गुरु वशिष्ठ और विश्वामित्र में आजीवन संघर्ष रहा लेकिन अंततः कुछ इस तरह विश्वामित्र भारी पड़े

विश्वामित्र और गुरु वशिष्ठ की कथा को जानिए जो अत्यंत रोचक और उत्साह से भर देने वाली है।

वशिष्ठ और विश्वामित्र, The lifelong clash of Vashishtha and Vishwamitra and how Vishwamitra had the last laugh

Source- TFI

सनातन संस्कृति में गुरु परंपरा का एक लंबा इतिहास रहा है और इस परंपरा में विश्वामित्र और गुरु वशिष्ठ जैसे दो बड़े गुरुओं के नाम हमारे समक्ष आते हैं, जोकि सनातन संस्कृति में महान गुरु परंपरा के उदाहरण रहे हैं। इन दोनों महान गुरुओं का प्रभु श्रीराम के जीवन से गहरा जुड़ाव रहा है।  विश्वामित्र और गुरु वशिष्ठ की कथा के बारे में बात की जाए तो यह अत्यंत रोचक और उत्साह से भर देने वाली है। इस लेख में जानेंगे गुरु वशिष्ठ और विश्वामित्र के आजीवन संघर्ष से और जानेंगे कि इस संघर्ष में कौन आगे निकल गया।

स्वादिष्ट भोजन और सुरभि गाय

क्षत्रिय कुल में जन्में विश्वामित्र एक बार वन में अपनी सेना के साथ विचरण कर रहे थे, तभी सभी को भूख-प्यास लगी। वन में उन्हें एक कुटिया दिखी जो गुरु वशिष्ठ की थी। विश्वामित्र उस कुटिया के पास पहुंचकर गुरु वशिष्ठ को अपना परिचय देते हुए भोजन-पानी की इच्छा की। जिस पर गुरु वशिष्ठ ने विश्वामित्र और उनके सैनिकों का सत्कार करते हुए स्वादिष्ट भोजन करवाया। घने वन में एक कुटिया और वहां इतने स्वादिष्ट भोजन को ग्रहणकर विश्वामित्र चकित हुए सोचने लगे कि एक तपस्वी ब्राह्मण ऐसा उत्कृष्ट भोजन कैसे करवा सकते हैं।

वो गुरु वशिष्ठ से पूछ बैठे कि ऐसा कैसे? इस पर गुरु वशिष्ठ ने उत्तर दिया कि उनके पास एक सुरभि नाम की गाय है जो आश्रम में सबकी आवश्यकताओं की पूर्ति करती है। बस इतना सुनना था कि विश्वामित्र ने कहा कि आप तो ठहरे तपस्वी, आप इस गाय का क्या करेंगे, यह मुझें दे दें। इस पर गुरु वशिष्ठ ने कहा कि ये गाय प्रारंभ से ही हमारे साथ रह रही है लेकिन तब भी आप इसे ले जा सकते हैं तो ले जाइए। गुरु वशिष्ठ का इतना कहना था कि उन्होंने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि इस गाय को ले चलो। आदेश पाकर सैनिक जैसे ही आगे बढ़े सुरभि गाय अपने आत्मरक्षा और आत्मसम्मान के लिए दहाड़ लगाती है जिससे उसके पूरे शरीर से उसकी रक्षा के लिए सैनिक निकलने लगते हैं और विश्वामित्र के सैनिकों को परास्त कर देते हैं।

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ब्राह्मण देवता से राजा का हार जाना

ब्राह्मण देवता से एक राजा हार गया, इस बात को अपने हृदय में दबाए हुए विश्वामित्र वहां से चले गए। बाद में वशिष्ठ को पराजित करने के लिए उन्होंने वशिष्ठ की अनुपस्थिति में उनकी पूरी कुटिया को अग्निबांण से भस्म कर दिया।

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जब वशिष्ठ ने यह देखा तो बहुत क्रोधित हुए और धरती पर पड़ा एक दंड उठाकर विश्वामित्र के सामने खड़े हो गए। एक बलशाली राजा के सम्मुख एक ब्राह्मण को दंड लेकर उसके अग्निबांण का सामना करते देख विश्वामित्र हंसने लगे। लेकिन विश्वामित्र को गुरु वशिष्ठ ने अपने दंड से ही बड़ी सरलता से पराजित कर दिया।

विश्वामित्र के हर शस्त्र और अस्त्र का उत्तर गुरु वशिष्ठ ने अपने दंड से दिया जो कि एक ब्राह्मण के द्वारा उठा लेने मात्र से ही वह दंड ब्रह्मदंड में परिवर्तित हो चुका था। और इस तरह एक बार फिर विश्वामित्र गुरु वशिष्ठ से पराजित हुए। इसके बाद अपने धनुष बांण को धरती पर फेंककर वो कहते हैं कि क्या लाभ हुआ मेरे क्षत्रिय होने का जब मैं एक दंडधारी ब्राह्मण को ही पराजित नहीं कर सकता। उन्होंने उसी समय गुरु वशिष्ठ से कहा कि मैं अब आपसे भी बड़ा तपस्वी बनकर दिखाऊंगा।

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विश्वामित्र को दिव्यता प्राप्ति हुई

फिर क्या था विश्वामित्र ने ऐसी घोर तपस्या की कि इंद्र का सिंहासन डोलने लगा और यहीं पर स्वर्ग की अप्सरा मेनका के द्वारा विश्वामित्र के तप को भंग करने का प्रसंग आता है। हालांकि मेनका के द्वारा तपस्या भंग करने से पहले ही विश्वामित्र को दिव्यता प्राप्त हो चुकी थी।

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अब विश्वामित्र अपनी शक्ति का परीक्षण करना चाहते थे और इसी समय उनके पास इक्ष्वाकु वंश के त्रिशंकु सशरीर स्वर्ग पहुंचने की इच्छा लेकर उनके पास पहुंचते हैं। त्रिशंकु पहले ही गुरु वशिष्ठ समेत कई तपस्वियों के पास अपनी इच्छा लेकर जा चुके थे लेकिन सबने उन्हें इस कार्य के लिए मना कर दिया था। दूसरी तरफ विश्वामित्र अपनी शक्तियों के परीक्षण के लिए त्रिशंकु की इच्छा पूरी करने लगते हैं लेकिन स्वर्गलोक और पृथ्वी के बीच त्रिशंकु अटक कर रह जाते हैं और यहां फिर से विश्वामित्र विफल रहते हैं।

आगे चलकर इक्ष्वाकु वंश में महाप्रतापी राजा दशरथ के पुत्र रामचंद्र हुए, तो वहीं इक्ष्वाकु वंश के कुल गुरु वशिष्ठ थे और इस तरह उन्होंने राम और उनके भाइयों को शिक्षा दी। एक दिन ऐसा हुआ कि राजा दशरथ अपने पुत्र राम को गोद में लिए बैठे थे जिन पर विश्वामित्र की दृष्टि पड़ी। विश्वामित्र ने राजा दशरथ से कहा कि ये तु्म्हारा पुत्र चौदह पंद्रह वर्ष का हो चुका है और तुम इसे बच्चे की तरह गोद में लिए बैठे हो।

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विश्वामित्र यह जानते थे कि राम कोई सामान्य बालक नहीं बल्कि विलक्षण प्रतिभा के धनी हैं। वे राजा दशरथ से कहते हैं कि इस समय राक्षस ऋषियों के तप भंग कर रहे हैं और तुम उन्हें रोकने तक का प्रयास नहीं कर रहे हो। उन्होंने राम और लक्ष्मण को राजा दशरथ से मांगा और कहा इन्हें मुझे दे दो मैं इन्हें एक योद्धा बनाकर तुम्हें सौंप दूंगा। कुल गुरु वशिष्ठ और राजा दशरथ को यह स्वीकार्य तो नहीं था लेकिन अंत में दोनों विश्वामित्र के तर्कों के सामने हार गए और श्रीराम और लक्ष्मण को विश्वामित्र के साथ भेज दिया।

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राम और लक्ष्मण

राम और लक्ष्मण दोनों को आगे की शिक्षा और अस्त्र-शस्त्र का ज्ञान देते हुए विश्वामित्र ने उन्हें परिपक्व तो बनाया ही इसके साथ ही तप भंग करने वाले राक्षसों का अंत करवाया, ताड़का वध करवाया। जिससे राम की ख्याति एक योद्धा के रूप में चहुओर फैसले लगी। अंततः सुकुमार बालकों को विश्वामित्र ने योद्धा बनाकर राजा दशरथ को सौंप दिया।

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जिस राम को गुरु वशिष्ठ ने प्रारंभिक शिक्षा दी उसी राम को विश्वामित्र ने महान योद्धा बना दिया इस तरह अंततः कुलगुरु वशिष्ठ के आगे श्रीराम के गुरु विश्वामित्र कहीं आगे निकल गए। श्रेष्ठता के इस जीवनभर के संघर्ष और द्वंद्व में योद्धा राम के गुरु विश्वामित्र की जीत हुई। आज युगों बाद भी राम के गुरु के रूप में विश्वामित्र को ही अधिक स्मरण किया जाता है।

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