सायक शैदी नाम के एक कम विख्यात शायर ने एक बार लिखा था कि वो पाकिस्तान की जीत (क्रिकेट में) पर पटाखे फोड़ेंगे और जो किसी ने इस हरकत पर शिकायत की तो भारत को असहिष्णु भी बताएँगे। जो एहसान हिन्दुओं का माना जाना चाहिए, यानी मजहब के नाम पर एक मुल्क ले लेने वालों को भारत में रहने दिया गया, उसके बारे में ऐसे जताया जाता है जैसे कि जो अपना अलग मुल्क लेने के बाद भी यहीं जमे रहे, उन्होंने रुककर कोई एहसान कर दिया हो। भारत-पाकिस्तान के बीच होने वाले क्रिकेट मैचों में उनकी इसी सोच, विदेशियों से याराने और भारत द्रोह की मानसिकता को खुलकर बाहर आने का मौका मिल जाता है। ऐसे मौकों पर पटाखे भी फोड़े जाते हैं, जिसका बचाव करने विदेशी फण्ड पर पल रहे मुहम्मद जुबैर जैसे तथाकथित फैक्ट-चेकर भी कूद-कूदकर उतरते हैं। वास्तविकता ये है कि क्रिकेट मैच के नाम पर भारत विरोधी भावनाओं का प्रदर्शन लम्बे समय से चलता रहा है। कश्मीर में अंतर्राष्ट्रीय मैच रोकने के लिए पिच खोद दी गई थी। 13 अक्टूबर 1983 को भारत और वेस्ट इंडीज के बीच मैच के दौरान भीड़ ने मैदान में घुसकर पिच खोद डाली थी। इसके लिए बारह लोगों की गिरफ़्तारी हुई थी और बाद में ठाकरे की शिवसेना ने इसी से सीखकर 1991 में पिच खोदी थी।
गुजरात में शराब के अवैध व्यापार पर हाल में ही एक फिल्म आई थी जिसे ‘मियाँ भाई की डेरिंग’ वाले डायलॉग के लिए भी याद किया जाता है। करीब-करीब यही पड़ोसी राज्य महाराष्ट्र में दाउद इब्राहिम का दौर था जिसे बाद में मुंबई में सीरियल बम धमाकों के लिए भी जाना जाता है। राजनैतिक तौर पर कैसा समर्थन रहा होगा, इसका अनुमान लगाना है तो शरद पवार के बयान को याद कर लीजिये। उसने बारह बम धमाकों में एक तेरहवां फर्जी बम धमाका इसलिए जोड़ा था ताकि आरोप हिन्दुओं पर लगाया जा सके। बहुत बाद में कसाब भी कलाई पर कलावा बांधे और हिन्दू नाम वाले फर्जी दस्तावेज लिए आतंक इसलिए फैला रहा था ताकि बाद में इसका आरोप हिन्दुओं पर ही थोपा जा सके। कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह बाद में महेश भट्ट आदि के साथ ऐसा ही करने वाली एक पुस्तक के विमोचन में दिखा था। जैसी स्थितियाँ महाराष्ट्र में एक समुदाय विशेष के अपराधियों की सत्ताधारी कांग्रेस से गठजोड़ के कारण बनी थीं, कुछ वैसी ही स्थितियां पड़ोसी गुजरात में भी थीं और हर वर्ष दंगे होते थे। मुस्लिम आबादी राज्य में दस प्रतिशत के लगभग होने के बाद भी वो दंगे करते और साफ़ बच भी जाते।
ऐसे ही दौर में गुजरात के गोधरा में हिन्दू तीर्थयात्रियों को लेकर आ रही ट्रेन में आग लगा देने की योजना बनाई गयी। 23 साल पहले आज ही के दिन यानी 27 फरवरी को गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस के S-6 कोच में आग लगा दी गई थी। गुजरात फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी ने अपनी जांच में पाया कि साबरमती एक्सप्रेस के डब्बे में ज्वलनशील पदार्थ डालकर अन्दर से आग लगाईं गयी। गोधरा में ट्रेन जलाये जाने यानी 2002 को कुछ ही समय बीता था जब 17 मई 2004 को केंद्र में यूपीए की कांग्रेसी नेतृत्व वाली सरकार आई आर बाद में चारा घोटाले में अपराधी करार दिया गया लालू यादव रेल मंत्री बन गया। लालू यादव ने सुप्रीम कोर्ट के भूतपूर्व जज, जस्टिस उमेशचन्द्र बनर्जी की अध्यक्षता में गोधरा ट्रेन जलाने के काण्ड की जांच के लिए कमीशन बनाया। इस कमीशन ने जाहिर है कि हमलावरों को क्लीन चिट देने का कुत्सित प्रयास किया था। गोधरा ट्रेन काण्ड के एक पीड़ित नीलकंठ तुलसीदास भाटिया ने रिपोर्ट को अक्टूबर 2006 में गुजरात हाईकोर्ट में चुनौती दे डाली। रिपोर्ट के फर्जीवाड़े की अदालत में धज्जियाँ उड़ गयी। अदालत ने कहा कि जाँच असंवैधानिक, गैरकानूनी थी और उसे निरस्त कर दिया। अदालत ने साफ़ ही कह दिया था कि गलत इरादों के साथ इस कमीशन को बनाने में सत्ता की शक्ति का दुरूपयोग किया गया है। चारा चोरी के अपराधी लालू यादव की बनवाई कमीशन के रिपोर्ट को संसद में प्रस्तुत न करने का आदेश भी हाईकोर्ट ने दे दिया।
इस मामले में फरवरी 2002 तक 51 लोगों को गिरफ्तार किया गया था और मार्च होते होते स्थानीय कांग्रेसी नेता हाजी बिलाल को आतंकवाद निरोधक इकाई ने धर दबोचा। एफआईआर में लिखा गया था कि 1540 लोगों की एक बड़ी भीड़ ने साबरमती एक्सप्रेस पर हमला किया था। गोधरा मुनिसिपलिटी के प्रमुख मुहम्मद हुसैन कालोटा को मार्च में गिरफ्तार कर लिया गया। शुरुआत में जिन 107 लोगों को आरोपी बनाया गया उनमें से 8 नाबालिग थे। गोधरा क्राइम ब्रांच की इकाई ने इस वारदात के मुख्य अभियुक्तों में से एक हुसैन सुलेमान मुहम्मद को जुलाई 2015 में (वारदात के 13 साल बाद) मध्य प्रदेश के झबुआ में पकड़ने में सफलता पाई। एक और फरार आरोपी फारुक भाना मई 2016 में मुंबई से गिरफ्तार किया गया। याकूब पटालिया को जनवरी 2018 में गिरफ्तार किया जा सका। इन पर जो मुकदमा चल रहा था उसमें पोटा (आतंकवाद निरोधक कानून) की धाराएं भी लगाई गयी थीं, मगर कांग्रेसी नेतृत्व वाली यूपीए की सरकार जब 2004 में सत्ता में आई, तो उसने पोटा हटवाने की कवायद शुरू की और मई 2005 में पोटा हटा ली गयी। इस घटना पर नानावती कमीशन की जाँच भी बैठी थी जिसने सितम्बर 2008 में अपनी रिपोर्ट दी। जब 2009 में विशेष जाँच दल (एसआईटी) की रिपोर्ट आई तो फास्ट-ट्रैक अदालतों में मामले की सुनवाई शुरू हुई।
फरवरी 2011 में जाकर ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों में से 31 को दोषी माना और 63 लोग सबूतों की कमी के कारण छूट गए। इसमें ग्यारह लोगों को मौत की सजा हुई थी। ये एक साजिश थी ये सिद्ध हो गया लेकन जिसे एसआईटी मुख्य साजिशकर्ता मान रही थी, वो मौलवी सईद उमरजी भी उन 63 लोगों में था जिनपर आरोप सिद्ध नहीं हो पाये। राज्य सरकार ने फैसले के विरुद्ध हाईकोर्ट में अपील की और 20 लोग जिन्हें आजन्म कारावास देकर छोड़ा जा रहा था, उनके लिए भी फांसी की सजा की मांग की। गुजरात हाईकोर्ट में ये पुनः सिद्ध हो गया कि गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस में साजिश करके एक समुदाय विशेष के गुंडों ने आग लगाई थी। इसके बाद भी जिनको मौत की सजा हुई थी, उन्हें केवल आजन्म कारावास मिला। अदालतों के फैसले से यह ज़रूर साफ हो गया कि कैसे यूपीए के कांग्रेस और राजद जैसे घटक दल, एक समुदाय विशेष को साज़िशन एक ट्रेन का डब्बा और उसके अन्दर 11 बच्चों और कई महिलाओं समेत 59 लोगों को जीवित जला देने की नीचता को अपने पालतू एनजीओ गिरोहों के साथ मिलकर बचाने की कोशिश की थी।
आज जरूर 2002 को 22-23 वर्ष बीत गए हैं, लेकिन कांग्रेस और उसके बगलबच्चा गिरोहों ने जो किया था उसे पूरे भारत को बार-बार याद दिलाये जाने की आवश्यकता इससे कम नहीं होती। जो गोधरा में हुआ था, वैसी पत्थरबाजी की घटनाएँ चंद नेताओं की वजह से असामाजिक तत्व अब भारत भर में दोहराने लगे हैं। आपके शहर में भी ऐसे लोग हैं, उन्हें पहचानकर सत्ता से बाहर किये जाने की जरूरत तो है ही!