धर्म बनाम रिलिजन: केवल आस्था नहीं, आचरण की बात

जब तक किसी भी व्यक्ति की सोच सकारात्मक नहीं होगी, धर्म उसे प्राप्त नहीं हो सकता है

धर्म शब्द सभ्यता का एक ऐसा महत्वपूर्ण मार्गदर्शक है जिसने विकास के पथ को अधिक सुसंस्कारित बनाया है। धर्म स्वयम में आचरण ही है। डॉ० पी.वी. काणे के अनुसार ‘धर्म’ शब्द की उत्पत्ति ‘धृ’ धातु से हुई है जिसका अर्थ है- धारण करना। धर्म का स्पष्ट शब्दों में अर्थ है – धारण करने योग्य आचरण धर्म है। सही और गलत की पहचान कराकर प्राणिमात्र को सदमार्ग पर चलने के लिए अग्रसर करे, वह धर्म है। जो हमारे जीवन में अनुशासन लाये वह धर्म है। आदर्श अनुशासन वह जिसमें व्यक्ति की विचारधारा और जीवनशैली सकारात्मक हो जाती है। जब तक किसी भी व्यक्ति की सोच सकारात्मक नहीं होगी, धर्म उसे प्राप्त नहीं हो सकता है। धर्म ही मनुष्य की शक्ति है, धर्म ही मनुष्य की पूर्णता है। धर्म के बिना मनुष्य अधूरा है, अपूर्ण है।

महाभारत के कर्ण-पर्व के अनुसार धारण करने वाले को धर्म कहते हैं। धर्म प्रजा को धारण करता है –

धारणाद्धर्ममित्याहुर्धर्मो धारयते प्रजाः।
यत्स्याद्धारणसंयुक्त स धर्म इति निश्चयः।। महाभारत कर्णपर्व , ३, २१,४१

इस प्रकार धर्म सभी प्राणियों की रक्षा करता है। धर्म का आशय नैतिकता तथा सद्आचरण से है। रामायण में कहा गया है कि संसार में सबसे श्रेष्ठ स्थान धर्म का ही है। कौटिल्य ने तो स्पष्ट रूप में कहा है– धर्म प्रधान पुरूषार्थ है। (धर्मः प्रधानम् पुरूषार्थात) (कौटिल्य अर्थशास्त्र, २.५५)

वेदों में भी धर्म आचरण के ही रूप में लिया जाता रहा है।

“आ प्रा रजांसि दिव्यानि पार्थिवा श्लोकं देव: कृणुते स्वाय धर्मणे।” (ऋग्वेद – 4.5.3.3)

यहाँ पर ‘धर्म’ का अर्थ निश्चित नियम (व्यवस्था या सिद्धान्त) या आचार नियम है।

अभयं सत्वसशुद्धिज्ञार्नयोगव्यवस्थिति:।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाधायायस्तप आर्जवम्।।
अहिंसा सत्यमक्रोधत्याग: शांतिर पैशुनम्।
दया भूतष्य लोलुप्तवं मार्दवं ह्रीरचापलम्।।
तेज: क्षमा धृति: शौचमद्रोहो नातिमानिता।
भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत।। (गीता : 16/1, 2, 3)

अर्थात भय रहित मन की निर्मलता, दृढ मानसिकता, स्वार्थरहित दान, इन्द्रियों पर नियंत्रण, देवता और गुरुजनों की पूजा, यश जैसे उत्तम कार्य, वेद शास्त्रों का अभ्यास, भगवान के नाम और गुणों का कीर्तन, स्वधर्म पालन के लिए कष्ट सहना, व्यक्तित्व, मन, वाणी तथा शरीर से किसी को कष्ट न देना, सच्ची और प्रिय वाणी, किसी भी स्थिति में क्रोध न करना, अभिमान का त्याग, मन पर नियंत्रण, निंदा न करना, सबके प्रति दया, कोमलता, समाज और शास्त्रों के अनुरूप आचरण, तेज, क्षमा, धैर्य, पवित्रता, शत्रुभाव नही रखना – यह सब धर्म सम्मत गुण व्यक्तित्व को देवता बना देते है।

धर्म का मर्म और उसकी व्यापकता को स्पष्ट करते हुए गंगापुत्र भीष्म कहते है-

सर्वत्र विहितो धर्म: स्वग्र्य: सत्यफलं तप:।
बहुद्वारस्य धर्मस्य नेहास्ति विफला क्रिया।। (महाभारत शांतिपर्व – 174/2)

अर्थात धर्म अदृश्य फल देने वाला होता है। जब हम धर्ममय आचरण करते हैं तो चाहे हमें उसका फल तत्काल दिखाई नहीं दे, किन्तु समय आने पर उसका प्रभाव सामने आता है। सत्य को जानने (तप) का फल, मरण के पूर्व(ज्ञान रूप में) मिलता है। जब हम धर्म आचरण करते है तो कठिनाइयों का सामना भी करना पड़ता है किन्तु ये कठिनाइयां हमारे ज्ञान और समझ को बढाती है। धर्म के कई द्वार हैं। जिनसे वह अपनी अभिव्यक्ति करता है।

रामायण में भी धर्म की व्यापक चर्चा की गयी है। बाल्मीकि रामायण में (3/37/13) भगवान श्रीराम को धर्म की जीवंत प्रतिमा कहा गया है। श्रीराम कभी धर्म को नहीं छोड़ते और धर्म उनसे कभी अलग नहीं होता है। (युद्ध कांड 28/19) श्रीरामचन्द्र जी के अनुसार, संसार में धर्म ही सर्वश्रेष्ठ है। धर्म में ही सत्य की प्रतिष्ठा है। धर्म का पालन करने वाले को माता-पिता, ब्राह्मण एवं गुरु के वचनों का पालन अवश्य करना चाहिए।यथा:-

यस्मिस्तु सर्वे स्वरसंनिविष्टा धर्मो, यतः स्यात् तदुपक्रमेत।
द्रेष्यो भवत्यर्थपरो हि लोके, कामात्मता खल्वपि न प्रशस्ता॥ (श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण 2/21/58)

अर्थात जिस कर्म में धर्म आदि पुरुषार्थों का समावेश नहीं, उसको नहीं करना चाहिए। जिससे धर्म की सिद्धि होती हो वहीं कार्य करें। जो केवल धन कमाने के लिए कार्य करता है, वह संसार में सबके द्वेष का पात्र बन जाता है। यानि उससे, उसके अपने ही जलने लगते हैं। धर्म विरूद्ध कार्य करना घोर निंदनीय है।

इसी तरह देवी सीता भी धर्म के पालन का ही आवश्यक मानती हुऐ कहती हैं-

धर्मादर्थः प्रभवति धर्मात् प्रभवते सुखम्।
धर्मेण लभते सर्व धर्मसारमिदं जगत्॥ (श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण 3/9/30)

अर्थात देवी सीता के कहने का मतलब यह हे कि धर्म से अर्थ प्राप्त होता है और धर्म से ही सुख मिलता है। और धर्म से ही मनुष्य सर्वस्व प्राप्त कर लेता है। इस संसार में धर्म ही सार है। यह बात देवी सीता ने उस समय कही जब श्रीराम वन में मुनिवेश धारण करने के बावजूद शस्त्र साथ में रखना चाहते थे। वाल्मिकी रामायण में देवी सीता के माध्यम से पुत्री धर्म, पत्नी धर्म और माता धर्म मुखरित हुआ है। धर्म के इसी आदर्श को धरण करने के कारण देवी सीता भारतीय नारी का आदर्श स्वरुप है।

धर्म और रिलिजन (Religion) को अक्सर एक ही अर्थ में प्रयोग किया जाता है, लेकिन भारतीय दर्शन में दोनों की अवधारणा भिन्न है। धर्म एक व्यापक और जीवन-परक अवधारणा है, जबकि रिलिजन मुख्यतः संगठित आस्था प्रणालियों और उपासना पद्धतियों से संबंधित है। व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के संतुलन को बनाए रखने की प्रक्रिया भी धर्म का ही एक स्वरूप है। भारतीय ग्रंथों में वर्णित ‘सर्वधर्म संभाव’ और ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की अवधारणा इस व्यापकता को दर्शाती है। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं, “स्वधर्मे निधनं श्रेयः, परधर्मो भयावहः,” अर्थात अपने धर्म का पालन करना ही श्रेष्ठ है और किसी अन्य के धर्म से शासित होना सबसे दुष्कर है। इसके विपरीत, Religion एक विशेष आस्था प्रणाली है जिसमें ईश्वर, धार्मिक ग्रंथ, संस्थाएँ और विशेष कर्मकाण्ड शामिल होते हैं। यह किसी पैगंबर, ईश्वरीय ग्रंथ या गुरु पर आधारित होता है और अनुयायियों को एक निश्चित पूजा-पद्धति और आस्थाओं का पालन करना आवश्यक होता है। यह बहुधा एक समुदाय विशेष के लिए होता है और अलग-अलग रिलिजन की सीमाएँ स्पष्ट होती हैं। पश्चिमी दृष्टिकोण में रिलिजन ‘मानव और ईश्वर के संबंध’ से अधिक जुड़ा होता है, न कि संपूर्ण जीवन व्यवस्था से। इस आधार पर सनातन व्यवस्था एक धर्म है जो आचरण आधारित है। रिलीजन और धर्म को यदि एक सारणी में आबद्ध करें तो इसे निम्न प्रकार प्रदर्शित कर सकते हैं–

 विशेषता        धर्म  रिलिजन (Religion)
 परिभाषा  जीवन के हर क्षेत्र में सम्यक आचरण  संगठित आस्था प्रणाली
 व्यापकता  नैतिकता, कर्तव्य, समाज व्यवस्था  पूजा-पद्धति और विश्वास प्रणाली
 स्रोत  सनातन, शाश्वत और परिवर्तनशील  किसी पैगंबर, ग्रंथ या गुरु से उत्पन्न
 सीमाएँ  सर्वजन हिताय, सार्वभौमिक  विशेष अनुयायियों तक सीमित
 लक्ष्य  लोक-कल्याण, संतुलन  ईश्वर की उपासना और पारलौकिक पद की प्राप्ति

इस प्रकार धर्म केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं है; यह एक जीवन पद्धति है जो सत्य, अहिंसा, कर्तव्य और न्याय पर आधारित है। वहीं, रिलिजन एक विशिष्ट आस्था प्रणाली है जो किसी विशेष समूह या पंथ से जुड़ी होती है। इसी को दृष्टिगत रखते हुये विश्व धर्म महासभा, शिकागो, 1893 मे स्वामी विवेकानंद ने कहा था,  “धर्म का अर्थ केवल मत-मतांतर नहीं है, यह आत्मा का नियम है। धर्म वह है जो मनुष्य को ऊँचा उठाए, उसे विकसित करे। धर्म सत्य की खोज है; यह आत्मा की मुक्ति का मार्ग दिखाता है। जबकि रिलिजन अधिकतर बाह्य कर्मकांडों और संगठनों तक सीमित होता है।”

आगे वह कहते हैं कि धर्म अनुभूति की वस्तु है। वह मुख की बात मतवाद अथवा युक्तिमूलक कल्पना मात्र नहीं है। आत्मा की ब्रह्मस्वरूपता को जान लेना, तद्रुप हो जाना- उसका साक्षात्कार करना, यही धर्म है- वह केवल सुनने या मान लेने की चीज नहीं है। समस्त मन-प्राण का विश्वास की वस्तु के साथ एक हो जाना- यही धर्म है। ‘The Hindu View of Life’ में  डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन लिखते हैं कि “धर्म वह है जो आत्मा की शुद्धि और नैतिकता की स्थापना करता है। जबकि रिलिजन पंथ या किसी विशेष विश्वास प्रणाली तक सीमित हो सकता है। हिंदू धर्म केवल एक रिलिजन नहीं, बल्कि एक जीवन-पद्धति है, जो दर्शन, नैतिकता, और आध्यात्मिकता को समाहित करता है।” लियो टॉल्सटॉय (Leo Tolstoy) ‘The Kingdom of God is Within You’ में लिखते हैं,”सच्चा धर्म प्रेम और करुणा में निहित होता है। यह हृदय की गहराइयों में पाया जाता है, न कि केवल चर्च या किसी संस्था में।”

बरट्रेंड रसेल (Bertrand Russell) ‘Why I Am Not a Christian’, 1927 में कहते हैं कि “रिलिजन मुख्यतः परंपराओं और रूढ़ियों पर आधारित होता है, जबकि धर्म सच्चे अर्थों में नैतिकता और ज्ञान की खोज है।” इसी प्रकार अल्बर्ट आइंस्टीन ने  ‘Science and Religion’, (1941) मे अपना विचार व्यक्त करते हुये कहा “धर्म मानवता के उच्च मूल्यों को दर्शाता है, जबकि रिलिजन संगठित आस्थाओं की एक प्रणाली है।”  उनके अनुसार “Science without religion is lame, religion without science is blind.” अर्थात Religion के बिना विज्ञान लंगड़ा है और विज्ञान के बिना Religion अंधा  है। धर्म का आंतरिक पक्ष यह है कि यह समग्र मानव जाति के लिए सामान रूप में स्वीकृत है जैसे सूर्य का प्रकाश, जल, प्रकृति प्रदत खाद्य पदार्थ आदि सभी के लिए सुलभ हैं । उसी प्रकार धर्म (धारण करने योग्य) भी सभी मानव के लिए सामान है । यही कारण है की वेदों में यह कहा गया है वसुधैव कुटुम्बकम् अर्थात सारी धरती को अपना घर समझो। वैदिक ऋषि धर्म से अनुप्राणित होकर यह प्रार्थना करता है कि

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे संतु निरामया।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत्॥

अर्थात- सभी सुखी होवें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी मंगलमय घटनाओं के साक्षी बनें, और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े।

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