पेरियार को हटवा दिए कर्नाटक की पुस्तकों से, अच्छा बात नहीं है!

'हिंदू विरोध में अंतड़ियां सड़ाने' वाले पेरियार को ऐसे ही छोड़ना ठीक नहीं!

कर्नाटक

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कभी कभी आवश्यकता से अधिक अच्छाई भी अच्छी नहीं होती और कर्नाटक के परिप्रेक्ष्य में कुछ ऐसा ही सिद्ध हो रहा है। हाल ही में कर्नाटक ने 10वीं के पुस्तकों से ई वी पेरियार नाइकर नामक एक व्यक्ति के संस्मरणों को हटाने का निर्णय किया है। परंतु इसके लाभ कम, और नुकसान अधिक हैं। इस आर्टिकल में हम विस्तार से जानेंगे कि कैसे पेरियार को कर्नाटक या किसी भी राज्य की पुस्तक से हटवाना उचित कदम नहीं है और कैसे जहां सुई काम आ सकती है, वहाँ के लिए तलवार का प्रयोग किया जा रहा है। अब आप सोच रहे होंगे कि ये ई वी पेरियार नाइकर हैं कौन? जिनके छंदों को स्कूली पाठ्यक्रम से हटाए जाने से इतना विवाद खड़ा हुआ है और क्यों उनसे जुड़े छंद हटाना अच्छा नहीं है। ई वी पेरियार रामास्वामी वही व्यक्ति है, जिनकी सौगंध लेकर तमिलनाडु में डीएमके अपनी कुत्सित द्रविड़ राजनीति करती आई है, जिसके नाम पर भाषावाद, आर्य विरुद्ध द्रविड़ जैसे खोखले सिद्धांत एवं हिन्दू विरोधी राजनीति की विषबेल दक्षिण भारत, विशेषकर केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में व्याप्त है।

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घोर सनातनी विरोधी थे पेरियार

तो इसमें पेरियार की क्या भूमिका थी? अगर जिन्ना ने भारत का विभाजन किया, तो पेरियार ने उसे खंड खंड करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। वीर सावरकर को अकारण ही वामपंथियों ने बदनाम किया, सबसे बड़े विभाजन समर्थक तो ये पेरियार महोदय ही थे। लेकिन इस व्यक्ति की आलोचना तो छोड़िए, तमिलनाडु जैसे राज्यों में इस निकृष्ट व्यक्ति की आरती तक उतारी जाती है और मूर्तियाँ तक स्थापित की गई है, मानो ये न होते, तो देश का क्या होता।

लेकिन ये तो कुछ भी नहीं है। पेरियार भारत विरोधी के साथ साथ घोर सनातन विरोधी भी थे। ये अपने आप को समाज सुधारक कहते थे, और तमिलनाडु को ‘धर्म’ के अंधकार से दूर ले जाना चाहते थे। अपने नास्तिक होने के पीछे वह अपनी काशी यात्रा का उदाहरण देते थे, जहां उन्होंने ‘गरीबी, भुखमरी और तैरती लाशें देखी।’ उनका मन तब उचट गया, जब उन्हें एक भोजनालय में सिर्फ इसलिए प्रवेश करने से मना किया गया, क्योंकि वे ब्राह्मण नहीं थे। लेकिन रुकिए बंधु, इसमें भी झोल है। काशी में उस समय भोजनालयों में जाति के आधार पर कोई आरक्षण का प्रावधान नहीं था। इसके अलावा पेरियार की मूल जाति नाइकर थी, जो शास्त्रों के अनुसार क्षत्रियों की श्रेणी में गिने जाते थे। ऐसे में उन्हें भोजन न दिए जाने का तो प्रश्न ही नहीं उठता था। तो पेरियार अन्ना, कैसा भेदभाव?

प्रमाण सहित दिखानी चाहिए थी वास्तविकता

हालांकि, तब उस युग में सोशल मीडिया नहीं था जिससे पेरियार रामास्वामी के इन सफेद झूठों पर उँगलियाँ उठाई जा सकती थी। ऐसे में पेरियार रामास्वामी कुछ भी अनर्गल प्रलाप करते, उसे शाश्वत सत्य मान लिया जाता था। उसके अनुसार ब्राह्मणों का समाज में रहना इसलिए अस्वीकार्य है, क्योंकि वे ब्राह्मण के रूप में पैदा हुए थे। ब्राह्मण विदेशी थे, इसलिए उनका निष्कासित किया जाना आवश्यक है। इन्हीं खोखले दावों के आधार पर आज भी कई द्रविड़ राजनेता सनातन धर्म के अनुयायियों, विशेषकर ब्राह्मणों को अपमानित करते रहते हैं, और सनातन धर्म के अनुयायियों के लिए तमिलनाडु, केरल जैसे राज्य लगभग अस्पृश्य बन चुके हैं।

कर्नाटक सरकार निस्संदेह भारत के सांस्कृतिक इतिहास को सुधारने हेतु अपना योगदान देना चाहती है। परंतु यदि ऐसा ही है, तो उसे पेरियार से जुड़े छंद हटाने नहीं चाहिए, उल्टे उसकी वास्तविकता दिखाते हुए प्रमाण सहित उसे पेश करना चाहिए, जैसे हरियाणा के पाठ्यक्रम में हाल ही में किया गया, जहां स्पष्ट रूप से कांग्रेस को प्रथमत्या भारत के विभाजन के लिए दोषी ठहराया गया है। तरीका होता है बंधु, अप्लाई करके देखिए!

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