पाकिस्तानी आतंक फैक्ट्री का इस्तेमाल रूस के विरुद्ध करेगा अमेरिका?

अमेरिका यूं ही किसी भी देश को नहीं पुचकारता!

पाकिस्तान FATF

विश्व का यदि कोई सबसे दोगुला देश है तो वे अमेरिका ही है। अमेरिका के दोगलेपन की हकीकत अब दुनिया के सामने आने लगी हैं। हर किसी को ज्ञान बांटने वाला अमेरिका किस तरह पर्दे के पीछे पाकिस्तान जैसे देशों की मदद कर आतंकवाद का समर्थन कर रहा है, यह अब स्पष्ट तौर पर दिखने लगा है। परंतु क्यों अचानक अमेरिका, पाकिस्तान पर इतना मेहरबान होने लगा है? उसके इस कदम के पीछे का असल कारण आखिर क्या है? क्या अमेरिका, रूस के विरुद्ध पाकिस्तानी आतंकी फैक्ट्री का प्रयोग करने के लिए योजना बना रहा है? ऐसे ही कुछ प्रश्न अमेरिका द्वारा कुछ हालिया उठाये गये कदमों के बाद उठ रहे हैं।

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FATF की ग्रे सूची से पाकिस्तान बाहर

दरअसल, यह अमेरिका की ही मेहरबानी है कि आतंकियों को पालने-पोसने और संरक्षण देने वाला पाकिस्तान FATF की ग्रे सूची से बाहर निकल आया है। अपने कृत्यों के कारण पाकिस्तान चार वर्षों से इस लिस्ट में बना हुआ था और आतंकवाद को बढ़ावा देने के कारण उस पर तमाम तरह के प्रतिबंध भी लगे हुए थे। परंतु इसके बाद भी पाकिस्तान में जरा भी सुधार नहीं आया और उसने आतंकियों को संरक्षण देना जारी रखा। बावजूद इसके हाल ही में आतंक के वित्तपोषण की निगरानी करने वाली पेरिस स्थित संस्था फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (FATF) ने पाकिस्तान को ग्रे सूची से बाहर निकाल लिया है। जबकि देखा जाये तो आतंकिस्तान की हरकतें को ऐसी है कि उसे FATF की ब्लैक लिस्ट में डाला जाना चाहिए था, परंतु वो ग्रे सूची से भी बाहर आ गया।

आपको क्या लगता है कि किस सहायता से पाकिस्तान इस ग्रे लिस्ट से निकल आया है? देखा जाये तो यह सबकुछ किसी ओर के कारण नहीं केवल अमेरिका के कारण ही हुआ है। FATF एक ऐसी संस्था है, जो अमेरिका के इशारों पर ही काम करती हैं या फिर यूं कहे कि वे अमेरिका की कठपुतली है। अमेरिका FATF को अपने हिसाब से नियंत्रण करता है। इसका उदाहरण तब देखने मिला था जब अमेरिका ने जर्मनी को FATF की धमकी दी थी। अब भला अमेरिका कौन होता है किसी देश को इस प्रकार की धमकी देने वाला? वैसे तो FATF आतंकवादी वित्त पोषण और धन शोधन पर नजर रखने वाली वैश्विक संस्था है, परंतु इस पर नियंत्रण अमेरिका का दिखता है। खैर, यह समझने के लिए काफी है कि यह पूरा का पूरा खेल अमेरिका द्वारा ही रचित दिखता है।

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FATF ने रूस के खिलाफ की कार्रवाई

इसके अलावा FATF ने हाल ही में एक और बड़ा निर्णय रूस के खिलाफ भी लिया है। वह यह कि उसने भविष्य की परियोजनाओं में रूस के भाग लेने पर रोक लगा दी गई है यानी रूस FATF की आगे की योजनाओं में हिस्सा नहीं ले सकेगा। FATF के अध्यक्ष टी राजा कुमार ने बताया कि यह कदम यूक्रेन पर रूस के आक्रमण को देखते हुए उठाया गया है। एक तरह से रूस को FATF से ही किनारे कर दिया गया। FATF ने यूक्रेन पर रूस के हमले की निंदा करते हुए कहा कि उस पर अतिरिक्त प्रतिबंध लगाए जाएंगे। रूस को FATF की वर्तमान और भविष्य की परियोजनाओं से भी रोक दिया गया है।

अब रूस और अमेरिका के बीच संबंध कैसे हैं, यह हमें आपको बताने की तो आवश्यकता कतई नहीं। यूक्रेन को युद्ध की आग में झोंककर स्वयं कदम पीछे हटाने वाला कोई और नहीं अमेरिका ही था। युद्ध के दौरान अमेरिका ने बीच में चौधरी बनने की तो काफी कोशिश की, परंतु पुतिन के सामने बाइडेन की एक न चल सकी। तमाम देश एकजुट होकर भी रूस को रोकने में पूरी तरह से विफल हुए। अब जिस तरह से पाकिस्तान की टेरर फैक्ट्री का समर्थन कर रहा है, उससे ऐसा प्रतीत होने लगा है कि वे इसका प्रयोग कर रूस के विरुद्ध षड्यंत्र रच रहा है, क्योंकि अमेरिका बिना अपने मतलब के किसी को नहीं पुचकारता। इस वक्त अमेरिका सबसे अधिक रूस से ही चिढ़ा हुआ है। ऐसे में वह FATF और पाकिस्तान का इस्तेमाल रूस के खिलाफ करने की कोशिश कर सकता है।

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पूरा का पूरा खेल अमेरिका का ही है?

FATF से ग्रे सूची से बाहर निकलने के अलावा अन्य तरीकों से भी अमेरिका पिछले कुछ समय से पाकिस्तान की निरंतर मदद करता आ रहा है। हाल ही में अमेरिका ने पाकिस्तान को F16 के रखरखाव के लिए 450 मिलियन डॉलर की सहायता दी थी। पाकिस्तान इन पैसों का इस्तेमाल कहां करेगा, इससे बारे में हर कोई अच्छे से जानता ही है। पाकिस्तान के लिए FATF से बाहर आने के बाद वैश्विक लेनदेन या यूं कहे ‘भीख’ मांगना आसान हो जायेगा। परंतु इन पैसों का उपयोग वो आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए नहीं करेगा, इसकी जिम्मेदारी क्या अमेरिका लेगा?

अमेरिका और पाकिस्तानी के बीच बढ़ते नजदीकियों का परिणाम पूरे विश्व के लिए घातक साबित हो सकता है। भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भी कुछ समय पूर्व इस पर बड़ी टिप्पणी की थी और कहा था- “इस्लामाबाद और वाशिंगटन के बीच संबंधों से न तो पाकिस्तानियों का भला है और न ही अमेरिकियों का। अमेरिका को पाकिस्तान से अपने संबंधों पर सोचना चाहिए कि उसे इससे क्या हासिल हुआ। मैं ये बात इसीलिए कह रहा हूं क्योंकि ये आतंकवाद विरोधी समान है। जब आप एफ-16 की क्षमता जैसे विमान की बात कर रहे हैं, हर कोई जानता है, ये आप भी जानते हैं कि विमानों को कहां तैनात किया गया है और उनका क्या उपयोग किया जा रहा है।“

अमेरिका का उद्देश्य भले ही रूस के विरुद्ध हो या किसी ओर के, परंतु यूं पाकिस्तान का साथ देकर वे एक तरह से उसके आतंकवाद के दाग धोने का कार्य कर रहा है और पर्दे के पीछे से आतंकवाद का भी समर्थन कर रहा है, जो आने वाले समय कही उसके लिए ही भारी न पड़ जाए।

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