जज ने 4 दिन में फैसला सुना दिया तो बड़े जज साहब ने सस्पेंड कर दिया?

बड़े जज साहब! आप चाहते क्या हैं? जल्दी निर्णय करना अपराध है क्या?

Patna High Court

Source- TFIPOST.in

इंसाफ पाने के लिए हर व्यक्ति का भरोसा न्यायपालिका पर टिका होता है। लोगों को विश्वास होता है कि अदालतों से उन्हें न्याय अवश्य मिलेगा। परंतु देखा तो होगा ही हमारे देश में न्याय पाना एक काफी लंबी प्रक्रिया नजर आती है। कई-कई मामले ऐसे होते है, जो सालों-साल तक कोर्ट में लंबित रहते है। इंसाफ पाने के लिए लोग कई सालों तक अदालत के चक्कर लगाने को मजबूर रहते है। इन कारणों से अदालतों से जल्द से जल्द मामलों की निपटारा करने की मांग निरंतर उठाई जाती है। परंतु तब क्या जब ऐसा ही करने की वजह से जल्दी मामलों का निपटारा करने के कारण एक जज को इसकी सजा दी जाए? उन्हें संस्पेंड तक कर दिया जाए?

दरअसल, बिहार से ऐसा ही मामला सामने आया। पटना हाईकोर्ट ने अररिया में अतिरिक्त जिला और सत्र न्यायाधीश शशिकांत राय पर कार्रवाई करते हुए उन्हें निलंबित कर दिया था। राय की गलती केवल यह थी कि उन्होंने एक 6 वर्षीय बच्ची के बलात्कार से जुड़े पॉक्सो मामले पर त्वरित सुनवाई की। उन्होंने केवल एक ही दिन के अंदर पूरे मामले की सुनवाई कर ली थी। इसके अलावा एक अन्य मामले में जज ने महज चार दिनों में सुनवाई करते हुए आरोपी को दोषी ठहराया और मौत की सजा सुना दी थी।

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जज साहब का तेजी से मामलों की सुनवाई करना पड़ा महंगा

शायद जिस तरह जज साहिब तेज गति से मामलों की सुनवाई पूरी करते हुए केस का निपटारा कर रहे थे, उससे हाईकोर्ट को समस्या हुई और जज के विरुद्ध कार्रवाई करते हुए उन्हें निलंबित कर दिया। हालांकि निलंबन की इस कार्रवाई के खिलाफ जज शशिकांत राय सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गए। उन्होंने एक याचिका दायर कर हाईकोर्ट के निर्णय को चुनौती दी। जज शशिकांत राय ने अपनी अर्जी में कहा कि उन्हें ऐसा लगता है कि उनके विरुद्ध एक संस्थागत पूर्वाग्रह है। उन्होंने जिस तरह कुछ मामलों का तेजी से निपटारा किया वो व्यापक रूप से काफी सुर्खियों में छाए रहे और उन्हें सरकार तथा जनता से सराहना प्राप्त हुई।

न्यायाधीश शशिकांत राय ने अपनी याचिका में यह भी कहा है कि जिला न्यायपालिका में पदोन्नति के लिए नई मूल्यांकन प्रणाली पर सवाल उठाने के कारण पदोन्नति से वंचित किया गया। पहले उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया गया और बाद में बिना कारण बताए ही निलंबित कर दिया गया। अब सुप्रीम कोर्ट ने जज शशिकांत राय की याचिका पर सुनवाई करते हुए बिहार सरकार को नोटिस जारी किया और दो हफ्तों के भीतर जवाब मांगा है। याचिका पर सुनवाई कर रही जस्टिस यूयू ललित और जस्टिस एस रवीन्द्र भट की सुप्रीम कोर्ट वाली खंडपीठ ने इस दौरान यह भी कहा कि शीर्ष अदालत के ऐसे कई फैसले हैं। जिनमें कहा गया है कि सजा उसी दिन (सुनवाई पूरी करके) नहीं सुनाई जानी चाहिए। हमारे अनुसार यह न्याय का उपहास होगा। आप एक ऐसे व्यक्ति जिसे अंतत: मौत की सजा मिलने वाली है, उसको पर्याप्त नोटिस, पर्याप्त अवसर नहीं दे रहे।

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केस की तत्काल न्याय करने पर जज का निलंबन

यहां प्रश्न यह उठते हैं कि केवल कुछ केस की जल्दी सुनवाई करने और त्वरित फैसले देने पर जज के विरुद्ध निलंबन की यह जो कार्रवाई की गई, वो आखिर कितनी सही है? क्या इसको जायज ठहराया जा सकता है? लोअर कोर्ट का फैसला अंतिम तो होता नहीं। किसी भी व्यक्ति को फैसले को चुनौती देने का अधिकार होता है। वो पहले हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट में निर्णय को चुनौती दे सकता है। अगर अदालतों को ऐसा लगता है कि जल्दबाजी में गलत फैसला दिया जा सकता है तो इसकी समीक्षा की जा सकती थी। देख सकते थे कि जज ने जो निर्णय दिया आरोपी के विरुद्ध जो धाराएं लगाई, वो सही थी या नहीं? लेकिन इसकी जगह जज के विरुद्ध निलंबन की कार्रवाई करना क्या जायज है? क्या ऐसा जरूरी है कि जब किसी मामले की लंबी सुनवाई की जाए, तब ही असल न्याय मिल पाता है? तब क्या होता जब जज ने जो फैसला तुरंत दे दिया। वो उसे एक या दो साल की सुनवाई के बाद भी वही फैसला सुनाते।

आज देखा जाए तो हमारी अदालतों में बहुत बड़ी संख्या में केस लंबित है। कुछ आंकड़ों पर गौर करें तो मालूम चलता है कि 15 जुलाई 2022 तक देश में चार करोड़ से भी अधिक मामले लंबित पड़े हुए है। केवल उच्चतम न्यायलय में ही 72,062 केस लंबित है। इसके अलावा विभिन्न उच्च न्यायालयों में 59,45,709 मामले लंबित है। ऐसे वक्त में जब करोड़ों केस देश में लंबित चल रहे है। तब सभी अदालतों को यह प्रयास करने चाहिए कि कैसे इन मामलों को जल्दी से जल्दी निपटाया जाए। परंतु इसकी जगह जब जल्दी केस निपटाने के कारण ही जज पर यूं कार्रवाई की जाएगी, तो कोई और न्यायाधीश ऐसा करेंगे? क्या उन्हें भी यह डर नहीं रहेगा कि जल्दी केस निपटाने के कारण उनके खिलाफ भी एक्शन ना ले लिया जाए?

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