संभल रिपोर्ट ने खोला सच: तुष्टिकरण की राजनीति ने बदला जनसंख्या संतुलन, हिंदू बने शिकार!

नवंबर 2024 में संभल में भड़की हिंसा कोई अचानक उपजा विवाद नहीं था, बल्कि पूर्व-नियोजित और सुनियोजित हमला था। आयोग की रिपोर्ट साफ कहती है कि इस घटना में सबसे अधिक हिंदू समुदाय को निशाना बनाया गया।

संभल रिपोर्ट ने खोला सच: तुष्टिकरण की राजनीति ने बदला जनसंख्या संतुलन, हिंदू बने शिकार!

संभल की रिपोर्ट पूरे भारत के लिए चेतावनी है।

उत्तर प्रदेश के संभल से आई न्यायिक जांच आयोग की 450 पन्नों की रिपोर्ट ने उस भयावह सच को उजागर कर दिया है, जिसे दशकों से छुपाया जाता रहा। आज़ादी के समय सांभल में हिंदुओं की आबादी 45 प्रतिशत थी, लेकिन तुष्टिकरण और वोट बैंक की राजनीति ने हालात ऐसे बनाए कि अब हिंदू महज 15 प्रतिशत पर सिमट गए हैं। मुसलमानों की जनसंख्या 85 प्रतिशत तक पहुंच गई है। यह आंकड़े महज़ सांख्यिकी नहीं, बल्कि भारत के सांप्रदायिक और सांस्कृतिक संतुलन पर गंभीर चोट हैं।

योजनाबद्ध हिंसा और हिंदू समुदाय को निशाना

नवंबर 2024 में संभल में भड़की हिंसा कोई अचानक उपजा विवाद नहीं था, बल्कि पूर्व-नियोजित और सुनियोजित हमला था। आयोग की रिपोर्ट साफ कहती है कि इस घटना में सबसे अधिक हिंदू समुदाय को निशाना बनाया गया। शाही जामा मस्जिद के पास एएसआई की टीम जैसे ही जांच शुरू करती है, भीड़ ने प्रशासन और पुलिस पर हमला बोल दिया। पत्थरबाजी, छतों से गोलियां और पेट्रोल बम—सब कुछ पहले से तैयार था।

विदेशी हथियारों ने खोला बड़ा राज़

रिपोर्ट का सबसे चौंकाने वाला खुलासा यह है कि उपद्रवियों के पास से मिले हथियार अमेरिका, ब्रिटेन और जर्मनी जैसे देशों में बने हुए थे। सवाल यह है कि सांभल में ये विदेशी हथियार कैसे पहुंचे? क्या यह केवल दंगा था या फिर भारत की आंतरिक सुरक्षा को अस्थिर करने की साज़िश?

सपा नेताओं की भूमिका पर सवाल

रिपोर्ट में साफ तौर पर समाजवादी पार्टी (सपा) नेताओं का नाम आया है। आरोपियों की चार्जशीट में सपा सांसद जिया-उर-रहमान बर्क और सपा विधायक इक़बाल महमूद के बेटे सुहैल इक़बाल का जिक्र है। यह संयोग नहीं, बल्कि यह दर्शाता है कि हिंसा के पीछे राजनीतिक संरक्षण और तुष्टिकरण की काली राजनीति काम कर रही थी।

पुलिस की सतर्कता ने रोकी बड़ी त्रासदी

आयोग ने यह भी माना कि पुलिस की समय रहते की गई कार्रवाई से हिंदू-बहुल इलाकों को सुरक्षा मिली, वरना यह हिंसा और भीषण रूप ले सकती थी। अगर पुलिस पीछे हट जाती तो सांभल की गलियों में खून की नदियां बह सकती थीं।

संभल से पूरे भारत के लिए सबक

संभल की यह रिपोर्ट केवल एक जिले का सच नहीं है, बल्कि यह पूरे भारत के लिए गंभीर चेतावनी है।जनसंख्या संतुलन का बिगड़ना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है। कट्टरपंथी नेटवर्क और विदेशी हथियारों की मौजूदगी भारत की संप्रभुता को चुनौती है। राजनीतिक दलों का तुष्टिकरण सांप्रदायिक ताकतों को खुला संरक्षण देता है।

राष्ट्र की रक्षा ही पहली प्राथमिकता

अब समय आ गया है कि सरकारें और समाज मिलकर ऐसे तत्वों को कड़ा संदेश दें। जो लोग तुष्टिकरण की राजनीति करके वोट बैंक साधते हैं, उन्हें यह याद रखना चाहिए कि राष्ट्रहित से बड़ा कोई हित नहीं होता।
संभल की यह रिपोर्ट दरअसल भारत के बदलते सामाजिक परिदृश्य का आईना है। सवाल सीधा है—क्या हम अपनी संस्कृति और सुरक्षा की रक्षा करेंगे या फिर तुष्टिकरण की राजनीति के आगे आत्मसमर्पण कर देंगे?

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