तीर्थराज प्रयागराज में हुआ महाकुंभ तो समाप्त हो गया लेकिन इसकी चर्चा दुनिया भर में हो रही है। आस्था के इस सबसे बड़े समागम में 66 करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं ने संगम में डुबकी लगाई है। आस्था के सबसे बड़े आयोजनों में शामिल यह महाकुंभ एक और वजह से भी चर्चा में रहा है। इस महाकुंभ में पेशवाई और शाही स्नान के नाम को बदलकर क्रमश: छावनी प्रवेश और अमृत स्नान कर दिया गया था। इन आयोजनों के नए नाम हिंदू संस्कृति से जुड़े होने पर साधु-संतों ने खुशी जाहिर की और आगे भी वे इन्हीं नामों को रखना चाहते हैं। सदियों से पेशवाई और शाही स्नान नाम चले आ रहे थे लेकिन इस महा आयोजन से पहले अखाड़ों की मांग पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पेशवाई और शाही स्नान का नाम बदलने का ऐतिहासिक काम किया था।
अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद व मां मनसा देवी मंदिर ट्रस्ट हरिद्वार के अध्यक्ष महंत रवींद्र पुरी ने भी पेशवाई और शाही स्नान का नाम बदलने के लिए योगी आदित्यनाथ की तारीफ की है। अब कुंभ के अखाड़ों के साधु-संतों की ओर से मांग की जा रही है कि आने वाले कुंभ और अर्द्धकुंभ में भी ‘छावनी प्रवेश’ और ‘अमृत स्नान’ नामों का ही प्रयोग किया जाए। आने वाले वर्षों में देखें तो 2027 में नासिक (महाराष्ट्र) में कुंभ, 2027 में हरिद्वार (उत्तराखंड) में अर्द्धकुंभ और 2028 में उज्जैन (मध्य प्रदेश) का सिंहस्थ कुंभ होने जा रहा है। इन आयोजनों से पहले अखाड़ा परिषद का एक प्रतिनिधिमंडल तीनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों से मिलकर आगे भी इन्हीं नए नामों के इस्तेमाल की मांग करेगा। आने वाले कुंभ के अभिलेखों में नए नामों का इस्तेमाल किया जाए इसके लिए अखाड़ा परिषद की तरफ से कोशिश की जा रही है।
जगद्गुरु वैदेही वल्लभ देवाचार्य ने TFI से बातचीत में सीएम योगी के फैसले को लेकर कहा कि सीएम योगी ने जो नाम दिए हैं वे सनातन की परंपरा से आते हैं और संस्कृत से युक्त शब्द हैं। उन्होंने कहा, “यही नाम आगे भी रहने चाहिए इसे लेकर विभिन्न धर्मगुरुओं ने अपनी सहमति जताई है।”
क्या होते हैं अखाड़े?
कुंभ के दौरान जो शब्द सबसे अधिक सुनने में आता है वो अखाड़ा ही है। सीधे शब्दों में कहें तो अखाड़ा साधु-संतों का समूह है। अखाड़ों की शुरुआत प्राचीन काल में सनातन धर्म और संत परंपरा की रक्षा के उद्देश्य से की गई थी। माना जाता है कि आदि शंकराचार्य ने 8वीं शताब्दी में अखाड़ों की स्थापना की थी, ताकि सनातन धर्म की रक्षा की जा सके और संतों को एक संगठित व्यवस्था में लाया जा सके।
इनका गठन विशेष रूप से संतों और साधुओं को एकजुट करने, उन्हें आत्मरक्षा का प्रशिक्षण देने और धर्म प्रचार के लिए किया गया था। इन अखाड़ों में धार्मिक ज्ञान के साथ-साथ शस्त्र की भी शिक्षा दी जाती है। शुरुआत में 4 प्रमुख अखाड़े हुआ करते थे लेकिन समय के साथ इनकी संख्या बढ़कर 13 हो गई। इनमें से 7 अखाड़े शैव परंपरा के आराधक हैं, 3 अखाड़े वैष्णव संप्रदाय से जुड़े हुए हैं और 3 अखाड़े गुरु नानक देव की परंपरा से हैं जिन्हें उदासीन संप्रदाय कहा जाता है।
क्या होती है पेशवाई?
कुंभ में अखाड़ों की पारंपरिक और भव्य शोभायात्रा को पेशवाई कहा जाता है, इस यात्रा के दौरान संत-महंत अपने अनुयायियों और अखाड़ों के साधुओं के साथ सजे-धजे हाथियों, घोड़ों, ऊंटों और बैंड-बाजों के साथ मेले में प्रवेश करते हैं। पेशवाई को कुंभ मेले की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है और यह अखाड़ों की परंपरा और भव्यता को दिखाती है। पेशवा एक फारसी शब्द है जिसका अर्थ होता है ‘अगुआ या सरदार’। मराठा साम्राज्य में मराठों के प्रधानमंत्रियों की उपाधि भी ‘पेशवा’ होती थी। इस शब्द के फारसी मूल का होने के चलते ही इसे बदलने की मांग शुरू हुई थी।
महाकुंभ के दौरान इसे बदलकर ‘छावनी प्रवेश’ कर दिया गया है। यहां यह जानना भी महत्वपूर्ण है कि अखाड़ों के प्रवेश को छावनी प्रवेश कहा जाना दिखाता है कि किस तरह अखाड़ों में शस्त्र की परंपरा रही है। मौजूदा परिदृश्य में छावनी का इस्तेमाल सेना के क्षेत्र के लिए किया जाता है। सनातन की रक्षा के लिए अखाड़ों में भी उच्च स्तरीय शस्त्र ज्ञान देने की परंपरा रही है। वहीं, अखाड़े के कुछ प्रमुख साधु जिन्हें महामंडलेश्वर भी कहा जाता है वो सामान्यत: ‘छावनी प्रवेश’ के दौरान रथ पर सवार होते हैं जबकि अन्य साधु-संत नाचते-गाते रथ के साथ पैदल यात्रा करते हैं।
वैदेही वल्लभ देवाचार्य कहते हैं कि छावनी की परंपरा रामायण काल से चली आ रही है और अब इस नाम की पुनरावृत्ति कर उसी संस्कृति को वापस लाने की कोशिश की जा रही है। वल्लभ देवाचार्य ने इस पहल को सकारात्मक बताया है।
क्या होता है शाही स्नान?
महाकुंभ में शाही स्नान एक महत्वपूर्ण और भव्य अनुष्ठान होता है। इसमें अखाड़ों के साधु-संत पारंपरिक रूप से गंगा, यमुना और विलुप्त सरस्वती नदी के संगम में स्नान करते हैं। शाही स्नान हिंदू धर्म में अत्यंत शुभ माना जाता है और यह मान्यता है कि इस दिन स्नान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। शाही स्नान का नेतृत्व विभिन्न अखाड़ों के प्रमुख साधु, नागा साधु और महामंडलेश्वर करते हैं। यह आयोजन कुंभ मेले की सबसे खास और आकर्षक परंपराओं में से एक होता है, जिसे देखने के लिए देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु और पर्यटक आते हैं।
शाही स्नान को लेकर मान्यता है कि प्राचीन काल में जब राजा-महाराजा कुंभ में स्नान करते थे, तो उनके साथ संत-महात्मा और राजगुरु भी स्नान करते थे। इस परंपरा को तब से शाही स्नान कहा जाता रहा है। लेकिन अब इसका नाम भी बदलकर अमृत स्नान किया गया है। यह भी हिंदू संस्कृति को पुन: जागृत करने की कोशिश है। कुंभ के आयोजनों के स्थलों का इतिहास भी अमृत कलश से गिरी बूंदों से ही जुड़ा हुआ है, ऐसे में शाही स्नान को अमृत स्नान किया जाना पूरी तरह तर्कसंगत भी है।
महाकुंभ में इन आयोजनों के नामों को बदलने की यह पहल न केवल सनातन परंपराओं को पुनर्जीवित करने का प्रयास है बल्कि हिंदू संस्कृति की गहरी जड़ों को और मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम भी है। ‘छावनी प्रवेश’ और ‘अमृत स्नान’ जैसे नए नामों को अपनाने से कुंभ की धार्मिक और आध्यात्मिक पहचान और अधिक मजबूत होगी। साधु-संतों और श्रद्धालुओं की सहमति से किए गए ये बदलाव और इन्हें आगे भी जारी रखने से सनातन धर्म की समृद्ध परंपराओं को जीवंत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेंगे।