धार्मिक स्थलों को कुछ मक्कार लोगों ने पिकनिक स्पॉट बना लिया है, तत्काल बनें नियम

सनातन पूजा स्थलों पर हुक्का,शराब और सिगरेट क्यों?

केदारनाथ पिकनिक

Source- TFIPOST.in

यात्रा मुक्त करती हैं। अनुभव देती हैं। जीवन को प्रवाह प्रदान करती हैं। पुराने समय में हमारे पुरखे अध्यात्मिक चेतना की जागृति ज्ञान और संस्कृति की खोज के लिए करते थे। उनकी यात्राएं मानव समाज राष्ट्र संस्कृति ज्ञान एवं सभ्यताओं को संपन्न और परिष्कृत करती थी। वह उद्देश्य विहीन यात्राएं नहीं होती थी। राम ने जो पूरे भारत की यात्रा की तब उन्होंने दलित पतित कुंठित द्रवित और शोषित लोगों का उत्थान किया।

विवेकानंद ने जब अमेरिका की यात्रा की तब उन्होंने मानवता और विश्व बंधुत्व का संदेश दिया। गांधी ने जब अफ्रीका की यात्रा की तब उन्होंने अहिंसा असमानता और भेदभाव के खिलाफ आवाज बुलंद की। लेकिन हमारे आज के युवा क्या कर रहे हैं? उनके लिए यात्रा करना एक फैशन बन गया है। यात्राएं आपके कूल ड्यूड होने का प्रमाण बनती जा रही हैं। यह सिर्फ और सिर्फ क्षणभंगुर और अनैतिक सुखों की प्राप्ति के लिए की जाने वाली एक उद्देश्य विहीन यात्रा है। इससे किसी का भला नहीं होता।

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संस्कृति से परे है युवा

अब आप उदाहरण के लिए केदारनाथ को ही देख लीजिए। आदि शंकराचार्य ने जब देवभूमि की यात्रा की तब उन्होंने संपूर्ण मानव जाति के कल्याण के लिए प्रकृति की गोद में एक आध्यात्मिक केंद्र के रूप में केदारनाथ की नींव रखी। लेकिन, आजकल के हमारे युवा क्या करते हैं?  आध्यात्मिकता और धर्म से कोई लेना देना नहीं है। वो बस दिखावा करते हैं। शिव का नाम लेकर अपने नशे करने की विकृति को वैधानिकता प्रदान करते हैं। उसके बाद नशा करते-करते केदारनाथ जाते हैं और स्वयं को शिव का भक्त स्थापित करने की कोशिश करते हैं। आप ऐसे हजारों युवाओं को अपने दैनिक जीवन काल में देखते होंगे जिन्होंने शिव की भक्ति को एक फैशन और केदारनाथ को पिकनिक स्पॉट बना दिया है।

सरकार द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार इस साल सर्वाधिक 6 लाख लोगों ने अब तक महाप्रभु केदार के दर्शन कर लिए हैं। अब केदारनाथ कोई प्रकृति की गोद में बसा आध्यात्मिक केंद्र नहीं रहा बल्कि अब वो धीरे-धीरे एक इंसानी बस्ती बनता जा रहा है। मुख्य रूप से युवाओं के बिना रोकटोक प्रवाह ने वहां तरह-तरह के व्यावसायिक और व्यापारिक केंद्र स्थापित कर दिए है। कहीं सिगरेट मिल रही है तो कहीं मैगी और इस बीच बाबा का प्रसाद कहां मिल रहा है, यह तो युवाओं को पता ही नहीं। सबसे खास बात कि उन्हें प्रसाद से कोई खास मतलब भी नहीं है क्योंकि वह तो गांजा को ही बाबा का प्रसाद मान चुके हैं।

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देवभूमि पिकनिक स्पॉट बनता जा रहा है

इन सभी कारणों से वहां के पर्यावरण भौगोलिक परिस्थिति और शुद्धता प्रभावित हो रही है पर, सुनवाई कोई नहीं है। अब आपको बाबा के पास से हरि के द्वार अर्थात हरिद्वार लेकर चलते हैं। कहते हैं देवभूमि का यह शहर साक्षात मुक्ति का द्वार है लेकिन, दिल्ली वासियों और उसके आसपास के क्षेत्रों के लिए केदारनाथ टॉप का पिकनिक स्पॉट बन चुका है। अपनी निजी वाहन से 8 घंटे की ड्राइविंग कर आप हरिद्वार और ऋषिकेश पहुंच सकते हैं। लोग फ्राइडे नाईट को निकलते हैं। वीकेंड पर वहां पिकनिक मनाते हैं।

इस बीच आध्यात्मिकता, धर्म और ज्ञान कार में पैग लगाते और सिगरेट के छल्ले उड़ाते हैं ऐसे दुष्ट मनुष्यों का मुंह ताकती रहती है। अभी हाल ही में एक ऐसा मामला सामने आया जिसमें हरियाणा के कुछ 8-10 युवा हरिद्वार की गंगा घाट पर हुक्का और चिलम लेकर ऐसे बैठे थे जैसे वह किसी बार और बीच पर बैठे हो। इसी तरह के एक मामले में संरक्षित झील में बैठकर दारु शराब सिगरेट पीते हुए दिल्ली के कुछ लोगों का वीडियो वायरल हुआ था। इस वीडियो में वह बिना रोक-टोक के लद्दाख की झील के किनारे अपनी गाड़ी भी चला रहे हैं।

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कुल मिलाकर इस लेख का सारांश यह है की यात्राएं कई प्रकार की होती हैं- धर्म के लिए यात्रा, ज्ञान के लिए यात्रा, समाज के लिए यात्रा, राष्ट्र के लिए यात्रा और आनंद के लिए भी यात्राएं होती थी किंतु आनंद के लिए यात्रा करने का स्थान केदारनाथ, हरिद्वार और ऋषिकेश कभी नहीं होता था और न ही होना चाहिए। इससे एक गलत परंपरा का जन्म हो रहा है जो हमारे समाज और संस्कृति को विकृत कर देगा अतः सरकार को तुरंत प्रभावी कदम उठाते हुए इन स्थानों पर युवाओं द्वारा की जाने वाली यात्राओं को नियंत्रित किया जाना चाहिए आप चाहे तो इसके लिए इनर लाइन परमिट और जरूरी गाइडलाइंस जारी कर सकते हैं दंड का प्रावधान कर सकते हैं जागरूकता अभियान शुरू कर सकते हैं कुछ भी करके उन लोगों को अवश्य रोका जाना चाहिए जो केदारनाथ जैसे हिंदू धर्म के प्रमुख धार्मिक केंद्रों की यात्रा सिर्फ पिकनिक मजे और नशे के लिए कर रहे हैं।

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