें डालकर अपने अधिकारों के लिए बात कर सकते हैं और ऐसे में जो देश अपने अधिकारों से वंचित रहे हैं, जैसे तिब्बत, उनके न्याय के लिए लड़ना हमारा धर्म भी है और हमारा प्रथम कर्तव्य भी।

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