पारसी देश के सबसे धनाढ्य और सबसे उद्यमी अल्पसंख्यक हैं, साथ ही वंशवाद के ध्वजवाहक भी

गोदरेज से लेकर टाटा को देख लें या फिर पॉल्सन से लेकर वाडिया कम्पनीज़ को पारसी समुदाय में वंशवाद का एक अलग ही रूप देखने को मिलता है, जहां अन्य लोगों के लिए तनिक भी स्थान नहीं है।

nepotism of parsees, पारसी अरबपति

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ईरानी कैफे, वाडिया ग्रुप ऑफ कम्पनीज़, टाटा ग्रुप, इन सबमें समान बात क्या है? ये सब पश्चिमी भारत में उद्यमिता का अनुपम उदाहरण हैं और उसमें भी एक समुदाय के उत्थान का, जिसने विपरीत परिस्थितियों में भी अपने आप को न केवल संभाला अपितु हर स्थिति में एक अनोखा उदाहरण पेश किया, चाहे देशवासियों को उनके तौर तरीके पसंद आए या नहीं। ये है कथा देश के पारसी समुदाय की, जिन्होंने भारत को एक नया रूप, एक नयी दिशा और दशा दी। परंतु कभी सोचा कि यह किसी अन्य समुदाय को आगे क्यों नहीं बढ़ने दिए? टीएफआई प्रीमियम में आपका स्वागत है। इस लेख में हम जानेंगे कि कैसे पारसी (पारसी उद्योगपति) देश के सबसे धनाढ्य और सबसे उद्यमी अल्पसंख्यक तो हैं, लेकिन साथ ही वंशवाद के ध्वजवाहक भी हैं?

अजीब लगा क्या? परंतु एक सत्य यह भी है। नवसारी एवं वलसाड से निकलने वाले पारसी समुदाय का उद्यमी आज देश में अपना एक अलग स्थान बनाए हुए हैं। परंतु गोदरेज से लेकर टाटा तक, पॉल्सन से लेकर वाडिया कम्पनीज़ तक पारसी समुदाय में भी वंशवाद का एक अलग ही रूप देखने को मिलता है, जहां अन्य लोगों के लिए तनिक भी स्थान नहीं है। उदाहरण के लिए अमूल डेयरी की स्थापना का देखिए।

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पारसी उद्योगपति ने की अमूल की स्थापना

20वीं सदी के प्रारंभ में उद्भव हुआ एक पारसी उद्योगपति पेस्टोनजी एडुलजी का। इन्होंने डेयरी उद्योग में निवेश करने का निर्णय लिया और परिणाम था पॉल्सन डेयरी। इसका प्रथम डेयरी प्लांट गुजरात के आणंद में ही स्थापित किया गया था, जिसकी लागत तब 7 लाख रुपये से अधिक की थी। प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के समय ये मक्खन और कॉफी भारी मात्रा में ब्रिटिश इंडियन आर्मी के लिए निर्मित करता था और इसका ब्रांड वैल्यू इतना लोकप्रिय था कि इसके लिए मुख्य ब्रिटिश आर्मी एवं अमेरिकी आर्मी तक मांग करते थे। एक समय पॉल्सन प्रतिदिन 5 टन मक्खन का निर्माण करता था और इसकी नमकीन मक्खन की तकनीक ऐसी थी कि इसके समक्ष कोई अन्य टिक ही नहीं पाता था।

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परंतु यही सफलता अब इसके सर चढ़ने लगी और शनै शनै ये एकाधिकार में परिवर्तित होने लगी। एक बार को समझ में आता है कि आपको वर्चस्व स्थापित करना है, परंतु इसके लिए अनावश्यक तरह से एकाधिकार कायम करना कहां तक सही लगता है? दरअसल, क्षेत्र में एकाधिकार होने के नाते किसान औने-पौने दाम पर अपना दूध इसे बेचने को मजबूर थे। पॉल्सन गुजरात एवं अन्य क्षेत्रों से कौड़ियों के दाम पर दूध खरीदकर मुंबई एवं अन्य क्षेत्रों में दूध की सप्लाई करके बड़ा मुनाफा कमाती थी। ये कंपनी ब्रिटिश आर्मी को भी दूध सप्लाई करती थी।

किसानों के प्रतिनिधि त्रिभुवन दास पटेल अपनी समस्या लेकर सरदार वल्लभ भाई पटेल के पास गये। सरदार वल्लभभाई पटेल तो भारत छोड़ो आंदोलन के समय से ही इस दिशा में व्यापक परिवर्तन करने को आतुर थे, परंतु यहां उन्हें कुछ और ही सूझा। उनका विचार स्पष्ट था, ‘आपके हाथ में शक्ति है, आप स्वयं क्यों नहीं पराजित करते?’ इसी परिप्रेक्ष्य में उन्होंने एक सहकारी संस्था बनाने का सुझाव दिया और यही से अमूल जैसे विश्वप्रसिद्ध संस्था की नींव पड़ी।

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Cyrus Mistry ने संभाली थी टाटा समूह की कमान, लेकिन फिर…

अब ये तो बात हुई अमूल की, परंतु टाटा ग्रुप का उत्तराधिकारी कोई गैर टाटा परिवार का व्यक्ति या वाडिया ग्रुप का उत्तराधिकारी कोई गैर वाडिया हुआ है? ‘गुरु’ फिल्म को ही अगर आप देख लें, तो आप गुरुकांत देसाई और कॉन्ट्रैक्टर के बीच की झड़प से स्पष्ट समझ सकते हैं कि पारसी स्वयं उद्यमी थे, परंतु वे किसी अन्य को अपने से आगे बढ़ता हुआ देखना पसंद नहीं करते थे। पारसी उद्योगपति उदारीकरण के प्रति भी उतने इच्छुक नहीं थे, जितने अन्य उद्योगपति थे।

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चलिए इनकी छोड़िए, साइरस मिस्त्री का नाम सुना है? ये तो टाटा ग्रुप के सर्वेसर्वा बने थे, वो भी 2012 में। दिसंबर 2012 में रतन टाटा के बाद साइरस मिस्त्री को टाटा संस का चेयरमैन नियुक्त किया गया था। वो टाटा ग्रुप में यह पद संभालने वाले सबसे युवा और बाहरी व्यक्ति थे। परंतु चार वर्षों तक टाटा की कमान संभालने के बाद वर्ष 2016 में उन्हें अचानक ही पद से हटा दिया गया, जिसके बाद इस पर बड़ा विवाद भी खड़ा हुआ। ये तब था जब स्वयं साइरस मिस्त्री पारसी थे पर चूंकि बाहरी थे और वंशवादी नहीं तो इसलिए इनका पत्ता कटवा दिया गया।

इन उदाहरणों को देखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि पारसी अपने आप में इस देश के एक अभिन्न अंग हैं, जिन्होंने देश के लिए योगदान दिया है, परंतु इनके अजीबोगरीब वंशवाद पर लोगों ने कम ही ध्यान दिया। इस कारण भारत चाहकर भी सम्पूर्ण प्रगति नहीं कर सका है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि पारसी देश के सबसे धनाढ्य और उद्यमी अल्पसंख्यक तो है, परंतु सबसे निस्वार्थ कहना थोड़ा ज्यादा हो जाएगा।

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