पीएम मोदी गलत नहीं कहे थे : कांग्रेस के राशिद अल्वी ने पुनः सुप्रीम कोर्ट के अस्तित्व पर प्रश्न उठाया

पुरानी आदत है 

राशिद अल्वी

SOURCE TFI

न्यायपालिका और सरकार के क्या अधिकार होने चाहिए, क्या नहीं, ये अनंत वाद विवाद का विषय है, और अभी भी यह अंतरद्वन्द जारी है। परंतु कुछ ऐसे भी महानुभाव हैं जो सत्ता तो सत्ता, विपक्ष में भी अपने हितों के विरुद्ध निर्णय आने पर न्यायपालिका के अस्तित्व पर ही प्रश्न उठा देते हैं। अभी मौलाना मदनी के विवादित बयान को ठंडा भी नहीं हुआ कि कांग्रेस ने पुनः सुप्रीम कोर्ट के अस्तित्व पर ही प्रश्न उठा दिया। जैसे गली क्रिकेट में कुछ बच्चे अपनी असफलताओं के लिए अपने आप को छोड़कर सभी को दोष देते फिरते हैं, कांग्रेस भी अब राजनीति के गली क्रिकेट में उन्हीं बच्चों जैसा बनती दिख रही है।

इस लेख में जानेंगे कि कैसे कांग्रेस के राशिद अल्वी ने सुप्रीम कोर्ट पर दबाव में आकर राम जन्मभूमि के पक्ष में निर्णय सुनाने का आरोप लगाया, और कैसे इस आदत की भविष्यवाणी कई दिनों पूर्व संसद में पीएम मोदी ने कर दी थी। 

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सुप्रीम कोर्ट को खूब खरी-खोटी सुनाई

तो हाल ही में राम जन्मभूमि से जुड़े एक मामले पर कांग्रेस के विवादित नेता राशिद अल्वी ने सुप्रीम कोर्ट को खूब खरी-खोटी सुनाई। असल में मामले से संबंधित एक पूर्व न्यायाधीश, जस्टिस एस अब्दुल नज़ीर को हाल ही में आंध्र प्रदेश का राज्यपाल नियुक्त किया। अब प्रशासनिक सेवा, चाहे वह आईएएस हो, सेना हो या फिर न्यायपालिका, इनके कुछ चुने हुए सेवानिवृत्त अधिकारियों को राज्यपाल के मानद पद पर बिठाया जाता है। परंतु ये तो कांग्रेस है भई, तिनके में भी विवाद करने का बहाना ढूंढ ले।

इसी परिप्रेक्ष्य में कांग्रेस नेता राशिद अल्वी ने केंद्र की मोदी सरकार को लपेटे में लेते हुए सुप्रीम कोर्ट  के दिए निर्णय पर ही प्रश्न उठाया है। इनके अनुसार,  “बहुत सारे लोग मानते हैं कि राम जन्मभूमि मामले में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय सरकार के दबाव में दिया गया था। जजों को सरकारी जॉब देना दुर्भाग्यपूर्ण है। एक रिपोर्ट के अनुसार सुप्रीम कोर्ट के 50 प्रतिशत रिटायर्ड जजों को सरकार कहीं न कहीं भेज देती है। इससे लोगों का यकीन न्यायपालिका में कम होता जाता है। जस्टिस गोगोई को अभी तो राज्यसभा भेजा गया था। अब सरकार ने जस्टिस एस अब्दुल नजीर को गवर्नर बना दिया।

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राशिद अल्वी ने और क्या कहां

अब इस लॉजिक से देखें तो वर्तमान CJI डी वाई चंद्रचूड़ [जो कांग्रेसियों एवं वामपंथियों के प्रिय हैं] बहुत दबाव में थे क्योंकि वे भी अयोध्या में स्थित श्री राम जन्मभूमि के पक्ष में निर्णय सुनाने वाली न्यायिक पीठ में सम्मिलित थे। परंतु ये तो मात्र प्रारंभ है, क्योंकि राशिद अल्वी ने आगे कहा, “राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए निर्णय पर बहुत लोग सवालिया निशान लगाते चले आ रहे हैं कि यह गवर्नमेंट के दबाव में हुआ है। जस्टिस गोगोई के बाद जस्टिस नजीर को गवर्नर बनाना, उन लोगों के शक को और मजबूत करता है। संविधान का आर्टिकल 50 कहता है कि न्यायपालिका और कार्यपालिका अलग-अलग होनी चाहिए। सरकार को प्रयास करना चाहिए कि न्यायपालिका बिल्कुल अलग हो और उसका कार्यपालिका से कोई वास्ता न हो”।

बता दें कि सेवानिवृत्त जस्टिस एस अब्दुल नजीर और पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई राम जन्मभूमि विवाद पर निर्णय देने वाले पांच सदस्यीय संवैधानिक पीठ का हिस्सा थे। इसके अतिरिक्त जस्टिस नजीर ‘तीन तलाक’ मामले पर निर्णय देने वाले जजों में शामिल थे।

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अब्दुल नजीर का उदाहरण

परंतु राशिद अल्वी इतने पर ही नहीं रुके। इन्होंने अब्दुल नजीर का उदाहरण देते हुए अन्य राज्यपालों को भी लपेटे में लिया। इन्होंने कहा, “हाल ही में महाराष्ट्र के पूर्व गवर्नर भगत सिंह कोश्यारी ने त्यागपत्र दिया, और वे लगातार ऐसे बयान देते रहें हैं जो आरएसएस की विचारधारा से जुड़े हुए हैं। तमिलनाडु के गवर्नर यही काम कर रहे हैं। नॉर्थ ईस्ट के कई गवर्नर यही काम कर रहे हैं। केरल का गवर्नर यही काम कर रहा है। गवर्नर संविधान की रक्षा करने के बजाए आरएसएस और बीजेपी की विचारधारा की बात करते हैं। उन्हें लगता होगा कि अगर भाजपा व आरएसएस की लीडरशिप खुश होगी तो उन्हें और तरक्की मिलेगी।”

अब ये तो हुआ राशिद का अनर्गल प्रलाप, परंतु ये बहुत ही पहुंचे हुए व्यक्ति है। पर इसके बारे में बाद में, प्रश्न तो अब भी व्याप्त है: राशिद अल्वी मौलाना मदनी की बोली कैसे बोल रहे थे और पीएम मोदी ने ऐसी मानसिकता के बारे में पूर्व में किस प्रकार सचेत किया था?

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पीएम मोदी की भविष्यवाणी

असल में कुछ दिनों पूर्व जमीयत उलेमा ए हिन्द के अधिवेशन में मौलाना अरशद मदनी ने कट्टरपंथी विचारधाराओं को बढ़ावा देते हुए कहा था कि इस्लाम का अपमान बर्दाश्त नहीं है। उन्होंने ये भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के दबाव में राम जन्मभूमि पर निर्णय लिया, और ये स्वीकार्य नहीं है। अब वही बातें राशिद अल्वी अपने मुख से दोहरा रहे हैं, और ध्यान रहे कि कुछ ही समय पूर्व कांग्रेस “भारत जोड़ो यात्रा” के माध्यम से अपने राजनीतिक भविष्य को संवारने में जुटी हुई थी। अब यह संयोग है या सोचा समझा प्रयोग, निर्णय आपका।

तो इन सबके बारे में पीएम मोदी ने कैसे भविष्यवाणी की? हाल ही में संसद में जब कांग्रेसी अडानी से संबंधित विवादों पर प्रकाश डालकर मोदी सरकार को लपेटे में लेना चाहते थे, तो कांग्रेस द्वारा ऐसे बेतुके विषयों पर संसद की कार्यवाही बाधित करने के निरंतर प्रयास से क्रोधित पीएम मोदी अपने व्यंग्य बाणों सहित टूट पड़े। उन्होंने कांग्रेस को जमकर धोते हुए यहां तक कह दिया कि इन्हें किसी भी संस्था में विश्वास नहीं है।

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हास्यास्पद निर्णय का बचाव

पीएम मोदी के अनुसार जो भी कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्ष के “हितों के विरुद्ध निर्णय” ले, वे सब गलत है। सेना शौर्य दिखाए तो सबूत मांगों, चुनाव आयोग कार्रवाई करे तो चुनाव आयोग पर प्रश्न उठाओ, ED या CBI कार्रवाई करें तो वे गलत, यहां तक कि अगर इनके कहे अनुसार मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया, और उन्होंने भी “निष्पक्ष निर्णय” सुनाया, तो सुप्रीम कोर्ट भी गलत!

परंतु राशिद अल्वी को कोई ऐसा वैसा मत समझिए। इनका इतिहास ऐसा है कि एक बार को नसीरुद्दीन शाह भी इनके समक्ष नतमस्तक हो जाएं। उदाहरण के लिए 2009 में जब कांग्रेस सरकार द्वारा विजय दिवस नहीं मनाए जाने का विरोध किया गया, तो सोचिए राशिद अल्वी ने इस हास्यास्पद निर्णय के बचाव में क्या तर्क दिए?

इन्होंने कहा कि, “हमें कारगिल विजय दिवस मनाने की कोई वजह नहीं दिखाई देती। कारगिल की जीत को युद्ध में मिली विजय के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह अलग बात है कि एनडीए इसका उत्सव मना सकता है क्योंकि यह युद्ध उस समय हुआ था जब उसकी सरकार थी।” अब आप ही बताये क्या युद्ध किसी सरकार के बीच था या दो देशों के बीच?

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“बीजेपी का युद्ध”

जहां कांग्रेस कारगिल को “बीजेपी के युद्ध” के रूप में संदर्भित कर रही थी, वहीं वाजपेयी जी ने कारगिल को देश की जीत के रूप में संदर्भित किया। परंतु बात यहीं तक सीमित नहीं थी। कांग्रेस के पूर्व प्रवक्ता के रूप में भी राशिद अल्वी ने काफी अनर्गल प्रलाप किया है। उदाहरणत जब कोविड के लिए भारत ने 2021 में दो वैक्सीनों को आपातकालीन स्वीकृति प्रदान की, तो अखिलेश यादव ने इसका विरोध करते हुए बेतुके तर्क दिए।

परंतु इसका समर्थन करने में सबसे आगे रही कांग्रेस, जिनके नेता राशिद अल्वी ने कुछ यूं कहा, “जिस तरीके से केंद्र सरकार सीबीआई, आईबी, ईडी, इनकम टैक्स डिपार्टमेंट का उपयोग विपक्ष के विरुद्ध कर रही है, तो वैक्सीन तो एक ऐसी चीज है जिसका आम आदमी के साथ निश्चित तौर से इसका उपयोग नहीं होगा, लेकिन विपक्ष के नेताओं को डर तो लगेगा;  क्योंकि ऐसे हाथों में सरकार है, जो देश के विपक्ष को या तो जेल में देखना चाहती है या उनकी राजनीति खत्म करना चाहती है, तो अखिलेश यादव के बयान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।”

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बताओ भई, मानवता के संरक्षण के लिए वैज्ञानिकों और डॉक्टरों के वैक्सीन बनाने के श्रम पर एक ऐसे नेता ने प्रश्न चिह्न लगा दिए, जिसे जनता भाव नहीं दे रही है। फिर भी उनके कुछ चेले इस मुद्दे पर उनकी चापलूसी कर रहे हैं। दुर्भाग्यपूर्ण बात ये भी है कि राष्ट्रीय स्तर की राजनीतिक पार्टी कांग्रेस के नेता भी ऐसे बयानों के समर्थन में उतर आए। ये अस्थिरता फैलाने का प्रयास नहीं तो और क्या है? अभी तो हमने राशिद अल्वी और स्मृति ईरानी के बीच के विवाद पर प्रकाश भी नहीं डाला है, अन्यथा जनता को अच्छी तरह ज्ञात होता कि यह व्यक्ति अपनी कुंठा में क्या क्या कर सकता है।

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