प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में बिना पीएचडी के बन सकते हैं प्रोफेसर, जानिए कैसे

UGC के नए नियम पढ़े आपने?

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आज भारत जिस तीव्र गति से विकास के पथ पर अग्रसर है, उस गति को प्राप्त करने के लिए उसने अथक परिश्रम किया है। भारत ने लगभग हर क्षेत्र में आवश्यकतानुसार परिवर्तन किया है। मूलतः भारत ने बुनियादी ढांचा, औद्योगिक इकाइयों के लिए नीतियों में सुधार इत्यादि कार्यक्रम पर जोरों-शोरों से बल दिया है। इन सबका समग्र परिणाम हमारे सामने है, भारत आज ब्रिटेन को पछाड़ते हुए विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है। इन्फ़्रस्ट्रक्चर से लेकर स्वास्थ्य तक और विनिर्माण से लेकर लघु उद्योग नीतियों तक भारत ने बहुत ही सराहनीय कार्य किए हैं।

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शिक्षा के क्षेत्र में भारत

बात अगर शिक्षा के क्षेत्र की करें तो इसमें भारत उस गति के साथ आगे नहीं बढ़ पाया जितनी उसमें क्षमता है, वस्तुतः भारत में 2015-16 से 2019-20 तक छात्र नामांकन में 11.4 फीसदी की वृद्धि हुई है और इसी अवधि के दौरान उच्च शिक्षा में महिला नामांकन में भी 18.2 फीसदी की वृद्धि हुई है। अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण (एआईएसएचई) 2019-20 की रिपोर्ट के अनुसार, उच्च शिक्षा में सकल नामांकन अनुपात (जीईआर) 2019-20 में 27.1% है। किंतु यदि हम इस आंकड़े को विकसित देशों के साथ तुलनात्मक रूप से अध्ययन करें तो हम पाएंगे कि हमारे उच्च शिक्षा पर किए जाने वाला व्यय उतना नहीं है जितना विकसित देशों में है।

2017-18 को संदर्भ वर्ष के रूप में लेते हुए, एक रीसर्च संगठन ने 10 देशों- यूएस, यूके, फ्रांस, जर्मनी, ब्राजील, चीन, इंडोनेशिया, भारत, दक्षिण अफ्रीका और पाकिस्तान के जीईआर का अध्ययन किया है।  अध्ययन में यह निष्कर्ष निकाला कि अमेरिका में सबसे अधिक 88.2 प्रतिशत जीईआर है, इसके बाद जर्मनी (70.3 प्रतिशत), फ्रांस (65.6 प्रतिशत), यूके (60.6 प्रतिशत), ब्राजील (51.3 प्रतिशत), चीन (49.1 प्रतिशत) का स्थान है। इंडोनेशिया (36.4 फीसदी) और भारत (2017-18 में 27.4 फीसदी, 2018-19 में26.3 फीसदी)। भारत से नीचे के दो देश दक्षिण अफ्रीका (22.4 प्रतिशत) और पाकिस्तान (9.4 प्रतिशत) हैं।

“भारत के लिए उच्च शिक्षा में जीईआर विकसित देशों की तुलना में कम है क्योंकि संबंधित आयु वर्ग के छात्रों की एक बड़ी आबादी कॉलेजों में नामांकन के लिए पात्र नहीं है। इसका मूल कारण यह है कि उन्होंने 12वीं कक्षा की उच्च माध्यमिक शिक्षा सफलतापूर्वक पूरी नहीं की है, इसके साथ साथ और भी कई कारण हो सकते हैं।

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UGC ने लिया है एक बड़ा निर्णय

दूसरी तरफ UGC ने उच्च शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए अपने नीतियों में ऐतिहासिक परिवर्तन किया है। वस्तुतः अभी तक उच्च शिक्षण संस्थानों में नियमित प्रोफेसर या एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में भर्ती के लिए पीएचडी आवश्यक होती थी किंतु अब UGC ने नियम में बदलाव करते हुए कहा है कि प्रोफेसर का पद जो औपचारिक शैक्षणिक योग्यता के बिना यानी पीएचडी डिग्री के बिना भी उद्योग और पेशेवर विशेषज्ञों द्वारा भरा जा सकेगा। वस्तुतः उच्च शिक्षा संस्थानों में स्वीकृत पदों में से 10 प्रतिशत पद पर एवं उनकी नियुक्ति अधिकतम चार साल के लिए की जाएगी।

किंतु योग्य उम्मीदवारों को कम से कम अपने फ़ील्ड में 15 साल की विशेषज्ञता रखनी होगी। UGC द्वारा दिशानिर्देशों में कहा गया है कि इस प्रकार के नव निर्मित पद के लिए, औपचारिक शैक्षणिक योग्यता को आवश्यक नहीं माना गया है, ऐसे व्यक्ति जिनके पास उचित विशेषज्ञता है उन्हें प्रोफेसर स्तर पर संकाय सदस्यों की भर्ती के लिए निर्धारित प्रकाशनों की आवश्यकता और अन्य पात्रता मानदंड से भी छूट दी जाएगी। हालांकि, उनके पास निम्नलिखित अनुभाग में निर्दिष्ट कर्तव्यों और जिम्मेदारियों को पूरा करने का पूर्ण कौशल होना चाहिए।

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उच्च शिक्षा के क्षेत्र में आमूलचूल परिवर्तन

वस्तुतः UGC द्वारा लिया गया यह निर्णय न केवल उच्च शिक्षा के क्षेत्र में आमूलचूल परिवर्तन लाएगा अपितु इससे विद्यार्थियों के मन में पढ़ाई के प्रति एक नई भावना जन्म लेगी जो पढ़ने से कहीं अधिक सीखने पर बल देगी। ये विशेषज्ञ आधारभूत ज्ञान को सीधे विद्यार्थी तक पहुंचाएंगे। कई बार यह भी देखा गया है कि किताबी ज्ञान वर्तमान समय में उतना प्रासंगिक नहीं रह जाता है जितना की व्यवहारिक ज्ञान। व्यवहारिक ज्ञान कई बार व्यावहारिक समस्याओं को अधिक अच्छे से सुलझा पाते हैं।

ऐसे व्यक्ति को भी पढ़ाने का अवसर मिलेगा जो किसी कारणवश पीएचडी नहीं कर पाया हो लेकिन अपने क्षेत्र में उसने सराहनीय कार्य कियेहैं। UGC द्वारा लिया गया यह निर्णय भारत के उच्च शिक्षा को सकारात्मक रूप से परिवर्तित करने की पूर्ण योग्यता रखता है।

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