रामपुर से उठा यह मामला सिर्फ़ एक ज़मीन विवाद नहीं, बल्कि हमारे कानून, व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा पर सीधा हमला है। जब एक पाकिस्तानी नागरिक भारत के दिल में आकर करोड़ों की ज़मीन महज़ 5 लाख में बेच दे और आराम से पाकिस्तान लौट जाए, तो सवाल सिर्फ़ रामपुर का नहीं, बल्कि पूरे भारत की सुरक्षा और संप्रभुता का है।
शत्रु संपत्ति का खेल या तंत्र की नाकामी?
जावेद खान, जिसने पाकिस्तान की नागरिकता ले ली थी, उसकी पैतृक ज़मीन स्वतः “शत्रु संपत्ति” मानी जानी चाहिए थी। भारतीय कानून साफ कहता है कि दुश्मन देश का नागरिक भारत में संपत्ति पर न तो हक़ रख सकता है, न बेच सकता है। रामपुर का ज़मीन कांड: पाक नागरिक कैसे बना भारतीय? राष्ट्र की सुरक्षा में सेंध या साज़िश?
रामपुर से उठा यह मामला सिर्फ़ एक ज़मीन विवाद नहीं, बल्कि हमारे कानून, व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा पर सीधा हमला है। जब एक पाकिस्तानी नागरिक भारत के दिल में आकर करोड़ों की ज़मीन महज़ 5 लाख में बेच दे और आराम से पाकिस्तान लौट जाए, तो सवाल सिर्फ़ रामपुर का नहीं, बल्कि पूरे भारत की सुरक्षा और संप्रभुता का है।
शत्रु संपत्ति का खेल या तंत्र की नाकामी?
जावेद खान, जिसने पाकिस्तान की नागरिकता ले ली थी, उसकी पैतृक ज़मीन स्वतः “शत्रु संपत्ति” मानी जानी चाहिए थी। भारतीय कानून साफ कहता है कि दुश्मन देश का नागरिक भारत में संपत्ति पर न तो हक़ रख सकता है, न बेच सकता है। इसके बाद भी यह सौदा हुआ—क्यों? क्या यह तंत्र की नाकामी थी या अंदरखाने किसी मिलीभगत की गंध है?
आधार कार्ड और आईडी का काला सच
सबसे बड़ा सवाल – पाकिस्तानी नागरिक के नाम पर आधार कार्ड और पहचान पत्र कैसे बने? क्या हमारी पहचान प्रणाली में इतनी दरारें हैं कि कोई भी दुश्मन देश का नागरिक भारतीय दस्तावेज़ बनवाकर देश के संसाधनों पर कब्ज़ा कर सकता है? यह केवल धोखाधड़ी नहीं, बल्कि राष्ट्र सुरक्षा से खिलवाड़ है।
करोड़ों की ज़मीन 5 लाख में क्यों?
4.7 बीघा ज़मीन जिसकी कीमत 60-80 लाख थी, महज़ 5 लाख में क्यों बेची गई? क्या यह सिर्फ़ एक धोखाधड़ी थी या फिर देशविरोधी तत्वों को लाभ पहुंचाने की गहरी साज़िश? इतना सस्ता सौदा किसी साधारण रिश्तेदारी का नहीं, बल्कि सिस्टम में सेंध लगाने की चाल लगता है।
दुश्मन की चाल और भारत की चुनौती
पाकिस्तान हमेशा से भारत के खिलाफ अप्रत्यक्ष युद्ध लड़ता रहा है। आतंकवाद हो, घुसपैठ हो या अब संपत्ति के नाम पर संपूर्ण घुसपैठ – यह उसी चाल का हिस्सा है। अगर ऐसे मामलों को समय रहते रोका नहीं गया, तो यह न केवल संपत्ति विवाद बल्कि आंतरिक सुरक्षा संकट में बदल सकता है।
मोदी सरकार का संकल्प और कड़ी कार्रवाई की ज़रूरत
सवाल बड़ा है – क्या यह केवल रामपुर तक सीमित है या देशभर में ऐसी सैकड़ों शत्रु संपत्तियां हैं, जिन पर अवैध कब्ज़ा या बिक्री हो चुकी है? यही वह जगह है जहां मोदी सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति और गृह मंत्रालय की तत्परता देश को भरोसा दिलाती है। इस मामले की जांच के आदेश यह संदेश देते हैं कि अब भारत चुप नहीं बैठेगा।
राष्ट्रहित बनाम मुनाफाखोरों की मिलीभगत
रामपुर का ज़मीन घोटाला केवल एक अवैध सौदा नहीं है। यह हमें चेतावनी देता है कि दुश्मन देश का नागरिक यहां आकर आराम से पहचान पत्र बनवा सकता है। करोड़ों की ज़मीन औने-पौने दाम में बेच सकता है। और फिर वापस पाकिस्तान लौटकर मुँह चिढ़ा सकता है। यह केवल कानूनी लड़ाई नहीं, बल्कि राष्ट्र की संप्रभुता और सुरक्षा की लड़ाई है।
भारत के लिए अब यह ज़रूरी है कि ऐसी सभी संपत्तियों की पहचान हो। जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई हो और दुश्मन देश के नागरिकों को कोई भी रास्ता न मिले, जिससे वे भारत की ज़मीन, संसाधन और पहचान पर कब्ज़ा करें। रामपुर का यह मामला एक बार फिर हमें याद दिलाता है कि भारत को मज़बूत रहना होगा, कड़ा रहना होगा। क्योंकि दुश्मन हर बार नए चेहरे और नए हथियार के साथ आता है।