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ओपन कास्ट माइनिंग जानते हैं आप, हर दिन वहां लोग मर रहे हैं

ओपन कास्ट माइनिंग पर कड़े कदम उठाने होंगे!

Deeksha Sharma द्वारा Deeksha Sharma
8 August 2022
in चर्चित
Open cast mining

Source- Google

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कहते हैं कि प्रकृति ने इंसान की जरूरतें पूरी करने के लिए अपने भण्डार खोल दिए, लेकिन फिर भी इंसान की लालच प्रकृति नहीं मिटा सकी। आज यह बात सच होती नज़र आ रही है। जब दुर्लभ पृथ्वी खनिजों की बढ़ती आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए मानव पृथ्वी को और नुकसान पहुंचाए जा रहा है। अंडरग्राउंड, ओपन कास्ट, प्लेसर और इन-सीटू- वे कुछ प्रमुख खनन विधियां हैं जिनका उपयोग दुनिया में खनिजों के निष्कर्षण के लिए किया जा रहा है। इन सभी तकनीकों में कम पूंजी और परिचालन लागत के कारण, ओपन कास्ट खनन अधिक पसंद किया जाता है। लेकिन पैसे बचाने के लिए इस्तेमाल किये जाने वाले इस खनन विधि से जो नुकसान हो रहा है उस पर न लोग ध्यान दे रहे हैं और न ही सरकार।

क्या है ओपन कास्ट माइनिंग?

ओपन कास्ट माइनिंग को ओपन-पिट माइनिंग भी कहा जाता है। यह एक सतही खनन तकनीक है जो जमीन में एक खुले गड्ढे से खनिज निकालती है। आमतौर पर खनिजों को प्राप्त करने के लिए सुरंगों की आवश्यकता पड़ती है लेकिन ओपन कास्ट माइनिंग में निष्कर्षण विधियों या सुरंगों की आवश्यकता नहीं होती। यह खनिज खनन के लिए दुनिया भर में उपयोग की जाने वाली सबसे आम विधि है। इस तकनीक का उपयोग तब किया जाता है जब खनिज का अयस्क पृथ्वी की सतह के अपेक्षाकृत करीब पाए जाते हैं।

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खनन कैसे किया जाता है?

ओपन कास्ट खनन कार्यों में भारी मात्रा में ओवरबर्डन, डंपिंग और खुदाई वाले क्षेत्र की बैकफिलिंग को हटाना शामिल है। ओवरबर्डन हटाने से तात्पर्य ऊपरी-मिट्टी को हटाने से है ताकि कोयले की परतें खनन के लिए तैयार हो सके। अयस्क (कच्चा धातु) को संसाधित करने के बाद परिणामी अपशिष्ट धारा को “टेलिंग” कहा जाता है। माइन टेलिंग कच्चे माल के खनन के प्राकृतिक उपोत्पाद हैं। बैकफ़िल (इसमें से खोदी गई सामग्री के साथ फिर से भरना) में आमतौर पर इन्हीं उपोत्पाद का इस्तेमाल किया जाता है।

ओपन कास्ट माइनिंग के लाभ

खनिकों के लिए ओपन कास्ट खनन प्रक्रिया अत्यधिक लागत प्रभावी है। खुला खनन क्षेत्र कम पूंजी और परिचालन लागत के साथ खनिजों को निकालने के लिए पर्याप्त क्षेत्र प्रदान करता है। साथ ही, इसमें कृत्रिम रोशनी, प्राकृतिक वेंटिलेशन या अन्य परिष्कृत मशीनरी की आवश्यकता नहीं होती है।

भूमिगत खनन (अंडरग्राउंड माइनिंग) के विपरीत, ओपन कास्ट माइनिंग, अर्थमूवर्स (बड़ी मात्रा में मिट्टी की खुदाई के लिए बनाया गया एक वाहन या मशीन) जैसी भारी मशीनरी को मैदान पर काम करने की अनुमति देता है। यह अधिक सुरक्षा प्रदान करता है क्योंकि इसमें कृत्रिम छत या दीवार समर्थन निर्माण की आवश्यकता नहीं होती है। साथ ही, इसमें गहरी खुदाई नहीं करनी पड़ती जिसके चलते यह खनन प्रक्रिया खनिकों के निवेश के लिए लागत प्रभावी हो जाती है।

और पढ़ें: चूना पत्थर का खदान बना संगमरमर की खदान : कैसे राजस्थान के खनन विभाग ने पहुंचाया राज्य को 1000 करोड़ का नुकसान

ओपन कास्ट माइनिंग का प्रकृति पर प्रभाव

आर्थिक दृष्टि से भले ही ओपन कास्ट माइनिंग सुविधाजनक लग रहा हो लेकिन इसकी कीमत पर्यावरण और स्थानीय लोगों को चुकानी पड़ती है।

  • पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान- खनन गतिविधि से पहले जो पारिस्थितिकी तंत्र मौजूद था वह मूल रूप से नष्ट हो जाता है।
  • मिट्टी का निम्नीकरण- विभिन्न खनन गतिविधियाँ, विशेष रूप से खुले गड्ढे, प्राकृतिक मिट्टी की विशेषताओं को काफी हद तक प्रभावित करते हैं।
  • खनन के बाद मिट्टी से की गई छेड़छाड़ उसका पीएच बदल देती है और कई मामलों में खनन के बाद मिट्टी पौधों के लिए ज़हरीली पाई गई है। मिट्टी की रासायनिक संरचना में यह परिवर्तन कृषि और स्वाभाविक रूप से होने वाली गतिविधियों को प्रभावित करता है।
  • खदानें खुली रह जाने पर मानसून में इन गहरे गड्ढों में वर्षा जल एकत्र हो जाता है, जिसके चलते ये छोटे कृत्रिम तालाबों में बदल जाती हैं। ऐसी स्थिति में ओपन कास्ट माइनिंग के रासायनिक अवशेष वर्षा जल के साथ मिल जाते हैं और यह पानी आसपास के क्षेत्रों में बह जाता है जिसके परिणामस्वरूप जल प्रदूषण होता है।
  • कृषि और वन भूमि का नुकसान- खुले खनन के मामले में गड्ढे और उसके आसपास की कृषि भूमि और वनों की कटाई का भी नुक्सान होता है।
  • भूस्खलन- खुली खदानें अक्सर मानव निर्मित आपदाओं में बदल जाती हैं। खनन कंपनियां इन खदानों को वैसे ही छोड़ देती हैं जैसे खनिजों की निकासी के बाद होती हैं। लेफ्ट ओपन कास्ट खदानें भूस्खलन जैसी आपदाओं का कारण बनती है। यह न केवल वनों बल्कि मानव जीवन और संपत्ति को भी नुकसान पहुंचता है।

इस तरह की गैर-जिम्मेदार खनन गतिविधियों के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष नकारात्मक प्रभावों का सामना गरीब और आदिवासी लोगों को करना पड़ता है, क्योंकि ये खदानें ज्यादातर दूरदराज के इलाकों में स्थित हैं जहां आम तौर पर आदिवासी रहते हैं।

और पढ़ें: जब भी तूफान आता है, दिल्ली के पेड़ सबसे पहले उखड़ क्यों जाते हैं ?

स्थिति से निपटने के लिए श्रेणीबद्ध प्रतिक्रिया

इस समस्या का समाधान खनन समाप्त कर भूमि पुनर्वास प्रक्रिया को आगे बढ़ाना है। टेलिंग या अपशिष्ट अवशेषों को वापस गड्ढे में भर उन्हें समतल करने की आवश्यकता होती है। सल्फाइड जैसे रासायन के जोखिम को रोकने के लिए पूरे क्षेत्र की मिटटी को चिकनी मिटटी की मोटी परत से कवर करना चाहिए ताकि बारिश का पानी उस रसायन को और न फैला सके।

यह भी समझना होगा कि ऐसे खनन किये हुए क्षेत्रों में से रासायनिक निक्षालन स्वाभाविक है। एक खनन क्षेत्र को एसिड न्यूट्रल बनने में हजारों साल लगते हैं। अतः किसी भी मानव या पशुधन को इसके संपर्क में आने से रोकने के लिए यह बहुत जरूरी है कि बचे हुए खनन क्षेत्रों के पास ठीक से बाड़ लगाईं जाये ताकि कोई मानव या पशु वहां न पहुँच सके।

जाने या अनजाने में, हम इन गैर-जिम्मेदार खनन प्रथाओं के दुष्प्रभावों से मारे जा रहे हैं। अल्पकालिक लागत-प्रभावशीलता आम वनस्पति-जीवों और मनुष्यों के लिए विनाशकारी साबित हो रही है। आवश्यक है कि सरकार इन खनन प्रक्रियाओं की जांच करे और प्रभावी नियमों को लागू किया जाए। अन्यथा, इससे मनुष्यों और पर्यावरण धीरे-धीरे अपना जीवन खो देंगे।

और पढ़ें: सिक्किम की जलवायु – प्रत्येक मौसम का संक्षिप्त वर्णन

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Tags: ओपनकास्ट माइनिंगकृषि भूमिखनन कंपनियांपर्यावरण
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