सेक्युलरिज्म पर ज्ञान झाड़ने वाला बॉलीवुड आज तक एक भी दलित सुपरस्टार क्यों नहीं दे पाया?

पंजाबी खत्रियों, पंजाबी ब्राह्मणों, पंजाबी पाहवाओं और पंजाबी फलाना, पंजाबी ढिकाना से भरा पड़ा है बॉलीवुड!

Bollywood gang

Source- TFI

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ऐसे अनेकों क्रिया कलाप और नौटंकियों से हम विगत वर्षों में खूब परिचित हुए हैं और शमशेरा के सुपर फ्लॉप होने पर संजय दत्त के आक्रोश से भरे पोस्ट में ये कुंठा फिर निकलकर सामने आई थी। महोदय के अनुसार जनता का आक्रोश अनुचित है, इसकी कोई आवश्यकता नहीं है, बॉलीवुड ने सदैव न्याय किया है। इस लेख में हम बॉलीवुड के इस न्याय की पोल पट्टी खोलेंगे और विस्तार से जानेंगे कि आखिर इतने वर्षों तक सामाजिक न्याय का ढिंढोरा पीटने के बाद भी बॉलीवुड ने एक भी पिछड़े वर्ग का सुपरस्टार क्यों नहीं दिया?

क्या आपने कभी इस बात पर ध्यान दिया है कि ये सारा सामाजिक ज्ञान जो बांटा जाता है वो कभी भी पिछड़े वर्ग के व्यक्ति के मुख से क्यों नहीं आता? कभी सोचा है आपने कि बॉलीवुड इतना लंबा चौड़ा ज्ञान देता फिरता है परंतु जब बात आती है इसे लागू करने पर तो इनकी बत्ती और लॉजिक दोनों गुल हो जाती है। जिस प्रकार शमशेरा में अंग्रेजों से लड़ने के नाम पर जातिवाद का मुद्दा उठाया गया, क्या आप जानते हैं कि उसके प्रणेता कौन थे? स्वयं उच्च जाति के नौटंकी चंद नमूने!

आदित्य चोपड़ा ने सोचा एक फ़िल्म बनाऊंगा। चोपड़ा ने पंजाबी खत्री बंधु करण मल्होत्रा से पूछा कि डायरेक्ट करोगे? मल्होत्रा ने चोपड़ा से कहा कि कर लूंगा लेकिन हीरो कौन होगा? चोपड़ा ने कहा अपने कपूर भाई यानी रणबीर को ले लो। मल्होत्रा ने कहा, ये भी ठीक है। हीरोइन भी कपूर। साथ में संजय दत्त, रॉनित रॉय, सौरभ शुक्ला से भी एक्टिंग करना लेते हैं लेकिन कहानी कौन लिखेगा? चोपड़ा ने कहा कि नीलेश मिश्रा से लिखवा लेता हूं और तैयार हो गई आपकी शमशेरा!

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परंतु आपको क्या लगा, कथा यहीं खत्म होती है? कदापि नहीं! क्या आपने फिल्म आर्टिकल 15 देखा है? मुल्क देखा है? आर्टिकल 15 तो जातिवाद को स्पष्ट रूप से रेखांकित करती है न? अब तनिक बताइए इसमें मुख्य भूमिका में कौन थे? आयुष्मान खुराना, कुमुद मिश्रा, मनोज पाहवा इत्यादि। इसे निर्देशित किसने किया? अनुभव सिन्हा ने। लिखा किसने? गौरव सोलंकी और अनुभव सिन्हा ने। क्या इनमें से कोई भी पिछड़े वर्ग का है? खुराना तो पंजाबी खत्री, मिश्रा तो स्पष्ट तौर पर ब्राह्मण, पाहवा भी खत्री, सिन्हा तो कायस्थ और सोलंकी भी तो राजपूत हुए महाशय, तो ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सामाजिक न्याय की बातें सिर्फ खानापूर्ति के लिए थी?

अब आप लाइन से बॉलीवुड के सुपरस्टारों की मंडली को देखिए। राज कपूर पंजाबी खत्री, देव आनंद पंजाबी खत्री, हरीकृष्ण गिरी गोस्वामी यानी मनोज कुमार पंजाबी ब्राह्मण, अमिताभ बच्चन ब्राह्मण एवं कायस्थ परिवार के मेल में जन्मे। इसके अतिरिक्त राजेश खन्ना से लेकर शत्रुघ्न सिन्हा, जितेंद्र, यहां तक कि तीनों खान, दत्त परिवार, अजय देवगन, धवन परिवार, भट्ट परिवार, कोई भी पिछड़े वर्ग से तो है ही नहीं। ध्यान देने वाली बात है कि एक बार वर्ष 2010 में ‘पीपली लाइव’ के माध्यम से ओंकार दास माणिकपुरी को स्टार बनाने का दावा किया गया था और उन्हें ‘असली भारत’ का चेहरा बताया गया था परंतु फिल्म खत्म और ओंकार बॉलीवुड से ऐसे गायब हुए जैसे गधे के सर से सींग! तो सामाजिक न्याय आखिर था किसके लिए?

अब सोचिए दक्षिण भारत से ऐसे कितने सुपरस्टार निकलकर आए हैं? एक नहीं, अनेक। क्या अभिनेता, क्या निर्देशक, थोड़ा तो वहां की नीतियों की देन समझिए और थोड़ा उनकी कुछ कर दिखाने की ललक कि जात पात के बंधन कभी आड़े ही नहीं आएं। इसी विषय पर अधिकतम विवादों में रहने वाले पत्रकार दिलीप मण्डल ने अपने एक विश्लेषणात्मक लेख में चर्चा करते हुए बताया है कि “तमिलनाडु का नया सिनेमा भी फिल्म निर्माण के बॉक्स ऑफिस फॉर्मूला को तोड़ता है और समाज की सच्चाइयों को ज्यादा तल्खी से उजागर करता है। इस क्रम में खासकर जाति और शोषण के प्रश्न से टकराने का साहस इन फिल्मों ने किया है। इन फिल्मों में दलित, बहुजन, आदिवासी समुदायों के प्रतिरोध की भी दास्तान है। इन फिल्मों को बनाने वालों में पा. रंजीत का नाम प्रमुख है, जिन्होंने अट्टाकथी (2012), मद्रास (2014), कबाली (2016), काला (2018), सारपट्टा परम्बरई (2021) बनाई है। उनके साथ काम शुरू करने वाले मारी सेल्वराज ने स्वतंत्र रूप से पेरियारुम पेरुमल (2018) और कर्णन (2021) बनाई। वहीं, इन दोनों से पहले से फिल्म बना रहे वेट्रिमारन ने असुरन (2019) बनाई है। इन फिल्मों को तमिल नया सिनेमा की शुरुआत माना जा रहा है।”

अब यह तो हुई फिल्मों की बात परंतु यह बात केवल फिल्मों तक सीमित नहीं है। केवल तमिलनाडु ही नहीं, दक्षिण भारत के कोने-कोने से ऐसे ऐसे स्टार निकल रहे हैं जो योग्यता को सर्वोपरि मानकर अपनी अलग ही छाप छोड़ते हैं। वो कैसे? उदाहरण के लिए पुष्पा स्टार अल्लू अर्जुन कापू जाति के हैं। कापू जाति यानी उत्तर भारत का कुर्मी या कुशवाहा या लोधी समझिए। इसी भांति KGF स्टार यश यानी नवीन राज गौड़ा वर्ग से आते हैं, जो कुछ के लिए उच्च वर्ग तो कुछ के लिए ओबीसी है। हाल ही में ‘सूराराई पोट्टरू’ के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने वाले अपने रोलेक्स भैया यानी सूर्या सिवाकुमार गोंडुर जाति से आते हैं। उन्हें भी यादव, पाल या गुर्जर समझिए। परंतु ये बॉलीवुड में हीरो बन ही नहीं पाते और चाहेंगे भी तो नहीं बन पाएंगे। आज तक कोई नहीं बना! बॉलीवुड के लिए हीरो के फ़्रेम में पेशावर से लेकर अमृतसर के बीच वाला एस्थेटिक्स ही आता है।

ऐसे में अगली बार जब बॉलीवुड नैतिकता पर ज्ञान झाड़े तो उन्हें तथ्यों के यह बुलेट्स अवश्य दागें क्योंकि सत्य उन्हें तब भी नहीं पचा है और अब भी नहीं पचेगा।

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