गलवान से भगा दिया तो अंतरिक्ष में कब्जा करने पहुंच गया विस्तारवादी चीन

अब अंतरिक्ष में विश्व की दो महाशक्तियों के बीच वर्चस्व की जंग छिड़ी है!

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Source- TFIPOST.in

“चन्द्रमा अब चीन का है और किसी अन्य देश को यहाँ आने की अनुमति नहीं है.” ये शब्द अभी तो सत्य नहीं लेकिन नासा के प्रशासक बिल नेल्सन के अनुसार यह कथन भविष्य में सत्य हो सकता है. समाचार पत्र बिल्ड को दिए एक साक्षात्कार में नेल्सन ने कहा, “चीन अपने सैन्य अंतरिक्ष कार्यक्रम के रूप में चंद्रमा के “अधिग्रहण” पर विचार कर सकता है। कारण है चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुव जहाँ मौजूद पानी जिसे भविष्य में राकेट के लिए ईंधन तैयार करने के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है. ऐसे में यह भी संभव है कि चीनी अंतरिक्ष यात्री यह सीखने में व्यस्त हों कि दूसरे देशों के उपग्रहों को कैसे नष्ट किया जाए।” उन्होंने जोर देकर कहा कि “2035 में बीजिंग अपने स्वयं के मून स्टेशन का निर्माण पूरा कर सकता है और एक साल बाद प्रयोग शुरू कर सकता है। साथ ही उन्होंने दावा किया कि इस बार अंतरिक्ष की एक नई दौड़ में संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ चीन शामिल है.”

हालाँकि बीजिंग ने नेल्सन के इस बयान का पूरी तरह खंडन किया है और सफाई देते हुए कहा है कि चीन के महत्वाकांक्षी अंतरिक्ष कार्यक्रम विशुद्ध रूप से शांतिपूर्ण उद्देश्य के हैं. अब भले ही नेल्सन को चीन के प्रति एक कड़े निंदक के रूप में देखा जाता हो लेकिन चीन की भूमि अधिग्रहण करती विस्तारवादी सोच किसी से छिपी नहीं है. बात केवल भूमि अधिग्रहण की ही नहीं बल्कि जल क्षेत्र में भी दूसरे की सीमा में घुसकर ‘यह मेरा स्थान है’ करने वाले चीन की है.

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अगर चीन की गैरकानूनी अधिग्रहणों के विवादों के विषय में बात की जाये तो:-

बाकी सभी राष्ट्रों को छोड़ यदि केवल भारत की बात की जाए तो भारत में चीन ने अरुणांचल और लद्दाख़ दोनों ही राज्यों की सीमाओं पर भारत से कड़ी मार खाई है. एक भारत ही ऐसा देश है जो चीन को कड़ी टक्कर दे रहा है. अब नेल्सन के बयान को सुनकर लगता है कि चीन ने भारत से हार का स्वाद लेने के बाद अब चन्द्रमा पर अपना विस्तार करने का निर्णय लिया है क्योंकि वहां भारत के सैनिक उससे लड़ने और उसके हाथ पैर तोड़ने के लिए नहीं होंगे.

हालाँकि चीन और नासा के बीच जिस अंतरिक्ष में आगे बढ़ने की होड़ के बारे में नासा के प्रशासक ने बात की है ऐसी ही एक रेस या कहें कि अंतरिक्ष की जंग की बात अमेरिका ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद रूस के साथ की थी. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद भी रूस और अमेरिका वर्चस्व की लड़ाई लड़ रहे थे. ऐसे में अमेरिका ने कहा कि अमेरिका अंतरिक्ष के क्षेत्र में काफी आगे बढ़ गया है और हमने अंतरिक्षयान भी बना लिए हैं लेकिन रूस इस दौड़ में काफी पीछे है. हालाँकि अमेरिका के इन दावों को सच साबित करने वाला कोई सबूत नहीं था लेकिन रूस ने अमेरिका की बातों में आकर एक के बाद एक अंतरिक्ष परियोजनाओं में धन लगाना शुरू कर दिया जिसके बाद रूस का पूरा ध्यान अंतरिक्ष में लग गया और अमेरिका एक सुपरपावर के रूप में उभरा.

अब जब रूस-यूक्रेन के साथ युद्ध में लगा हुआ है तो ऐसे में अमेरिका को इस समय चीन से खतरा नज़र आ रहा है. चीन जो कि एक बड़ी अर्थव्यवस्था और एक शक्तिशाली देश के रूप में उभर रहा है और कई तरह के वैज्ञानिक परियोजनाओं में लगा हुआ है (फिर चाहे वह कोरोना जैसी महामारी को जन्म देना ही क्यों न हो) तो ऐसे में अमेरिका और चीन के बीच वर्चस्व पाने की लड़ाई नज़र आ रही है. अमेरिका को अपनी ‘सुपरपावर’ की गद्दी चीन के कारण खोनी न पड़ जाये इसी डर से अब वह चीन पर अपनी यह नीति आजमा रहा है.

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इन सबमें कहाँ है भारत?

अब जब वर्चस्व की लड़ाई अमेरिका और चीन के बीच में चल रही है तो भारत जो कि विश्वगुरु के नाम से जाना जाता था वह इसमें कहाँ है? आखिर भारत का क्या स्थान है? तो इसका उत्तर है कि भारत आज भी विश्वगुरु है. बात चाहे महामारी से लड़ने के लिए बेहतर वैक्सीन तैयार करने की हो या फिर खेल या राजनीति के जगत में धमाल मचाने की भारत अपना स्थान एक बार फिर दुनिया के बीच बना रहा है. आज भारत जैसी कूटनीति किसी देश की नहीं है और भारत एक बार फिर दूरदर्शी देश बन रहा है.

अमेरिका- चीन- और रूस की इस वर्चस्व की लड़ाई में भारत चुपचाप अपना काम कर रहा है. अभी कुछ समय पहले खबर आयी थी की भारत ने अंतरिक्ष में एंटी-सेटेलाइट मिसाइल लांच की जो भारत के ऊपर किसी भी देश द्वारा निगरानी रखने और भारत की खुफिया जानकारी चुराने वाली सेटेलाइट को नष्ट करने की क्षमता रखती है. इसके अलावा भारतीय सेना ने चीन और पाकिस्तान से लगी सीमाओं पर गतिविधियों पर नजर रखने के लिए एक समर्पित निगरानी उपग्रह लॉन्च करने के लिए इसरो को एक परियोजना देने का निर्णय लिया है.

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